Jamshedpur News: जमशेदपुर के निकट डोबो स्थित कुड़मी भवन में रविवार को आदिवासी कुड़मी समाज का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सम्मेलन संपन्न हुआ। केंद्रीय अध्यक्ष शशांक शेखर महतो की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन का स्वर पूरी तरह से समाज की अस्मिता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर केंद्रित था। इस सभा ने न केवल समाज की एकजुटता को प्रदर्शित किया, बल्कि यह स्पष्ट कर दिया कि कुड़मी समाज अब अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर किसी भी प्रकार के समझौते के मूड में नहीं है। सम्मेलन में यह संदेश दिया गया कि पहचान ही अस्तित्व की पहली शर्त है और इसी पहचान को सरकारी दस्तावेजों में पुख्ता करने का समय आ गया है।



भावनात्मक नहीं, दस्तावेजी लड़ाई का शंखनाद
मुख्य अतिथि और समाज के संयोजक अजीत प्रसाद महतो ने अपने संबोधन में एक नई दिशा तय की। उन्होंने जोर देकर कहा कि "अब कुड़मी समाज को भावनात्मक नहीं, बल्कि दस्तावेजी लड़ाई लड़नी होगी।" श्री महतो ने समाज के लोगों को आगाह किया कि यदि आज हम सचेत नहीं हुए और अपनी सही पहचान दर्ज नहीं कराई, तो इतिहास और आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि आगामी जनगणना (2026-27) कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि समाज के लिए अपनी वास्तविक जनसंख्या, भाषा और अस्तित्व को देश के पटल पर स्थापित करने का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक हथियार है।


ऐतिहासिक भूल या पहचान मिटाने की साजिश?
अजीत प्रसाद महतो ने सरकारी अभिलेखों और खतियानों का हवाला देते हुए एक गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि वर्षों से 'कुड़मी' शब्द को विभिन्न प्रशासनिक दस्तावेजों में जानबूझकर तोड़-मरोड़ कर लिखा गया है। यह केवल एक लिपिकीय या प्रशासनिक भूल नहीं है, बल्कि कुड़मी समुदाय की आदिवासी पहचान को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर करने की एक प्रक्रिया रही है। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि आगामी जनगणना में हर हाल में जाति के कॉलम में 'कुड़मी' और भाषा के कॉलम में 'कुड़माली' ही दर्ज कराएं। यही वह आधार है जिससे समाज की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक गौरव को पुनर्स्थापित किया जा सकता है।

केंद्र सरकार से वादा निभाने की मांग
सम्मेलन में केंद्रीय प्रवक्ता अधिवक्ता सुनील कुमार गुलिआर ने केंद्र सरकार की वादाखिलाफी पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने याद दिलाया कि बंगाल चुनाव के दौरान स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का आश्वासन दिया था। समाज ने सरकार के इस वादे पर भरोसा जताते हुए अपना समर्थन दिया था। अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार अपनी प्रतिबद्धता पूरी करे। श्री गुलिआर ने स्पष्ट किया कि समाज की अगली बड़ी लड़ाई सरकारी दस्तावेजों में अनुसूचित जनजाति (ST) की वास्तविक पहचान और अधिकार प्राप्त करने के लिए होगी।


समाज को मजबूती के साथ संगठित होने का आह्वान
सम्मेलन के अंत में एक स्वर से समाज को पूरी मजबूती के साथ संगठित होने का आह्वान किया गया। इस बैठक में न केवल वैचारिक विमर्श हुआ, बल्कि भविष्य की रणनीति भी तैयार की गई। कार्यक्रम में समाज के कई प्रबुद्ध नेतृत्वकर्ताओं जैसे छोटेलाल मुतरुआर, ओमिय महतो, दलगोविंद महतो, जयराम महतो, रास बिहारी महतो, और डॉ. कनिका महतो सहित कई गणमान्य लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। निष्कर्ष के रूप में यह तय हुआ कि गाँव-गाँव तक 'एक समाज, एक पहचान' का संदेश पहुँचाया जाएगा, ताकि कुड़मी समाज अपनी वास्तविक भाषायी और जातीय पहचान के साथ देश के मुख्यधारा के दस्तावेजों में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त कर सके।