Jamshedpur: जमशेदपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में औद्योगिक विकास की नींव रखने वाली टाटा कंपनी और स्थानीय मूलवासियों के बीच का भूमि विवाद एक बार फिर गरमा गया है। झारखंड के स्थानीय राजनीति और जन-आंदोलनों में तेजी से उभर रहे डुमरी के विधायक जयराम महतो अब इस संवेदनशील और ऐतिहासिक मुद्दे को झारखंड विधानसभा के पटल पर उठाने जा रहे हैं। हाल ही में झारखंड मूलवासी अधिकार मंच एवं टाटा विस्थापित आंदोलनकारी मंच के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने विधायक जयराम महतो से मुलाकात की और उन्हें विस्थापितों व रैयतों की समस्याओं से जुड़ा एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। विधायक ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया है कि वे इस जन-आकांक्षा से जुड़े मुद्दे को सदन में मजबूती से रखेंगे और विस्थापितों को उनका हक दिलाने का प्रयास करेंगे।
झारखंड मूलवासी अधिकार मंच ने विधायक से की मुलाकात
इस पूरे मामले की अगुवाई झारखंड मूलवासी अधिकार मंच एवं टाटा विस्थापित आंदोलनकारी मंच के संयोजक हरमोहन महतो कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में विस्थापितों और मूलवासियों के एक बड़े प्रतिनिधिमंडल ने डुमरी विधानसभा क्षेत्र के लोकप्रिय विधायक जयराम महतो से शिष्टाचार मुलाकात की। इस मुलाकात का मुख्य उद्देश्य टाटा कंपनी की स्थापना के समय से चले आ रहे विस्थापितों के दर्द और लीज नवीकरण की विसंगतियों को सरकार के सामने लाना था। मंच के सदस्यों ने विधायक को बताया कि दशकों बीत जाने के बाद भी आज तक कई विस्थापित परिवारों को न तो उचित मुआवजा मिला है और न ही पहचान। विधायक जयराम महतो ने इस मामले की गंभीरता को समझा और मंच को भरोसा दिलाया कि मूलवासियों और आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की इस लड़ाई को वे विधानसभा के आगामी सत्र में पूरी ताकत के साथ उठाएंगे।
18 मौजा के विस्थापितों का सर्वे और प्रमाण पत्र की मांग
प्रतिनिधिमंडल द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में सबसे प्रमुख और बुनियादी मांग टाटा कंपनी की स्थापना के दौरान विस्थापित हुए 18 मौजा (गांवों) के मूल रैयतों, खतियानधारी आदिवासियों और मूलवासी परिवारों से जुड़ी है। मंच का कहना है कि सरकार और प्रशासन को तुरंत इन 18 मौजा का एक व्यापक और पारदर्शी सर्वे कराना चाहिए। इस सर्वे के आधार पर सभी प्रभावित परिवारों की पहचान की जाए और उन्हें आधिकारिक 'विस्थापित प्रमाण पत्र' जारी किया जाए। यह प्रमाण पत्र न केवल उनकी ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित करेगा, बल्कि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और पुनर्वास नीतियों का लाभ उठाने के लिए एक वैध दस्तावेज साबित होगा। मंच ने साफ किया है कि बिना पहचान के विस्थापितों को न्याय देना असंभव है।
मुआवजा, पुनर्वास, रोजगार और भूमि वापसी पर जोर
ज्ञापन में विस्थापित परिवारों के आर्थिक और सामाजिक पुनर्वास के लिए एक ठोस नीति बनाने की मांग की गई है। सालों पहले अपनी उपजाऊ जमीनें खोने वाले इन परिवारों के पास आज आजीविका का कोई स्थाई साधन नहीं है। इसलिए, मंच ने मांग की है कि सभी प्रभावित खतियानधारियों को उचित और वर्तमान बाजार दर के अनुसार मुआवजा दिया जाए। इसके साथ ही, उनके रहने के लिए सर्वसुविधायुक्त पुनर्वास स्थलों का निर्माण किया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन परिवारों के युवाओं को रोजगार के अवसर दिए जाएं। यदि किसी तकनीकी या कानूनी कारण से अधिग्रहित की गई भूमि का उपयोग नहीं हो पाया है, तो वैसी जमीनों की तुरंत पहचान कर उन्हें मूल रैयतों को वापस (भूमि वापसी) सौंपा जाए।
वर्ष 1996 के खतियान का विरोध और पुराने खतियानों को मान्यता
भूमि अधिकारों की इस लड़ाई में खतियान का वर्ष एक बहुत बड़ा तकनीकी और कानूनी पेंच बन चुका है। झारखंड मूलवासी अधिकार मंच ने अपनी मांगों में यह स्पष्ट किया है कि वर्ष 1996 में किए गए सर्वे खतियान को पूरी तरह से निरस्त किया जाना चाहिए। मंच का आरोप है कि 1996 के सर्वे में कई विसंगतियां थीं, जिससे मूल रैयतों के अधिकारों का हनन हुआ। इसके स्थान पर, मंच ने मांग की है कि ब्रिटिश काल के दौरान हुए वर्ष 1908 और वर्ष 1937 के खतियानों को ही पूर्ण कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए। आंदोलनकारियों का तर्क है कि 1908 और 1937 के खतियान ही इस क्षेत्र के आदिवासियों और मूलवासियों की भूमि की वास्तविक स्थिति और उनके मालिकाना हक को दर्शाते हैं।
वर्ष 2005 के टाटा लीज नवीकरण की जिलास्तरीय जांच की मांग
विस्थापितों के आंदोलन का एक बड़ा निशाना वर्ष 2005 में हुआ टाटा लीज नवीकरण (Tata Lease Renewal) भी है। सौंपे गए ज्ञापन में इस बात का विशेष उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2005 में हुए लीज नवीकरण की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की भारी कमी थी। मंच ने सरकार से मांग की है कि इस पूरे लीज नवीकरण मामले की एक उच्चस्तरीय या जिलास्तरीय जांच और समीक्षा (Review) कराई जाए। आंदोलनकारियों का दावा है कि इस लीज प्रक्रिया में कई ऐसी जमीनों को भी शामिल कर लिया गया जो नियमों के दायरे में नहीं आती थीं। इसके अलावा, जिन रैयतों की पैतृक भूमि लीज प्रक्रिया के दौरान छूट गई थी या जिन्हें जानबूझकर इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया था, उन्हें चिन्हित कर उनकी जमीनें वापस लौटाई जाएं। साथ ही, बिना किसी वैध लीज या भूमि अधिग्रहण के कंपनी के अवैध कब्जे में मौजूद जमीनों की पहचान कर उन्हें खाली कराया जाए।
संयुक्त निगरानी समिति और पेसा कानून का अनुपालन
हरमोहन महतो द्वारा सौंपे गए इस ज्ञापन में कुल 15 मांगें शामिल हैं, जो विस्थापितों की दशा सुधारने के लिए एक मुकम्मल रोडमैप की तरह हैं। इसमें एक प्रमुख मांग यह है कि रैयतों, विस्थापितों, ग्रामसभा के प्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को मिलाकर एक 'संयुक्त जिलास्तरीय निगरानी समिति' (Joint Monitoring Committee) का गठन किया जाए। यह समिति समय-समय पर विस्थापितों की समस्याओं की समीक्षा करेगी। इसके अतिरिक्त, टाटा स्टील (Tata Steel) में होने वाली स्थानीय नियुक्तियों में खतियानधारी और विस्थापित परिवारों के युवाओं को प्राथमिकता (Reservation/Preference) देने की बात कही गई है। सबसे बड़ी मांग जल-जंगल-जमीन की रक्षा करने वाले 'पेसा कानून' (PESA Act) को लेकर है। मंच ने मांग की है कि पेसा कानून के तहत स्थानीय ग्रामसभा की लिखित सहमति के बिना भूमि से जुड़ा कोई भी प्रशासनिक या कॉर्पोरेट निर्णय न लिया जाए।
विस्थापितों के हक के लिए सड़क से लेकर सदन तक की लड़ाई लड़ने को तैयार
जमशेदपुर में शुरू हुआ यह आंदोलन अब केवल कुछ गांवों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे पूरे कोल्हान क्षेत्र के मूलवासियों का समर्थन मिल रहा है। विधायक जयराम महतो को ज्ञापन सौंपने वाले इस प्रतिनिधिमंडल में क्षेत्र के कई जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और आंदोलनकारी शामिल थे। संयोजक हरमोहन महतो के साथ इस मौके पर अबोध सिंह, अभिमन्यु गोप, सानंद प्रधान, उत्तम प्रधान, प्रह्लाद गोप, रामचंद्र महतो, राम सिंह भूमिज, मनोज बोदरा, तपन महतो, मधुसूदन प्रधान, अनीता महतो और नीलचंद महतो सहित दर्जनों ग्रामीण उपस्थित थे। इन सभी नेताओं ने एक सुर में कहा कि वे अपनी जमीनों की रक्षा और विस्थापितों के हक के लिए सड़क से लेकर सदन तक की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं और विधायक जयराम महतो का आश्वासन इस लड़ाई में उनके लिए एक बड़ी ताकत बनकर उभरा है।
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