Munga saag : विज्ञान युग की शुरुआत भले ही 1724-29 के बीच मानी जाती है, लेकिन आदिवासियों के पूर्वज हजारों वर्षों से प्रकृति प्रदत्त वनस्पतियों का उपयोग कर निरोगी और दीर्घायु जीवन जीते आए हैं। उस समय न तो आयरन की गोली की जरूरत थी, न ही अस्पतालों की। जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ रहते थे और प्रसव भी सामान्य रूप से घर पर होता था। आदिवासी समुदायों का प्रकृति से संबंध केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और पाराभौतिक होता है। वे हर वनस्पति में जीवनदायिनी शक्ति को देखते हैं और उसे सम्मान देते हैं। प्रकृति ने हमें अनेक औषधीय और स्वास्थ्यवर्धक वनस्पतियों का उपहार दिया है, जिनमें से एक अत्यंत गुणकारी पौधा है मुनगा साग, जिसे हम अपने स्थानीय बोली में "डाल खासी" कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम Moringa Oleifera है। यह पौधा प्रायः हर आदिवासी-कुड़मी घर, आंगन, बाड़ी और खेतों के मेड़ों पर अक्सर पाया जाता है। यह मात्र एक साग नहीं, बल्कि संपूर्ण हर्बल टॉनिक है, जो शरीर को पोषण, रोगों से रक्षा और दीर्घायु प्रदान करता है।




मुनगा में है भरपूर औषधीय गुण

मुनगा का प्रत्येक भाग- फल (सूटी/डंटल), पत्ता, फूल, बीज, गोंद और जड़-औषधीय गुणों से भरपूर है। आयुर्वेद के अनुसार मुनगा 300 से अधिक रोगों के उपचार में उपयोगी है। डॉक्टरों का भी मानना है कि यह उच्च और निम्न दोनों प्रकार के ब्लड प्रेशर में लाभदायक है। यदि बीपी अधिक है तो यह उसे नियंत्रित करता है, और यदि कम है तो उसे संतुलन में लाता है। मुनगा की फली से बना अचार और उसकी चटनी अनेक बीमारियों में लाभदायक होती है। यह स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य का भी खज़ाना है।


पोषण तत्वों से भरपूर

सहजन यानी मुनगा में पाए जाने वाले पोषक तत्व किसी भी आधुनिक पूरक आहार से कम नहीं हैं:

  1. दूध की तुलना में 4 गुना अधिक कैल्शियम
  2. अंडे और दूध से 2 गुना अधिक प्रोटीन
  3. गाजर से 4 गुना अधिक विटामिन A
  4. संतरे से 7 गुना अधिक विटामिन C
  5. केले से 3 गुना अधिक पोटैशियम
  6. पालक से अधिक आयरन (लोहा)

मुनगा को गरीबों का साग भी कहा जाता था

इतना गुणकारी होने के बावजूद आज मुनगा साग को हीन दृष्टि से देखा जाता है। विशेषकर आधुनिक बहुओं में यह भ्रांति फैली है कि साग खाने से चेहरा काला पड़ जाता है। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है- मुनगा साग त्वचा को निखारता है, रक्त की शुद्धि करता है और शरीर को बलवान बनाता है। इस गलतफहमी का ही परिणाम है कि आज की महिलाएं रक्त की कमी, कुपोषण, गर्भ विकार और दुर्बल शिशुओं की समस्याओं से जूझ रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मुनगा बहुत ही आसानी से उपलब्ध होना वाला साग है. हर आदिवासी-मूलवासी के घर के बाहर मुनगा साग होता है. घर में सब्जी नहीं होने पर मुनगा के पांच-छह डाल को तोड़कर तुरंत सब्जी बनाया लिया जाता है. आर्थिक रुप से गरीब परिवार मुनगा साग की सब्जी खाकर ही अपना जीवन व्यतीत करते आये हैं. लोग जाने-अनजाने में इतने अधिक गुणकारी सब्जी खाकर रहे हैं. यह आदिवासी-मूलवासी समाज को पता ही नहीं था. वर्तमान समय में आलम यह है कि अन्य समाज व समुदाय के लोग आदिवासी-मूलवासियों के घरों में दो डंठी बोलकर 10 डंठी तोड़कर ले जाते हैं और खाते हैं. वहीं कुछ लोग रोजाना सुबह में आते हैं और एक डंठी तोड़कर ले जाते हैं. उनका बस यही कहना होता है कि वे इसका जूस बनाकर पीयेंगे, ताकि उनका प्रेशर लेबल संतुलित रहे.


स्वास्थ्य संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा

मुनगा साग मात्र एक पौधा नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक वरदान है। हमें इसे अपनाकर अपनी पारंपरिक जीवनशैली और स्वास्थ्य संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। यह हमारी पहचान है, हमारी जड़ है और स्वास्थ्य का अनमोल खजाना भी। बताते चलें की कई कारोबारी मुनगा साग का बागान बनाये हुए हैं. वे मुनगा का पता व उसकी डंठी आदि को विदेशों में भेजकर अच्छी आमदनी कर रहे हैं.