Santhali Writers Meet: अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पोर्टब्लेयर (श्री विजयपुरम) में एक ऐतिहासिक दो दिवसीय लिट्रेचर फेस्ट का आयोजन किया गया। इस भव्य कार्यक्रम का आयोजन संताली युवा लेखक संघ (जुवान ओनोलिया) द्वारा किया गया था। रविवार को इस साहित्यिक महाकुंभ का समापन हुआ, जिसने न केवल द्वीप समूह में रहने वाले संताली समुदाय को एकजुट किया, बल्कि उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी एक नई पहचान दी। इस फेस्ट का मुख्य उद्देश्य आधुनिकता के इस दौर में अपनी जड़ों को सींचना और साहित्य के माध्यम से समाज को जागृत करना था।




गुरु गोमके के सिद्धांतों पर चलने का संकल्प
साहित्य महोत्सव के दूसरे दिन का मुख्य केंद्र बिंदु संताल समाज के मार्गदर्शक गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू का योगदान रहा। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित वक्ताओं और लेखकों ने एक स्वर में गुरु गोमके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प लिया। जुवान ओनोलिया के श्याम सी. टुडू ने बताया कि पंडित रघुनाथ मुर्मू ने न केवल 'ओल चिकी' लिपि का आविष्कार किया, बल्कि उन्होंने संताल समाज को शिक्षित और स्वावलंबी बनने का जो रास्ता दिखाया था, वह आज भी प्रासंगिक है। फेस्ट में यह तय किया गया कि उनकी शिक्षाओं को युवा पीढ़ी तक पहुँचाना ही समाज की सच्ची प्रगति होगी।


आदिवासी स्वशासन व्यवस्था पर गहन विमर्श
साहित्यिक चर्चा के साथ-साथ इस फेस्ट में आदिवासी स्वशासन व्यवस्था की मजबूती पर भी बल दिया गया। समाज को समृद्ध और विकसित बनाने के लिए पारंपरिक पदों जैसे— परगना, माझी बाबा, पारानिक और गोडेत की जवाबदेही और उनकी भूमिका पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। विद्वानों ने इस बात पर जोर दिया कि कैसे ये पारंपरिक पद आज भी संताल समाज के सामाजिक ढांचे और न्यायिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित रखने में सक्षम हैं। अनपा मार्डी, बोयहा विश्वनाथ टुडू और श्याम हांसदा जैसे प्रमुख साहित्यकारों ने इस मुद्दे पर अपने प्रभावशाली विचार साझा किए।

साहित्य की विभिन्न विधाओं का जीवंत प्रदर्शन किया
साहित्य उत्सव केवल चर्चाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें नई रचनाओं का भी स्वागत किया गया। इस अवसर पर सोनेरसिंह हांसदा द्वारा लिखित पुस्तक ''सेरेञ रेञ रे'' का विधिवत विमोचन किया गया। इसके साथ ही, साहित्य की विभिन्न विधाओं का जीवंत प्रदर्शन हुआ। आरसाल टुडू एवं निरोन टुडू ने अपनी कहानियों का पाठ किया, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं, कला और संस्कृति के रंग को बिखेरते हुए खुदीराम टुडू, श्याम हांसदा और राहेल मुर्मू ने पारंपरिक संताली गीतों की मधुर प्रस्तुति दी, जिससे पूरा वातावरण सांस्कृतिक उल्लास से भर गया।


साहित्य है समाज का दर्पण और बदलाव का औजार
इस लिट्रेचर फेस्ट की सबसे बड़ी उपलब्धि रही युवाओं की सक्रिय भागीदारी। लक्ष्मी मांडी, जसिका होरो और वीरेंद्र किस्कू जैसे युवा नेतृत्व ने यह स्पष्ट कर दिया कि संताली साहित्य और भाषा का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि साहित्य केवल शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि यह समाज का दर्पण और बदलाव का औजार है। पोर्टब्लेयर की इस धरती से शुरू हुई यह साहित्यिक चेतना आने वाले समय में संताली समाज के सर्वांगीण विकास के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी।