मुसाबनी में झारखंड आंदोलन की विरासत को समर्पित सम्मान समारोह आयोजित
Jamshedpur News: झारखंड आंदोलन के शहीदों, दिवंगत सेनानियों और उनके परिवारों के सम्मान में मुसाबनी स्थित अग्रसेन भवन में रविवार को भव्य झारखंड आंदोलनकारी सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन झारखंड आंदोलनकारी सेनानी मंच, मुसाबनी पाटशिला के तत्वावधान में किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में आंदोलनकारी, शहीद आश्रित परिवार, सामाजिक कार्यकर्ता तथा विभिन्न प्रखंडों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया। यह आयोजन केवल सम्मान समारोह नहीं था, बल्कि झारखंड आंदोलन के इतिहास, संघर्ष और बलिदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक प्रयास भी बना। पूरे कार्यक्रम के दौरान भावनात्मक वातावरण देखने को मिला और उपस्थित लोगों ने आंदोलन के नायकों को याद करते हुए उनके योगदान को नमन किया।
भव्य जुलूस और पारंपरिक सांस्कृतिक प्रस्तुति रही आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम से पूर्व मुसाबनी बस स्टैंड से एक विशाल जनजुलूस निकाला गया। इस जुलूस की शुरुआत संथाल हुल के महानायक वीर शहीद सिधु-कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ हुई। इसके बाद रैली मुसाबनी बाजार होते हुए अग्रसेन भवन तक पहुंची। जुलूस में आदिवासी समाज की पारंपरिक वेशभूषा, सांस्कृतिक झलक और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज ने पूरे क्षेत्र को उत्साह और गौरव से भर दिया। बड़ी संख्या में शामिल लोगों ने झारखंड आंदोलन के नारों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से अपनी ऐतिहासिक पहचान को प्रदर्शित किया। इस सांस्कृतिक उपस्थिति ने कार्यक्रम को केवल औपचारिक आयोजन न बनाकर जनजागरण और सामाजिक एकता का प्रतीक बना दिया।
शहीदों को श्रद्धांजलि, 27 आश्रित परिवारों का सम्मान
सम्मान समारोह का आरंभ झारखंड आंदोलन के शहीदों एवं दिवंगत आंदोलनकारियों की स्मृति में दो मिनट का मौन रखकर किया गया। इसके बाद मंच पर स्थापित उनके चित्रों पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर 27 शहीद एवं दिवंगत आंदोलनकारी सेनानियों के आश्रित परिवारों को शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। सम्मान के दौरान कई परिवार अपने स्वजनों को याद कर भावुक हो उठे और समारोह स्थल का वातावरण संवेदनाओं से भर गया।उपस्थित लोगों ने कहा कि झारखंड राज्य के निर्माण में इन सेनानियों का योगदान ऐतिहासिक रहा है और उनकी स्मृतियों को आने वाली पीढ़ियों तक संरक्षित किया जाना चाहिए।
विभिन्न प्रखंडों से पहुंचे आंदोलनकारियों का भी हुआ अभिनंदन
समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ झारखंड आंदोलनकारी श्री कान्हु सामंत ने की, जबकि संचालन संतोष सोरेन एवं सुराई बास्के ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम में मुसाबनी, घाटशिला, बहरागोड़ा और डुमरिया प्रखंडों से पहुंचे आंदोलनकारियों को भी अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया। बड़ी संख्या में झारखंड आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ और सक्रिय लोगों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया। जमशेदपुर से भी आंदोलनकारी और सामाजिक प्रतिनिधि श्रद्धांजलि देने पहुंचे। उपस्थित लोगों ने कहा कि आंदोलन की विरासत को केवल इतिहास पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि समाज और शासन व्यवस्था में उसे सम्मानजनक स्थान मिलना चाहिए।
आंदोलनकारियों ने सरकार के समक्ष रखी सामाजिक सुरक्षा और सम्मान की मांग
कार्यक्रम के दौरान शहीद और दिवंगत आंदोलनकारियों के आश्रित परिवारों ने अपनी समस्याएं भी साझा कीं। उन्होंने कहा कि झारखंड राज्य गठन के 26 वर्ष बीत जाने के बावजूद आंदोलनकारियों और उनके परिवारों को अपेक्षित सम्मान और सुविधाएं नहीं मिल सकी हैं। परिजनों ने उचित पेंशन, आश्रितों को रोजगार, मेडिक्लेम, बीमा और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाओं की मांग उठाई। उनका कहना था कि आंदोलन में योगदान देने वाले परिवार आज भी कई बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। संगठन के संयोजक एवं वरिष्ठ आंदोलनकारी संतोष सोरेन ने मांग रखते हुए कहा कि जेल जाने वाले आंदोलनकारियों को न्यूनतम 15 हजार रुपये मासिक सम्मान राशि तथा उनके एक आश्रित को सरकारी सेवा में सीधी नियुक्ति दी जानी चाहिए, जिससे उनके परिवारों को स्थायी आर्थिक सुरक्षा मिल सके।
शहीद स्मारक निर्माण और विरासत संरक्षण का लिया गया संकल्प
समारोह के दौरान आंदोलनकारियों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि झारखंड आंदोलन के शहीदों और सेनानियों की स्मृति में राज्य की राजधानी तथा जिला मुख्यालयों में अब तक पर्याप्त स्मारक और मॉन्यूमेंट का निर्माण नहीं हो पाया है। उन्होंने सरकार से मांग की कि आंदोलन के इतिहास को संरक्षित करने, शहीदों की स्मृति को स्थायी रूप देने और उनके परिवारों को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस पहल की जाए। कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ किया गया कि झारखंड आंदोलन के शहीदों के सपनों का राज्य बनाने और उनकी विरासत को जीवित रखने के लिए सामाजिक एवं जनस्तर पर निरंतर प्रयास जारी रखे जाएंगे। समारोह ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि इतिहास केवल याद करने के लिए नहीं, बल्कि उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी समाज की होती है।
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