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Dalma sendra 2026: दलमा राजा ने सेंदरा वीरों को पारंपरिक निमंत्रण पत्र गिरा सकाम बांटा

Dalma sendra 2026: झारखंड और ओडिशा की सीमाओं पर फैले दलमा वन्यजीव अभयारण्य में इस वर्ष भी पारंपरिक 'दिसुआ सेंदरा' (शिकार पर्व) की तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो गई हैं। शुक्रवार को जमशेदपुर के परसुडीह स्थित गदड़ा में दलमा राजा राकेश हेंब्रम के आवास पर विशेष पूजा-अर्चना के साथ इस धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन का शंखनाद किया गया। आदिवासी परंपरा के अनुसार, इस दिन वन देवी-देवताओं का आह्वान कर शिकार की अनुमति मांगी गई और शिकार की तिथि की आधिकारिक घोषणा की गई। सेंदरा पूजा में दलमा राजा राकेश हेंब्रम के साथ दशमत हांसदा, लालसिंह गागराई, डेमका सोय, दुर्गाचरण मुर्मू, संपूर्ण सांवैया, लिटा बानसिंह, सुकरा बारजो, लेदेम मुर्मू, सेलाई गागराई, सलाई गागराई, भगत मुर्मू, शंकर गागराई, सरोज सामद, बाल्ही मार्डी और बुदुज मुर्मू समेत अन्य कार्यकर्ता व ग्रामीण शामिल थे। सभी ने एक स्वर में सेंदरा पर्व को शांतिपूर्ण और पारंपरिक तरीके से मनाने का संकल्प लिया।




वन देवी-देवताओं की पूजा कर मांगा आशीर्वाद

आदिवासी समाज में किसी भी बड़े आयोजन से पहले प्रकृति और वन देवताओं की अनुमति लेने की सदियों पुरानी परंपरा है। इसी कड़ी में गदड़ा स्थित दलमा राजा के आवास पर शुक्रवार को विशेष अनुष्ठान आयोजित किया गया। इस दौरान वन देवी-देवताओं की पूजा की गई और उनसे प्रार्थना की गई कि सेंदरा पर्व निर्विघ्न संपन्न हो। समाज के बुजुर्गों और पुजारियों ने विधिवत मंत्रोच्चार के साथ सेंदरा की तिथि के बारे में देवताओं को अवगत कराया और शिकार वीरों की रक्षा व सफलता का आशीर्वाद मांगा।



24 गांठों वाला 'गिरा सकाम' किया तैयार

इस अनुष्ठान का सबसे मुख्य हिस्सा 'गिरा सकाम' तैयार करना था। दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने खजूर के पत्तों से पारंपरिक गिरा सकाम बनाया, जिसमें कुल 24 गांठें बांधी गईं। इन 24 गांठों का सीधा अर्थ है कि आज से ठीक 24वें दिन 'दिसुआ सेंदरा' का मुख्य पर्व मनाया जाएगा। गणना के अनुसार, शनिवार से प्रतिदिन एक-एक गांठ खोली जाएगी और अंतिम गांठ 27 अप्रैल को खुलेगी। इसी दिन दलमा की पहाड़ियों पर हजारों आदिवासी शिकार के लिए जुटेंगे।

क्या है 'गिरा सकाम' और इसका महत्व?

आधुनिक दौर में जहां निमंत्रण के लिए फोन और सोशल मीडिया का सहारा लिया जाता है, वहीं आदिवासी समाज आज भी अपनी प्राचीन संचार पद्धति 'गिरा सकाम' को जीवित रखे हुए है। यह खजूर के पत्तों से बनाई गई एक विशेष माला या डोरी होती है। इसमें सेंदरा पर्व के शेष दिनों के बराबर गांठें बांधी जाती हैं। हर सुबह एक गांठ खोलकर दिनों की गिनती की जाती है। यह न केवल एक कैलेंडर की तरह काम करता है, बल्कि इसे सेंदरा वीरों के लिए एक पवित्र निमंत्रण पत्र भी माना जाता है।

कोल्हान समेत पड़ोसी राज्यों को भेजा गया न्योता

दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने बताया कि इस पारंपरिक गिरा सकाम को कोल्हान प्रमंडल (पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां) के अलावा पड़ोसी राज्य ओडिशा और पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों में भेजा जा रहा है। गिरा सकाम मिलने के साथ ही गांवों के शिकार वीरों में उत्साह की लहर दौड़ जाती है। समाज के प्रमुख लोगों के माध्यम से यह संदेश हर टोले-मोहल्ले तक पहुंचाया जा रहा है कि दिसुआ सेंदरा की तिथि तय हो चुकी है और सभी को अपनी परंपरा निभाने के लिए तैयार रहना है।

पारंपरिक हथियारों के साथ जुटेंगे 'सेंदरा वीर'

सेंदरा पर्व केवल शिकार मात्र नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज के शौर्य, एकता और प्रकृति के साथ उनके जुड़ाव का प्रतीक है। राकेश हेंब्रम ने अपील की है कि 27 अप्रैल को कोल्हान और अन्य क्षेत्रों के आदिवासी भाई अपने पारंपरिक हथियारों जैसे धनुष-बाण, टांगी और तलवार के साथ भारी संख्या में दलमा पहुंचें। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस वर्ष हजारों की संख्या में लोग इस आयोजन में शिरकत करेंगे और अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाएंगे।

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