सारिका सुंडी बनीं हो साहित्य की नयी मशाल व युवा पीढ़ी की प्रेरणा

 झारखंड की वीर माटी ने हमेशा से देश को जुझारू व्यक्तित्व दिये हैं. इसी माटी की एक बेटी सारिका सुंडी आज अपनी कलम की ताकत से एक नयी क्रांति लिख रही है. सारिका की कहानी उन तमाम युवाओं के लिए एक मशाल है, जो संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं. उन्होंने साबित करके दिखाया है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो अभाव ही अवसर की सबसे बड़ी सीढ़ी बन जाते हैं. स्वर्गीय सोमा पुरती और स्वर्गीय जाम्बी पुरती की सुपुत्री सारिका का जीवन चुनौतियों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. चाईबासा के करलाजुड़ी (मायका) की गलियों से शुरू हुआ उनका सफर आज नरसंडा (ससुराल) तक पहुंच चुका है. सारिका एक लेखिका होने के साथ-साथ एक मेधावी छात्रा भी रही है. आदिवासी हो-भाषा में स्नातक में गोल्ड मेडल हासिल करना उनकी कड़ी मेहनत और अपनी संस्कृति के प्रति अटूट प्रेम का प्रमाण है. वर्तमान में वे इसी विषय में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करते हुए अपनी जड़ों को और गहराई से समझ रही हैं.



उन्होंने लेखन को एक मिशन बना लिया
सारिका के लेखन का सफर किसी चमत्कार से कम नहीं है. कुछ साल पहले तक वे अपनी भावनाओं को केवल कागज के टुकड़ों पर बिखेरा करती थीं. लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनका अपना हो समाज साहित्य के क्षेत्र में पिछड़ रहा है, तो उन्होंने उन बिखरे पन्नों को एक नयी पहचान देने की ठानी. उन्होंने महसूस किया कि स्कूलों और कॉलेजों में हो भाषा की पुस्तकों की घोर किल्लत है. आज भी छात्रों को अपनी ही भाषा पढ़ने के लिए जेरोक्स और पीडीएफ के भरोसे रहना पड़ता है. यह कमी उनके दिल में एक कसक बनकर चुभी. सारिका का मानना है कि एक सभ्य समाज की पहचान उसके साहित्य से होती है. यदि उनके पास अपनी किताबें नहीं होंगी, तो आने वाली पीढ़ी अपनी पहचान कैसे सहेजेगी. इसी संकल्प के साथ उन्होंने लेखन को एक मिशन बना लिया.

शिक्षा व साहित्य को तरक्की के बंद दरवाजे को खोलने की चाबी बनाया
सारिका ने बहुत ही कम समय में साहित्य जगत में अपनी एक अलग पहचान बना ली है. उनकी रचनाएं सरजोम पत्रिका, डियङ पत्रिका और नितिर सगोम जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी चमक बिखेर चुकी हैं. अब तक उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो देवनागरी और बरांग क्षिति दोनों लिपियों में उपलब्ध है. इनमें दुलड़ उम्बुल (कविता संग्रह), दोला सोमा पुरती बु बइना (जीवन वृतांत) व युवाओं को अपनी भाषा से जोड़ने के लिए हो' शायरी को माध्यम बनाया. आज की आदिवासी युवतियां अब केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं हैं. वे समाज, देश और दुनिया में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. सारिका जैसी बेटियां समाज का नेतृत्व कर रही हैं और यह बता रही हैं कि शिक्षा और साहित्य ही वह चाबी है, जिससे तरक्की के बंद दरवाजे खोले जा सकते हैं.

अपनी कलम को ही अपना संकल्प बना लिया
सारिका सुंडी कहती है कि साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि किसी भी समाज की जीवित पहचान और उसकी सभ्यता का दर्पण होता है. जब मैंने देखा कि हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी ही मातृभाषा हो को पढ़ने के लिए पुस्तकों के अभाव में जूझ रही है, तब मैंने अपनी कलम को ही अपना संकल्प बना लिया. मेरा उद्देश्य केवल स्वयं को स्थापित करना नहीं, बल्कि उस हर आदिवासी युवा के भीतर आत्मविश्वास जगाना है जो अपनी जड़ों से कट रहा है. उन्होंने कहा कि जब हम अपनी भाषा और साहित्य को सहेजते हैं, तभी हम अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखते हैं. इसकी शुरूआत किसी दूसरे के भरोसे नहीं हो सकती है, बल्कि इसकी शुरुआत खुद से करनी होती है.

Post a Comment

0 Comments