Jamshedpur News: जमशेदपुर के बागबेड़ा क्षेत्र स्थित रानीडीह-कोकेटोला में 30 जून को एक ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण आयोजन होने जा रहा है। पंचायत भवन के समीप वीर शहीद सिदो-कान्हू की आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा। इस अवसर को यादगार बनाने के लिए वीर शहीद सिदो-कान्हू मेमोरियल सोसाइटी द्वारा व्यापक तैयारियां की जा रही हैं। रविवार को आयोजित बैठक में कार्यक्रम की रूपरेखा तय की गई तथा विभिन्न समितियों का गठन किया गया। बैठक की अध्यक्षता सोसाइटी के मुख्य संयोजक बहादुर किस्कू ने की। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम केवल प्रतिमा अनावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज की सांस्कृतिक और शैक्षणिक चेतना को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम होगा। कार्यक्रम में संताली भाषा में अध्ययन करने वाले मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया जाएगा।
सिदो-कान्हू की प्रतिमा बनेगी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि सिदो-कान्हू केवल संताल समाज के नायक नहीं थे, बल्कि वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूतों में शामिल थे। उनकी प्रतिमा नई पीढ़ी को अपने इतिहास, संस्कृति और संघर्षों की याद दिलाएगी। समाज के बुद्धिजीवियों ने कहा कि आज के दौर में युवाओं को अपने महापुरुषों के योगदान से परिचित कराना आवश्यक है। प्रतिमा के माध्यम से आने वाली पीढ़ियां सिदो-कान्हू के साहस, बलिदान और नेतृत्व क्षमता को समझ सकेंगी। इससे समाज में आत्मगौरव की भावना मजबूत होगी और युवाओं को अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूकता मिलेगी।
संताली भाषा के विद्यार्थियों को मिलेगा सम्मान
कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण आकर्षण संताली भाषा में पठन-पाठन करने वाले छात्र-छात्राओं का सम्मान समारोह होगा। आयोजन समिति का मानना है कि मातृभाषा का संरक्षण और संवर्धन समाज की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने के लिए आवश्यक है। हाल के वर्षों में संताली भाषा के प्रति युवाओं की रुचि बढ़ी है। विभिन्न विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में संताली भाषा का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। ऐसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को मंच पर सम्मानित कर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाएगा। इस पहल को समाज के लोगों ने सराहनीय बताया है। उनका मानना है कि भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए ऐसे कार्यक्रमों का नियमित आयोजन होना चाहिए।
सिदो-कान्हू आंदोलन : आदिवासी स्वाभिमान की ऐतिहासिक गाथा
सिदो-कान्हू का नाम भारतीय इतिहास में विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वर्ष 1855 में उन्होंने अपने भाई चांद और भैरव तथा बहनों फूलो और झानो के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन और जमींदारी शोषण के खिलाफ ऐतिहासिक "संताल हूल" आंदोलन का नेतृत्व किया था। 30 जून 1855 को वर्तमान झारखंड के भोगनाडीह गांव में हजारों संतालों की सभा आयोजित हुई थी। इसी दिन सिदो और कान्हू ने अंग्रेजी शासन, साहूकारों और जमींदारों के अत्याचार के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। इस आंदोलन को "हूल क्रांति" कहा जाता है, जिसका अर्थ है- विद्रोह या क्रांति।संताल हूल आंदोलन का उद्देश्य केवल आर्थिक शोषण का विरोध नहीं था, बल्कि आदिवासी समाज की अस्मिता, संस्कृति और अधिकारों की रक्षा करना भी था। इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया था। हालांकि अंग्रेजों ने इस विद्रोह को बलपूर्वक दबा दिया, लेकिन सिदो-कान्हू और उनके साथियों का संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की नींव साबित हुआ। इतिहासकार मानते हैं कि 1857 की प्रथम स्वतंत्रता क्रांति से दो वर्ष पहले ही सिदो-कान्हू ने अंग्रेजों के खिलाफ संगठित जनआंदोलन खड़ा कर दिया था। यही कारण है कि उन्हें भारत के प्रारंभिक स्वतंत्रता सेनानियों में गिना जाता है।
इतिहास से प्रेरणा लेने की है जरूरत: बहादुर किस्कू
बैठक को संबोधित करते हुए मुख्य संयोजक बहादुर किस्कू ने कहा कि वीर शहीद सिदो-कान्हू केवल एक नाम नहीं, बल्कि संघर्ष, स्वाभिमान और बलिदान की जीवंत मिसाल हैं। उन्होंने जिस साहस के साथ अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई, वह आज भी हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। रानीडीह में उनकी प्रतिमा स्थापित करना पूरे समाज के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने आगे कहा कि हमारा उद्देश्य केवल प्रतिमा स्थापित करना नहीं है, बल्कि युवाओं को अपने इतिहास और संस्कृति से जोड़ना है। आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी सिदो-कान्हू, फूलो-झानो और अन्य महान आदिवासी वीरों के योगदान को जाने और उनसे प्रेरणा लेकर समाज के विकास में योगदान दे। बहादुर किस्कू ने संताली भाषा के संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि मातृभाषा हमारी पहचान है और इसके विकास के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। उन्होंने सभी समाजसेवियों, जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों से कार्यक्रम को सफल बनाने की अपील की।
जनप्रतिनिधियों और समाज के लोगों की रहेगी सहभागिता
आयोजन समिति के अनुसार कार्यक्रम में क्षेत्र के विधायक, झारखंड आंदोलनकारी नेता, पंचायत प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता तथा विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है। बड़ी संख्या में ग्रामीणों और युवाओं की भागीदारी की भी उम्मीद है। बैठक में मुखिया सुनील किस्कू, पंचायत समिति सदस्य चंद्राय टुडू, अभिषेक सिंकू, नुनाराम मुर्मू, राजकुमार दास, सुशील किस्कू, विशाल सिंकू, अनिल पात्रो, महेश्वर दास, बोयो सामद, बिट्टू दास, फागू किस्कू, दिकू टुडू समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित थे। सभी उपस्थित सदस्यों ने एक स्वर में कहा कि 30 जून का यह आयोजन केवल प्रतिमा अनावरण का कार्यक्रम नहीं होगा, बल्कि आदिवासी इतिहास, संस्कृति और शिक्षा के प्रति समाज की प्रतिबद्धता का प्रतीक बनेगा। कार्यक्रम के माध्यम से वीर शहीद सिदो-कान्हू के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके संघर्ष और बलिदान को कभी न भूलें।
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