https://omg10.com/4/11146156 बंजर जमीन से बरसों की गरीबी दूर कर रहे रांगामाटिया के किसान, आम और सब्जियों की खेती से सालाना लाखों की कमाई
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बंजर जमीन से बरसों की गरीबी दूर कर रहे रांगामाटिया के किसान, आम और सब्जियों की खेती से सालाना लाखों की कमाई

 जमशेदपुर: मेहनत, सही मार्गदर्शन और आधुनिक कृषि तकनीक अगर एक साथ मिल जाएं, तो बंजर धरती भी सोना उगलने लगती है। ऐसा ही एक अद्भुत और प्रेरणादायक बदलाव देखने को मिला है सरायकेला-खरसावां जिले के सरायकेला प्रखंड अंतर्गत आने वाले रांगामाटिया गांव में। यहां के 16 आदिवासी किसानों ने अपनी सूझबूझ और कड़ी मेहनत के दम पर उस जमीन की तकदीर बदल दी है, जिसे कभी पूरी तरह अनुपजाऊ मानकर छोड़ दिया गया था। कभी घोर आर्थिक तंगी और अनिश्चितता का जीवन जीने वाले ये किसान आज अपनी ही जमीन पर बागवानी क्रांति की नई इबारत लिख रहे हैं। नाबार्ड (NABARD) और टाटा स्टील फाउंडेशन (TSF) के संयुक्त सहयोग से शुरू हुई एक छोटी सी सरकारी व संस्थागत पहल ने आज पूरे रांगामाटिया गांव के सामाजिक और आर्थिक जीवन स्तर को फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया है।



बंजर भूमि बनी हरा-भरा आम का बगीचा

रांगामाटिया गांव के किसानों के पास मौजूद जो जमीन पथरीली, सूखी और बंजर होने के कारण सालों से बेकार पड़ी थी, आज वह दूर-दूर तक लहलहाते आम के विशाल बागों में तब्दील हो चुकी है। इस कृषि क्रांति की कमान गांव के ही एक प्रगतिशील और जागरूक किसान सोनाराम सोरेन ने संभाली। सोनाराम ने परंपरागत खेती की रूढ़ियों को तोड़ते हुए अपनी एक एकड़ बंजर पड़ी भूमि पर प्रयोग करने की ठानी। उन्होंने इस जमीन को कृषि योग्य बनाकर आम के 100 से अधिक उन्नत किस्म के पौधे रोपे। उनकी दिन-रात की देखरेख का नतीजा यह हुआ कि पौधे धीरे-धीरे बड़े पेड़ों में बदल गए। पिछले 4 वर्षों से सोनाराम को अपने इस बगीचे से हर साल 4 से 5 टन आम की बंपर पैदावार मिल रही है। स्थानीय और नजदीकी शहरी बाजारों में इस उत्तम गुणवत्ता वाले आम को बेचकर वे हर साल 2 से 3 लाख रुपये तक की शानदार शुद्ध कमाई कर रहे हैं।

इंटरक्रॉपिंग मॉडल: एक ही खेत से दोगुना मुनाफा

रांगामाटिया के इन 16 किसानों ने सिर्फ आम की फसल के भरोसे रहने के बजाय बेहद बुद्धिमानी भरा फैसला लिया और खेती में इंटरक्रॉपिंग (सह-फसल पद्धति) के मॉडल को अपनाया। चूंकि आम के पौधों के बीच में काफी खाली जगह बची रहती है, इसलिए किसानों ने उस जमीन का शत-प्रतिशत उपयोग करने की योजना बनाई। वे आम के पेड़ों के बीच की खाली भूमि पर बैंगन, टमाटर, बंधा गोभी, भिंडी और आलती जैसी विभिन्न मौसमी साग-सब्जियों की बड़े पैमाने पर खेती कर रहे हैं। इस दोहरी खेती का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि आम की फसल तो साल में एक बार मोटी रकम देती ही है, लेकिन इन सब्जियों को स्थानीय बाजारों में नियमित रूप से बेचने से किसानों को सालाना लगभग 1 लाख रुपये की अतिरिक्त आमदनी भी हो जाती है। यह इंटरक्रॉपिंग मॉडल साल के बारह महीने किसानों की जेब में नगदी का प्रवाह बनाए रखता है, जिससे उन्हें रोजमर्रा के खर्चों के लिए कभी परेशान नहीं होना पड़ता।



पारंपरिक धान की खेती के मुकाबले कम लागत और बंपर फायदा

सफलता की नई कहानी लिख रहे किसान सोनाराम सोरेन अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताते हैं कि पारंपरिक रूप से की जाने वाली धान की खेती की तुलना में आम और सब्जियों की यह आधुनिक बागवानी कहीं अधिक सुरक्षित और कई गुना मुनाफा देने वाली है। पहले जब वे सिर्फ धान की खेती पर निर्भर थे, तब सालभर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद केवल एक बार फसल हाथ आती थी। मौसम की बेरुखी और सिंचाई के साधनों की कमी के कारण महज 50 से 60 हजार रुपये की ही वार्षिक आय हो पाती थी, जो लागत और परिवार के भरण-पोषण के हिसाब से बेहद कम थी। इसके विपरीत, आम की बागवानी में शुरुआती दौर के बाद शारीरिक मेहनत काफी कम हो जाती है और केवल समय पर थोड़ी-बहुत बुनियादी देखभाल, कटाई-छंटाई व जैविक खादों की जरूरत होती है। जबकि इसके बदले मिलने वाला आर्थिक रिटर्न धान के मुकाबले चार से पांच गुना ज्यादा और पूरी तरह स्थिर है।

ग्रामीण पलायन पर लगी रोक, नई पीढ़ी को मिली उच्च शिक्षा

रांगामाटिया गांव में आई इस अभूतपूर्व कृषि क्रांति ने न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारी है, बल्कि उनके पूरे जीवन स्तर और रहन-सहन को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। इस सफल मॉडल का सबसे सकारात्मक सामाजिक प्रभाव यह पड़ा है कि क्षेत्र से होने वाला ग्रामीण पलायन पूरी तरह रुक गया है। पहले के दिनों में धान की मानसूनी खेती खत्म होने के बाद पेट पालने और कर्ज चुकाने के लिए गांव के अधिकांश पुरुषों को बड़े शहरों या औद्योगिक क्षेत्रों की फैक्ट्रियों में दिहाड़ी मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ता था। लेकिन अब अपने ही खेतों से सालभर बंपर कमाई होने के कारण उन्हें इस मानसिक और शारीरिक शोषण वाली स्थिति से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई है। इस आर्थिक आत्मनिर्भरता का सबसे खूबसूरत और दूरगामी फायदा गांव की नई पीढ़ी को मिल रहा है। आर्थिक रूप से सक्षम हो चुके ये किसान अब अपने बच्चों को गांव के सरकारी स्कूलों के भरोसे छोड़ने के बजाय शहर के नामचीन और अच्छे अंग्रेजी माध्यम स्कूलों व कॉलेजों में उच्च शिक्षा दिला रहे हैं, ताकि उनका भविष्य और उज्ज्वल हो सके।

नाबार्ड और टाटा स्टील फाउंडेशन ने 'वाड़ी प्रोजेक्ट' से संवारी तकदीर

किसानों की इस ऐतिहासिक और प्रेरक सफलता के पीछे नाबार्ड (NABARD) और टाटा स्टील फाउंडेशन का बेहद मजबूत, रणनीतिक और तकनीकी सहयोग रहा है, जो उनके संकट के समय में सारथी बनकर सामने आए। वर्ष 2016 में संस्थाओं द्वारा ग्रामीण विकास के उद्देश्य से शुरू किए गए महत्वाकांक्षी 'वाड़ी प्रोजेक्ट' (Wadi Project) के तहत रांगामाटिया गांव के इन 16 गरीब किसानों का चयन किया गया था। यह विशेष परियोजना 30 मार्च 2016 से लेकर 31 मार्च 2025 तक कुल नौ वर्षों तक जमीनी स्तर पर पूरी सक्रियता के साथ चलाई गई। प्रोजेक्ट के तहत किसानों को न केवल आम के उच्च पैदावार देने वाले ग्राफ्टेड पौधे मुफ्त उपलब्ध कराए गए, बल्कि वैज्ञानिक पद्धति से गड्ढे खोदने, जैविक खाद तैयार करने, आधुनिक ड्रिप सिंचाई (टपक सिंचाई) की व्यवस्था दुरुस्त करने और तैयार फसल को सही बाजार मूल्य दिलाने (मार्केटिंग) तक हर मोड़ पर हरसंभव मदद दी गई। हालांकि, तय समयावधि के अनुसार यह प्रोजेक्ट अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुका है, लेकिन दोनों संस्थाओं के कृषि विशेषज्ञ और पदाधिकारी आज भी बीच-बीच में गांव का दौरा करते रहते हैं। वे किसानों को नई बीमारियों से बचाव, उन्नत कटाई तकनीकों और सॉइल हेल्थ की जरूरी सलाह व तकनीकी सहयोग निरंतर प्रदान करते हैं, जिससे रांगामाटिया की यह सफलता बिना रुके लगातार आगे बढ़ रही है और आस-पास के गांवों के लिए भी एक रोल मॉडल बन चुकी है।

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