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मतलाडीह में आदिवासी संताल समाज की परिचर्चा: सामाजिक संस्कार, रीति-रिवाज और स्वशासन व्यवस्था को मजबूत करने का लिया संकल्प

Jamshedpur News: जमशेदपुर के बागबेड़ा फुटबॉल मैदान में रविवार को आदिवासी संताल समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था की ओर से एक महत्वपूर्ण परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य संताल समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और पारंपरिक व्यवस्थाओं को मजबूत बनाना तथा समाज की नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना था। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीणों, सामाजिक प्रतिनिधियों और स्वशासन व्यवस्था से जुड़े लोगों ने भाग लिया। यह परिचर्चा केवल एक औपचारिक बैठक नहीं थी, बल्कि समाज की परंपराओं, मूल्यों और सामाजिक व्यवस्था को संरक्षित रखने की दिशा में सामूहिक प्रयास का प्रतीक बनी। उपस्थित लोगों ने समाज के सामने आने वाली चुनौतियों और उनके समाधान पर भी विचार-विमर्श किया।

जन्म से मृत्यु तक के सामाजिक संस्कारों पर हुई विस्तृत चर्चा
परिचर्चा के दौरान संताल समाज में जन्म से लेकर मृत्यु तक निभाए जाने वाले विभिन्न सामाजिक संस्कारों और रीति-रिवाजों पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि समाज की पहचान उसकी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से होती है और यदि इनका संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से दूर हो सकती हैं।
बैठक में विवाह, नामकरण, सामाजिक उत्सव, धार्मिक अनुष्ठान और अंतिम संस्कार जैसे विषयों पर विचार साझा किए गए। समाज के वरिष्ठ लोगों ने पारंपरिक व्यवस्था के महत्व को बताते हुए कहा कि सामाजिक नियम केवल अनुशासन बनाए रखने के लिए नहीं बल्कि सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए बनाए गए हैं।

15 गांवों के स्वशासन प्रमुख और ग्रामीण हुए शामिल 
इस परिचर्चा में घाघी बुरु पुड़सी पिंडा और मतलाडीह-घाघीडीह सहित कुल 15 गांवों के स्वशासन व्यवस्था के प्रमुखों और ग्रामीणों ने भाग लिया। विभिन्न गांवों से आए प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्र के अनुभव साझा किए और बताया कि किस प्रकार पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था आज भी ग्रामीण समाज को संगठित बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रही है। ग्रामीणों ने सामाजिक संरचना को मजबूत बनाने के लिए सामूहिक निर्णय प्रणाली और पारंपरिक नेतृत्व को आगे बढ़ाने पर बल दिया। परिचर्चा के दौरान यह भी सुझाव दिया गया कि युवा पीढ़ी को समाज की परंपराओं और स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था से अधिक जोड़ा जाए।

सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक अधिकारों को सुरक्षित रखना हर व्यक्ति का दायित्व 
कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि जुगसलाई तोरोप परगना दशमत हांसदा और पुड़सी मुडूत माझी सुखराम किस्कू उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में समाज की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक अधिकारों को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया। तोरोप परगना दशमत हांसदा ने कहा कि पूर्वजों ने समाज संचालन के लिए जो नियम और परंपराएं बनाई थीं, वे लंबे अनुभव और गहन विचार का परिणाम हैं। इन नियमों का सम्मान करना प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि समाज तभी मजबूत रहेगा जब उसकी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहेगी और लोग अपनी पारंपरिक व्यवस्था पर विश्वास बनाए रखेंगे।

सामाजिक दिग्गजों ने साझा किए अपने विचार
परिचर्चा में समाज के कई वरिष्ठ और सम्मानित व्यक्तियों ने भी अपने विचार रखे। माझी बाबा कृष्णा मुर्मू, मोहन हांसदा, गोपाल हांसदा, सुनाराम किस्कू और अनिल सोरेन सहित अन्य वक्ताओं ने समाज के वर्तमान स्वरूप और भविष्य की दिशा पर चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि आधुनिकता के दौर में सामाजिक बदलाव स्वाभाविक हैं, लेकिन इसके साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने ग्रामीणों से सामाजिक नियमों के पालन, पारंपरिक शिक्षा और सामूहिक सहयोग की भावना को बढ़ावा देने की अपील की।

नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने की दिशा में अहम पहल
परिचर्चा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि समाज की नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों से जोड़ा जाए। वक्ताओं ने कहा कि यदि युवा वर्ग अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझेगा और उसे आगे बढ़ाएगा तो समाज की पहचान लंबे समय तक सुरक्षित रहेगी। ग्रामीण स्तर पर आयोजित इस तरह के कार्यक्रम पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में भी सहायक साबित होते हैं। आयोजन के अंत में उपस्थित लोगों ने संकल्प लिया कि वे समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का कार्य निरंतर जारी रखेंगे।

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