जंगलों की पहचान रहा केंदू, अब अस्तित्व बचाने की चुनौती
Jamshedpur News: झारखंड के जंगलों में कभी बड़ी संख्या में पाया जाने वाला केंदू (केंद) का वृक्ष आज धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अपनी प्राकृतिक मिठास, औषधीय गुणों और आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत के रूप में पहचान रखने वाला यह वृक्ष अब जंगलों में पहले की तुलना में काफी कम दिखाई देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय था जब गर्मी के मौसम में जंगलों के अधिकांश हिस्से केंदू फलों से लदे रहते थे, लेकिन अब ऐसे दृश्य दुर्लभ होते जा रहे हैं।
केंदू केवल एक फलदार वृक्ष नहीं है, बल्कि झारखंड की जैव विविधता और आदिवासी जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इसके फल बच्चों और ग्रामीणों के लिए स्वादिष्ट प्राकृतिक आहार का स्रोत रहे हैं, वहीं इसकी पत्तियां और लकड़ी भी स्थानीय उपयोग में आती रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इसके संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां इस वृक्ष को केवल पुस्तकों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी।
क्यों घट रही है केंदू वृक्षों की संख्या?
पर्यावरणविदों और स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार केंदू वृक्षों की संख्या घटने के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण अनियंत्रित कटाई और जंगलों का लगातार सिकुड़ना है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसकी लकड़ी और जड़ों का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इसकी लकड़ी जलने पर विशेष प्रकार की नीली लौ और चटकने की आवाज उत्पन्न करती है, जिसके कारण कई लोग इसे पसंद करते हैं।
इसके अलावा मकर संक्रांति और अन्य पारंपरिक अवसरों पर बच्चों और युवाओं द्वारा केंदू की टहनियों और छोटे वृक्षों को काटकर जलाने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में देखी जाती रही है। इससे नए पौधों के विकसित होने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि केंदू का प्राकृतिक पुनर्जनन भी अपेक्षाकृत धीमा होता है। इसके बीजों से नए पौधे कम संख्या में उगते हैं और उन्हें परिपक्व होने में कई वर्ष लगते हैं। यही कारण है कि कटे हुए वृक्षों की भरपाई प्रकृति स्वयं तेजी से नहीं कर पाती। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान और जंगलों में लगने वाली आग भी इसके अस्तित्व पर गंभीर प्रभाव डाल रहे हैं।
आदिवासी संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा है केंदू
झारखंड के संताल, मुंडा, हो और अन्य आदिवासी समुदायों के जीवन में केंदू का विशेष महत्व रहा है। यह केवल एक फल नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। गर्मी के दिनों में बच्चे और महिलाएं जंगलों से केंदू फल संग्रह कर घर लाते हैं। कई ग्रामीण बाजारों और हाटों में इसकी बिक्री भी होती है, जिससे परिवारों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। जादूगोड़ा, घाटशिला, चाकुलिया, पटमदा और बहरागोड़ा क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में आज भी महिलाएं और बच्चे मौसमी बाजारों में केंदू बेचते हुए दिखाई देते हैं। यात्रियों और स्थानीय लोगों के बीच इसकी काफी मांग रहती है। केंदू फल में प्राकृतिक मिठास, विटामिन और खनिज तत्व पाए जाते हैं। पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में भी इसका उपयोग किया जाता रहा है। ग्रामीणों का मानना है कि यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करने के साथ कई छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याओं में लाभकारी होता है।
जंगल बचेगा तभी केंदू बचेगा: सोलमा हांसदा
गांव की महिला सोलमा हांसदा ने केंदू वृक्षों की घटती संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जब मैं छोटी थी तब हमारे गांव के आसपास के जंगलों में बहुत अधिक केंदू के पेड़ हुआ करते थे। गर्मी आते ही बच्चे और महिलाएं जंगलों में जाकर केंदू फल चुनते थे। आज हालत यह है कि कई किलोमीटर जंगल घूमने के बाद भी पहले जैसी मात्रा में फल नहीं मिलते। इसका सबसे बड़ा कारण पेड़ों की लगातार कटाई है। लोग ईंधन के लिए छोटे-छोटे केंदू के पेड़ों को भी काट देते हैं। जंगलों में आग लगने से भी नए पौधे नष्ट हो जाते हैं। पहले गांव के बुजुर्ग जंगल और पेड़ों की रक्षा करते थे, लेकिन अब लोगों की सोच बदल रही है। हम केवल उपयोग करना जानते हैं, संरक्षण करना भूलते जा रहे हैं। यदि गांव के लोग मिलकर हर साल केंदू के पौधे लगाएं और उनकी देखभाल करें तो स्थिति सुधर सकती है। स्कूलों में बच्चों को भी स्थानीय वृक्षों के महत्व के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए। जंगल बचेगा तभी केंदू बचेगा और हमारी संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी।”
संरक्षण नहीं हुआ तो इतिहास बन जाएगा केंदू:रमेश चंद्र हेंब्रम
सामाजिक कार्यकर्ता एवं ग्रामीण जागरूकता अभियान से जुड़े रमेश चंद्र हेंब्रम ने कहा कि केंदू वृक्षों की घटती संख्या केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संकट भी है। यह वृक्ष सदियों से आदिवासी जीवन का हिस्सा रहा है। दुर्भाग्य की बात है कि आज जंगलों में अंधाधुंध कटाई, खनन गतिविधियों के विस्तार और जागरूकता की कमी के कारण इसकी संख्या तेजी से कम हो रही है। केंदू का प्राकृतिक पुनर्जनन बहुत धीमा होता है। यदि एक पेड़ काट दिया जाता है तो उसकी जगह दूसरा पेड़ तैयार होने में वर्षों लग जाते हैं। इसलिए केवल वृक्षारोपण ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौजूदा वृक्षों की सुरक्षा भी जरूरी है। सरकार, वन विभाग, पंचायत और ग्रामीण समुदाय को मिलकर विशेष अभियान चलाना चाहिए। यदि आज हमने संरक्षण की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए तो आने वाले वर्षों में केंदू केवल इतिहास का हिस्सा बन जाएगा। यह समय चेतने और सामूहिक जिम्मेदारी निभाने का है। स्थानीय लोगों को इसके संरक्षण में भागीदार बनाना सबसे प्रभावी उपाय होगा।”
संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि केंदू वृक्षों को बचाने के लिए व्यापक स्तर पर अभियान चलाने की आवश्यकता है। स्कूलों और कॉलेजों में स्थानीय वृक्षों के महत्व पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। पंचायत स्तर पर विशेष वृक्षारोपण अभियान चलाकर केंदू के पौधे लगाए जा सकते हैं। वन विभाग को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जहां केंदू वृक्षों की संख्या तेजी से घट रही है। वहां संरक्षण क्षेत्र विकसित कर पौधों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। ग्रामीण समुदायों को भी इसके संरक्षण के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्रत्येक गांव में सामुदायिक नर्सरी स्थापित कर स्थानीय प्रजातियों के पौधे तैयार किए जाएं। इससे केंदू सहित अन्य पारंपरिक वृक्षों का संरक्षण संभव होगा।
आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाना होगा प्राकृतिक विरासत
केंदू झारखंड की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत का अनमोल हिस्सा है। यह केवल एक वृक्ष नहीं बल्कि जंगल, पर्यावरण, आजीविका और आदिवासी पहचान का प्रतीक है। इसकी घटती संख्या प्रकृति के असंतुलन और मानवीय लापरवाही की ओर संकेत करती है। यदि आज समाज, सरकार और स्थानीय समुदाय मिलकर इसके संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाते हैं तो आने वाली पीढ़ियां भी केंदू के स्वाद, उसकी छांव और उससे जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं का अनुभव कर सकेंगी। अन्यथा यह बहुमूल्य वृक्ष धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनकर रह जाएगा। इसलिए समय की मांग है कि केंदू संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप दिया जाए और इस प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिए हर स्तर पर प्रयास किए जाएं।
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