https://omg10.com/4/11146156 झारखंड आंदोलन के अग्रदूत बागुन सुम्बरुई की 8वीं पुण्यतिथि मनाई गई, बिरसानगर में लोगों ने दी श्रद्धांजलि
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झारखंड आंदोलन के अग्रदूत बागुन सुम्बरुई की 8वीं पुण्यतिथि मनाई गई, बिरसानगर में लोगों ने दी श्रद्धांजलि

Jamshedpur News: आदिवासी हो समाज कल्याण समिति भवन, बिरसानगर जोन नंबर-2 में झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता, पूर्व सांसद और आदिवासी समाज के प्रेरणास्रोत रहे बागुन सुम्बरुई की 8वीं पुण्यतिथि श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में समाज के लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और गणमान्य नागरिकों ने भाग लेकर उनके योगदान को याद किया तथा झारखंड आंदोलन, सामाजिक सुधार और जनसेवा के क्षेत्र में उनके ऐतिहासिक कार्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प लिया। बागुन सुम्बरुई को झारखंड की राजनीति में एक सशक्त जननेता और गांधीवादी विचारधारा के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में आदिवासी अधिकार, सामाजिक न्याय और अलग झारखंड राज्य की मांग को मजबूत आवाज दी।

श्रद्धांजलि सभा में बागुन सुम्बरुई के योगदान को किया गया याद

कार्यक्रम की शुरुआत स्वर्गीय बागुन सुम्बरुई के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। उपस्थित लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि बागुन सुम्बरुई केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि वे जनआंदोलन, सामाजिक चेतना और आदिवासी समाज के अधिकारों की लड़ाई का एक मजबूत चेहरा थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज और झारखंड की पहचान के लिए समर्पित किया। वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी को उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए सामाजिक एकता, जनहित और लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाना चाहिए।

ग्राम मुंडा से जननेता बनने तक का प्रेरणादायक सफर

स्वर्गीय बागुन सुम्बरुई का जन्म 24 फरवरी 1924 को हुआ था। उनके पिता ब्रिटिश शासनकाल के दौरान ग्राम मुंडा थे। पिता के निधन के बाद बागुन सुम्बरुई को भी ग्राम मुंडा की जिम्मेदारी मिली। ग्राम नेतृत्व के दौरान उन्होंने वर्ष 1945 में चार पीढ़ क्षेत्र के 138 गांवों को वन विभाग को मालगुजारी देने से रोकने का आंदोलन चलाया। यह उस दौर का एक महत्वपूर्ण जनआंदोलन माना जाता है, जिसने आदिवासी समाज में अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा की। उन्होंने अंग्रेजी शासन की नीतियों का विरोध किया और ग्रामीण समाज को संगठित करने का कार्य किया। इसी दौर से उनका जनसंपर्क और नेतृत्व लगातार मजबूत होता गया।

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ चलाया जागरूकता अभियान

राजनीति में सक्रिय होने से पहले बागुन सुम्बरुई सामाजिक सुधार अभियानों से जुड़े रहे। उन्होंने विशेष रूप से डायन प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और लोगों को जागरूक करने का कार्य किया। उनका मानना था कि समाज की प्रगति शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक सुधार से ही संभव है। उन्होंने ग्रामीण और आदिवासी समाज में सामाजिक चेतना विकसित करने के लिए लगातार अभियान चलाए। इसी सामाजिक सोच और जनसंपर्क ने उन्हें एक लोकप्रिय जननेता के रूप में स्थापित किया और बाद में उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई।

अलग झारखंड राज्य आंदोलन में निभाई अहम भूमिका

बागुन सुम्बरुई का राजनीतिक सफर वर्ष 1967 में झारखंड पार्टी से शुरू हुआ। उन्होंने झारखंड पार्टी के संस्थापक जयपाल सिंह के साथ मिलकर अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर कई आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई।
वे वर्ष 1967 से 1969 के बीच पहली बार विधायक बने। इसके बाद 1969, 1972 और वर्ष 2000 में भी विधायक के रूप में जनता का प्रतिनिधित्व किया। झारखंड आंदोलन के दौरान उन्होंने आदिवासी पहचान, क्षेत्रीय विकास और स्थानीय अधिकारों को प्रमुख मुद्दा बनाया। उनके संघर्ष और योगदान ने अलग झारखंड राज्य की मांग को जनआंदोलन का स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पांच बार सांसद बनकर राष्ट्रीय राजनीति में बनाई पहचान

बागुन सुम्बरुई राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने वाले नेताओं में शामिल रहे। वे पश्चिम सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र से पाँच बार सांसद चुने गए। उन्होंने वर्ष 1977 में पहली बार लोकसभा चुनाव जीता। इसके बाद वे लगातार कई कार्यकालों तक संसद में जनता की आवाज बने रहे। उनका संसदीय कार्यकाल छठी, सातवीं, आठवीं, नौवीं और चौदहवीं लोकसभा तक फैला। वे लंबे समय तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहे और गांधीवादी विचारधारा के कारण उन्हें “झारखंड का गांधी” भी कहा जाता था। उनका राजनीतिक जीवन सादगी, जनसेवा और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए जाना जाता है।

समाज के लोगों ने उनके विचारों को आगे बढ़ाने का लिया संकल्प

कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों ने बागुन सुम्बरुई के विचारों और सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि उनका जीवन संघर्ष, सेवा और सामाजिक बदलाव की मिसाल है। इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष ज्ञान सिंह बंदिया, संतोष पूर्ति, परगना बारी, संजीव बोदरा, दीपक बिरुली, राजन सामड, नरसिंह बिरुली, संयुक्ता बारी, सुजाता सिंह कुन्टीया, ललिता कुंकल, अमिता लामाय, हेमवती कुन्टीया, सोमबारी बानरा, कविता बोदरा, वर्षा बानरा, अनिला कुन्टीया, चारिबा सुरिन, सुमित्रा बारी सहित समाज के कई गणमान्य सदस्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि बागुन सुम्बरुई का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा और झारखंड के सामाजिक एवं राजनीतिक इतिहास में उनका योगदान सदैव याद किया जाएगा।

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