पवित्र प्रसाद या देवी-देवताओं का भोग
आदिवासी समाज में हंडिया को बहुत पवित्र माना जाता है। दिकूराम सोरेन जैसे जानकार इसे श्रद्धा से जोड़ते हैं। पूजा-पाठ में हंडिया का होना अनिवार्य है। इसके बिना कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं होता। मरांग बुरु और अन्य देवी-देवताओं को यह अर्पित किया जाता है। चढ़ावे के बाद लोग इसे प्रसाद के रूप में लेते हैं। यह आस्था और विश्वास का प्रतीक है। इसे अपवित्र मानना परंपरा का अपमान माना जाता है।
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गरीबों का भोजन व ऊर्जा का स्रोत बन गया है हंडिया
सुदूर गांव-देहात में हंडिया केवल नशा नहीं है। यह गरीब मजदूरों के लिए भोजन के समान है। कड़ी धूप में काम करने वाले किसान इसे पीते हैं। ट्रैक्टर चालक और मजदूर इसे ऊर्जा का स्रोत मानते हैं। दोपहर की थकान मिटाने के लिए यह सस्ता साधन है। कई ग्रामीण सुबह से दोपहर तक इसी पर निर्भर रहते हैं। उनके लिए यह पेट भरने का एक जरिया है। कम खर्च में यह उन्हें दिनभर की शक्ति देता है।
शादी-ब्याह व सामाजिक समारोहों में होता है इसका उपयोग
समय के साथ हंडिया का उपयोग बदल गया है। देवीलाल होनहागा बताते हैं कि अब यह हर समारोह में है। चाहे शादी हो या छठी, हंडिया जरूरी हो गई है। जन्मदिन की पार्टियों में भी इसका धड़ल्ले से उपयोग होता है। खुशी के मौके पर इसे बांटना रिवाज बन गया है। पहले यह केवल विशेष पूजा तक सीमित था। अब यह हर सामाजिक मिलन का हिस्सा बन चुका है। इसी वजह से इसका असली महत्व कम होने लगा है।
सड़क किनारे व हाट-बाजार में बिकता है खुलेआम
आज हंडिया का सबसे खराब रूप सड़कों पर दिखता है। कोल्हान समेत पूरे झारखंड में इसकी खुलेआम बिक्री होती है। हाट-बाजार और सड़क किनारे महिलाएं इसे बेचती हैं। लोग इसे अब प्रसाद नहीं, बल्कि नशा मानकर पीते हैं। सुबह से ही अड्डों पर भीड़ लग जाती है। व्यावसायिक रूप मिलने से इसकी शुद्धता भी खत्म हो रही है। ज्यादा नशा के लिए इसमें मिलावट की खबरें आती हैं। यह सामाजिक पतन का एक बड़ा कारण बन गया है।
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हंडिया पीने से बर्बाद हो रहे घर व स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा बुरा असर
हंडिया की लत ने कई घरों को उजाड़ दिया है। सुदूर गांवों में लोग काम-धंधा छोड़कर दिनभर पीते हैं। इससे परिवारों में झगड़े और आर्थिक तंगी बढ़ रही है। अत्यधिक सेवन से लिवर और किडनी खराब हो रही है। युवा पीढ़ी इसके चंगुल में फंसती जा रही है। लोग अपनी जिम्मेदारी भूलकर नशे में डूबे रहते हैं। जो चीज प्रसाद थी, वह अब अभिशाप बन रही है। गांव के विकास की रफ्तार इससे धीमी पड़ गई है।
स्वशासन व्यवस्था के अगुवाओं की बढ़ गयी है सामाजिक जिम्मेदारी
अब समय आ गया है कि समाज के अगुआ जागें। स्वशासन व्यवस्था के नेताओं को इस पर मंथन करना होगा। ग्राम प्रधान और मांझी बाबा को नियम बनाने होंगे। हंडिया के सही और मर्यादित उपयोग पर चर्चा जरूरी है। क्या इसे केवल पूजा तक सीमित रखा जा सकता है? क्या सड़कों पर इसकी बिक्री बंद होनी चाहिए? इन सवालों का जवाब समाज के भीतर से आना चाहिए। परंपरा को बचाने के लिए कड़े फैसले लेने होंगे।
जरूरत से ज्यादा उपयोग होता है हमेशा हानिकारक
अंग्रेजी में एक कहावत है-'एनीथिंग एक्सेस इज वेरी डेंजरस'। यानी किसी भी चीज की अति नुकसानदेह होती है। हंडिया के साथ भी यही हो रहा है। जब तक यह मर्यादा में था, तब तक ठीक था। नशा बनते ही यह समाज के लिए खतरा बन गया। आदिवासी-मूलवासी समाज को अपनी दिशा तय करनी होगी। परंपरा और नशे के बीच की लकीर पहचाननी होगी। तभी झारखंड की संस्कृति और स्वास्थ्य दोनों सुरक्षित रहेंगे।
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