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Jamshedpur News: जमशेदपुर के राजदोहा में ओलचिकी लिपि प्रशिक्षण केंद्र की शुरुआत, युवाओं में बढ़ा संताली भाषा का क्रेज

 Jamshedpur News: झारखंड की सांस्कृतिक और भाषाई विरासत में संताली भाषा का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है। इसी कड़ी में जमशेदपुर के नरवा क्षेत्र अंतर्गत राजदोहा गांव से एक सराहनीय पहल सामने आई है। यहाँ 'भुरका ईपील सेचेद अखाड़ा' के तत्वावधान में संताली भाषा की मूल लिपि 'ओलचिकी' के प्रशिक्षण केंद्र का भव्य शुभारंभ किया गया है। इस केंद्र की शुरुआत से न केवल स्थानीय युवाओं को अपनी मातृभाषा को वैज्ञानिक तरीके से सीखने का अवसर मिलेगा, बल्कि यह आदिवासी समाज की भाषाई पहचान को भी एक नई दिशा प्रदान करेगा। कार्यक्रम के दौरान समाज के बुद्धिजीवियों और प्रहरियों ने हिस्सा लेकर इस अभियान को गांव-गांव तक पहुंचाने का संकल्प लिया।



अतिथियों ने संयुक्त रूप से ओलचिकी प्रशिक्षण का उद्घाटन किया

इस नवनिर्मित ओलचिकी लिपि प्रशिक्षण केंद्र का उद्घाटन मुख्य अतिथि डोमजुड़ी पीढ़ परगना हरिपोदो मुर्मू और आसेका के महासचिव शंकर सोरेन द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। उद्घाटन समारोह में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ केंद्र की सफलता की कामना की गई। मुख्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर शिक्षा के इस नए मंदिर की शुरुआत की। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि किसी भी समाज की उन्नति उसकी भाषा और लिपि की समृद्धि पर निर्भर करती है। राजदोहा गांव में खुला यह केंद्र आने वाले समय में पूरे नरवा क्षेत्र के लिए शिक्षा और जागरूकता का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा।

युवाओं में बदल रही सोच, अब ओलचिकी सीखने की मची है होड़

उद्घाटन के दौरान मुख्य अतिथि डोमजुड़ी पीढ़ परगना हरिपोदो मुर्मू ने वर्तमान पीढ़ी में आ रहे सकारात्मक बदलावों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक दौर में संताली समाज के युवाओं के भीतर अपनी जड़ों की ओर लौटने की एक नई ललक देखी जा रही है। वर्तमान समय में संताली भाषा की लिपि 'ओलचिकी' को सीखने के लिए युवाओं में एक स्वस्थ होड़ सी मच गयी है। आदिवासी संताल समाज का हर युवा अब अपनी मातृभाषा की लिपि में लिखना, पढ़ना और खुद को अभिव्यक्त करना सीखना चाहता है। यह बदलाव इस बात का गवाह है कि युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति को लेकर अत्यधिक जागरूक और गौरवान्वित है।

प्रतियोगी परीक्षाओं व नौकरियों में संताली भाषा का बढ़ता महत्व

हरिपोदो मुर्मू ने युवाओं को शिक्षा के व्यावहारिक और करियर संबंधी फायदों से भी अवगत कराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संताली भाषा अब केवल बोलचाल का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह करियर निर्माण का एक सशक्त जरिया बन चुकी है। संताली भाषा में पठन-पाठन करने वाले छात्रों को विभिन्न राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का बेहतरीन अवसर प्राप्त हो रहा है। इतना ही नहीं, जो युवा संताली भाषा और ओलचिकी लिपि में उच्च शिक्षा या पठन-पाठन पूरा कर रहे हैं, उन्हें सरकारी व गैर-सरकारी नौकरी-पेशा में भी प्राथमिकता मिल रही है। अब समाज के युवाओं को इस बात का पूरा भान हो गया है कि उनकी मातृभाषा दुनिया की किसी भी अन्य भाषा से कमतर नहीं है।



आठवीं अनुसूची में शामिल है संताली भाषा

संताली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची (Eighth Schedule of the Indian Constitution) में पहले ही शामिल किया जा चुका है। इस संवैधानिक मान्यता ने भाषा के महत्व और इसकी स्वीकार्यता को वैश्विक स्तर पर बढ़ा दिया है। हरिपोदो मुर्मू ने इसी गौरव को याद दिलाते हुए आसेका (आदिवासी संताल पारंपरिक और सांस्कृतिक संघ) समेत अन्य सभी आदिवासी संगठनों से अपील की। उन्होंने कहा कि सभी सामाजिक संगठन अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में आगे आएं और ओलचिकी लिपि प्रशिक्षण केंद्र खोलने का बीड़ा उठाएं। उनका मानना है कि भाषा को जीवित रखने के लिए हर आदिवासी बहुल गांव में आवश्यक रूप से एक ओलचिकी शिक्षण केंद्र खुलना ही चाहिए।

'गांव का दीपक' बनी ओलचिकी, गांव दूर हो रहा अज्ञानता

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आसेका के महासचिव शंकर सोरेन ने बेहद भावुक और वैचारिक बात कही। उन्होंने कहा कि यह ओलचिकी लिपि शिक्षण केंद्र केवल एक क्लासरूम नहीं है, बल्कि यह हर गांव में अज्ञानता के अंधेरे को दूर करने वाला एक दीपक है। इस केंद्र के माध्यम से समाज के लोग अपनी मातृभाषा की लिपि में लिखना-पढ़ना तो सीख ही रहे हैं, साथ ही वे साक्षर और शिक्षित होने के साथ-साथ अपने सामाजिक अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक हो रहे हैं। शंकर सोरेन ने आसेका झारखंड की भविष्य की योजनाओं का खुलासा करते हुए कहा कि आने वाले दिनों में संगठन का यह दृढ़ प्रयास रहेगा कि झारखंड के कम से कम हर पंचायत स्तर पर एक ओलचिकी शिक्षण केंद्र की स्थापना अनिवार्य रूप से की जाए। इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए जमीनी स्तर पर काम किया जाएगा.

मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया

इस उद्घाटन समारोह में आसेका झारखंड द्वारा आयोजित वार्षिक परीक्षा के मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित करना रहा। शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सत्र के प्लस टू (12वीं) की परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्रों को मंच पर सराहा गया। परीक्षा में प्रथम स्थान पाने वाली छात्रा पोमा हांसदा और द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले छात्र शिवचरण हांसदा को अतिथियों द्वारा प्रशस्ति पत्र और चमचमाती ट्रॉफी देकर सम्मानित किया गया। इस सम्मान ने वहाँ उपस्थित अन्य बच्चों में भी शिक्षा के प्रति एक नया उत्साह भर दिया।

कार्यक्रम समाज के बुद्धिजीवी, शिक्षा व ग्रामवासी हुए शामिल

पूरे कार्यक्रम का सफल और सुचारू संचालन फूदन मार्डी ने किया। इस ऐतिहासिक और प्रेरक अवसर पर क्षेत्र के कई प्रबुद्ध नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे, जिनमें मुख्य रूप से मानिक हांसदा, फूदन मुर्मू, हलुदबनी मौजा के ग्रामप्रधान सागेन हांसदा, भुरका इपील सेचेद अखड़ा के प्रधानाध्यापक दुर्गाप्रसाद मुर्मू, लुगू गोडेत सुरेंद्र टुडू, मानसिंह माझी समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण और छात्र-छात्राएं मौजूद थे।

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