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संताली भाषा परीक्षा उत्तीर्ण विद्यार्थियों को मार्कशीट वितरण, पर्यावरण संरक्षण का भी दिया संदेश

कदमा माझी बाबा की अगुवाई में पौधारोपण के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ। सबों ने पौधारोपण करने का लिया संकल्प।

Jamshedpur News: जमशेदपुर के कदमा स्थित आदिवासी संताल जाहेरथान परिसर में रविवार को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का नेतृत्व माझी बाबा बिंदे सोरेन ने किया। इस अवसर पर पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से पौधारोपण अभियान चलाया गया। कार्यक्रम में समाज के वरिष्ठ लोगों, युवाओं, महिलाओं और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।पौधारोपण के दौरान उपस्थित लोगों ने पर्यावरण संरक्षण की शपथ ली और अधिक से अधिक वृक्ष लगाने का संकल्प लिया। आयोजकों ने कहा कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को पौधारोपण और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

संताली भाषा परीक्षा में सफल विद्यार्थियों को मिला सम्मान

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण कदमा के बिंदू चांदान ओल ईतुन आसड़ा के ओलचिकी मिडिल परीक्षा में सफल छात्र-छात्राओं के बीच मार्कशीट वितरण समारोह रहा। परीक्षा में सफल विद्यार्थियों को मंच पर बुलाकर उनकी मार्कशीट प्रदान की गई और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की गई। समिति के पदाधिकारियों ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा और अध्ययन समाज की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। विद्यार्थियों को संताली भाषा और ओलचिकी लिपि के अध्ययन के लिए प्रेरित किया गया। इस अवसर पर सफल छात्रों के चेहरे पर खुशी और गर्व साफ दिखाई दे रहा था।

पौधारोपण को अभियान बनाने की जरूरत: बिंदे सोरेन

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए माझी बाबा बिंदे सोरेन ने कहा कि पौधारोपण केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे जनआंदोलन और सामाजिक अभियान का रूप देना चाहिए। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि जब भी अवसर मिले, अपने घरों, बाग-बगीचों, सार्वजनिक स्थलों और खाली पड़ी सरकारी जमीनों पर पौधे लगाएं। वन विभाग के सहयोग से आसपास के जंगलों में भी पौधारोपण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति यदि अपने जीवन में कुछ पौधों की देखभाल की जिम्मेदारी ले ले तो पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में बड़ी मदद मिल सकती है।

मातृभाषा संताली के प्रति युवाओं में बढ़ रही जागरूकता

माझी बाबा बिंदे सोरेन ने अपने संबोधन में संताली भाषा और संस्कृति के संरक्षण पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में संताल समाज के युवा अपनी मातृभाषा की महत्ता को समझने लगे हैं। यही कारण है कि अन्य भाषाओं में पढ़ाई करने के बावजूद वे संताली भाषा सीखने और उसे आगे बढ़ाने में रुचि दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाषा किसी भी समाज की पहचान और संस्कृति की आत्मा होती है। यदि भाषा सुरक्षित रहती है तो समाज की परंपराएं, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत भी सुरक्षित रहती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मातृभाषा बोलने के साथ-साथ उसकी लिपि को पढ़ना और लिखना भी सीखना चाहिए।

ओलचिकी लिपि के संरक्षण और प्रचार पर दिया गया बल

कार्यक्रम में वक्ताओं ने संताली भाषा की ओलचिकी लिपि के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ओलचिकी केवल एक लिपि नहीं बल्कि संताल समाज की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। नई पीढ़ी को इस लिपि से जोड़ना समय की आवश्यकता है। समिति के सदस्यों ने बताया कि क्षेत्र में नियमित रूप से संताली भाषा और ओलचिकी लिपि के अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए शैक्षणिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। इसका सकारात्मक परिणाम यह है कि अधिक संख्या में विद्यार्थी संताली भाषा की परीक्षाओं में भाग ले रहे हैं और सफलता प्राप्त कर रहे हैं।

स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख व समाज के बुद्धिजीवी रहे मौजूद 

इस अवसर पर समाज के कई वरिष्ठ और प्रतिष्ठित लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम में गोडेत बाबा अर्जुन सोरेन, महासचिव भीम मुर्मू, सचिव पंचू हांसदा, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित निमय सोरेन, विश्वनाथ मुर्मू, सुनील मुर्मू, लक्ष्मण माड़ी, राम माड़ी, लोकेश मुर्मू, सिंगराई मार्डी, सरिता मुर्मू, नेहा मुर्मू, जिया हेंब्रम, किरण, चामी हेंब्रम, चांदमुनी, दुलारी, सूरज, तानिया और सुनीता सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग मौजूद थे। कार्यक्रम का समापन पर्यावरण संरक्षण, मातृभाषा संवर्धन और सामाजिक एकता के संदेश के साथ हुआ। उपस्थित लोगों ने संकल्प लिया कि वे संताली भाषा, ओलचिकी लिपि और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य निरंतर जारी रखेंगे। 

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