Dalma News : परसुडीह के गदड़ा में दलमा राजा राकेश हेंब्रम के घर पर 20 अप्रैल को दलमा सेंदरा को लेकर एक बड़ी बैठक हुई। इसमें वन विभाग के अफसर और दलमा बुरु सेंदरा समिति के लोग जुटे। इसमें स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख व विभिन्न जगहों के सेंदरा वीर काफी संख्या में शामिल हुए. बैठक का मकसद सेंदरा पर्व को शांति से मनाना था। हर साल सेंदरा के दौरान वन विभाग और आदिवासियों के बीच बहस होती है। इस बार दोनों पक्षों ने अपनी बात खुलकर रखी। रेंजर दिनेश चंद्रा ने कहा कि परंपरा अपनी जगह है, लेकिन वन्यजीवों की सुरक्षा भी जरूरी है। इसलिए आदिवासी समाज को वर्तमान परिपेक्ष्य में सोचने की जरूरत है. आज आलम यह है कि जंगल में दिन-प्रतिदिन जंगली जानवरों की संख्या घटती जा रही है. जो गंभीर चिंता का विषय है. इसपर समय रहते आवश्यक पहल नहीं किया गया तो आने वाले समय में केवल किताब के पन्ने व पोस्टरों में जंगली जानवरों को देखा जा सकेगा. इसलिए जंगल को बचाने पर भी मुहिम को चलाने की जरूरत है. क्योंकि जंगल बचेगा तभी तो जंगली जानवर भी बचेंगे. यदि जंगल ही नहीं बचेगा और हम जंगली जानवरों को बचाने की बात करेंगे. यह बिलकुल ही उचित नहीं होगा. जंगल पर मनुष्य का दखल कम हो, इसपर भी चिंतन करने की जरूरत है. जंगल में मनुष्य घूमना-फिरना करेंगे तो जंगली जानवर भी अपना प्राकृतिक आवास छोड़ बस्तियों व शहरों में ही विचरण कर शुरू कर देंगे. जो हाल के दिनों में अक्सर देखना पड़ रहा है.

सेंदरा वीरों को परंपरा निभाने से कोई नहीं रोकेगा
वन विभाग ने साफ कहा कि सेंदरा वीरों को परंपरा निभाने से कोई नहीं रोकेगा। आदिवासी समाज अपने पारंपरिक हथियार लेकर जंगल में जा सकता है। विभाग को आदिवासियों की आस्था और पुरानी रीति-रिवाजों से कोई दिक्कत नहीं है। रेंजर ने भरोसा दिलाया कि वे समाज का सम्मान करते हैं। सेंदरा वीर बिना किसी डर के दलमा के घने जंगलों में घुस सकते हैं। विभाग की ओर से बेवजह कोई रोक-टोक नहीं की जाएगी। लेकिन समाज को भी अपनी जवाबदेही तय करना होगा. इस वन-पर्यावरण को सुंदर बनाये रखना सबों की जवाबदेही है. घने वन-जंगल में जंगली जानवर नहीं रहे तो इस सुंदरता खुद व खुद खत्म हो जायेगी.
जाल-फांस व बंदूक सेंदरा में ले जाने पर मनाही
बैठक में रेंजर दिनेश चंद्रा ने एक शर्त भी रखी। उन्होंने कहा कि सेंदरा वीर अपने साथ जाल, फांस या बंदूक जैसा कोई सामान न ले जाएं। ये चीजें परंपरा का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने अपील की कि आज के समय में जंगली जानवरों को बचाना सबकी जिम्मेदारी है। जानवरों की संख्या कम हो रही है, इसलिए शिकार से परहेज करना चाहिए। विभाग ने आदिवासियों को वन्यजीवों की अहमियत समझाई और उनसे सहयोग की उम्मीद जताई। वहीं समाज के लोगों ने भी उन्हें भरोसा दिलाया है कि वे अपनी जवाबदेही को भलीभांति समझते हैं.
आदिवासी ही हैं जंगल के असल रखवाले
दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने वन विभाग को करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की वजह से ही आज जंगल बचे हुए हैं। जहां आदिवासी रहते हैं, वहीं हरियाली और घने पेड़ होते हैं। उन्होंने कहा कि विभाग का काम सिर्फ कागजों पर है, लेकिन जमीन पर आदिवासी ही जंगल बचा रहे हैं। साल में सिर्फ एक दिन आदिवासी अपनी परंपरा निभाने जंगल जाते हैं। इसमें वन विभाग को बाधा नहीं डालनी चाहिए। कई लकड़ी माफिया विभाग के लोगों के साथ सांठ-गांठ कर वन को हानि पहुंचा रहे हैं. विभाग को इनपर लगाम लगाना चाहिए. वन लगातार कटकर खत्म हो रहे हैं.
हथियार छीनने पर कड़ा ऐतराज जताया
बैठक में राकेश हेंब्रम ने पुरानी कड़वाहट भी जाहिर की। उन्होंने कहा कि चेक नाकाओं पर तैनात वन कर्मी सेंदरा वीरों को परेशान करते हैं। उनके पारंपरिक हथियार छीन लिए जाते हैं, जो उनकी बेइज्जती है। राजा ने दोटूक कहा कि अगर इस बार सेंदरा वीरों को बेवजह रोका गया, तो समिति चुप नहीं बैठेगी। इसका पुरजोर विरोध किया जाएगा। उन्होंने विभाग को सलाह दी कि वे जंगली जानवरों को बस्तियों में आने से रोकने पर ध्यान दें। वन जंगल खत्म होंगे तो जंगली जानवरों को बस्तियों की ओर रुख करना लाजिमी है. वन विभाग जंगली जानवरों के घर को तहस-नहस होने से बचाये. वर्तमान में सच्चाई यही है कि जंगल सिर्फ कहने के लिए जंगल रह गया है. जंगल में बड़े पेड़-पौधों को चोरी-छिपे काटकर ले जाया जा रहा है.
वन देवताओं से सेंदर के लिए मांगेंगे अनुमति
इस साल 27 अप्रैल को दलमा में सेंदरा पर्व मनाया जाएगा। दलमा राजा 25 अप्रैल को अपने घर से निकलेंगे। शाम को सभी सेंदरा वीर दलमा के फदलोगोड़ा में जमा होंगे। वहां सबसे पहले वन देवी-देवताओं की पूजा होगी। आदिवासी समाज उनसे सेंदरा के लिए आज्ञा मांगेगा। सेंदरा वीरों की सलामती और अच्छी बारिश के लिए दुआ की जाएगी। यह पूजा आदिवासियों के लिए बहुत पवित्र और महत्वपूर्ण मानी जाती है।
हजारों सेंदरा वीरों का होगा जमावड़ा
सेंदरा के दिन अलग-अलग इलाकों से हजारों की संख्या में आदिवासी दलमा पहुंचेंगे। यह सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की वीरता और पहचान का प्रतीक है। सेंदरा समिति ने साफ कर दिया है कि वे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। अब गेंद वन विभाग के पाले में है कि वह किस तरह समन्वय बनाता है। 27 अप्रैल को पूरे दलमा में आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। सेंदरा वीर जोश के साथ जंगल में अपनी रीत निभाएंगे। 26 अप्रैल की दोपहर के बाद से ही दलमा के तराई गांव व गिपितीज टांडी में सेंदरा वीरों का आना शुरू हो जायेगा. जहां वे रात्रि विश्राम करने के बाद 27 अप्रैल को तड़के सुबह सेंदरा के लिए दलमा में चढ़ाई करेंगे.
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