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सावधान! दलमा के जंगलों में शिकार किया तो खैर नहीं, वन विभाग ने 'वन देवी' के जरिए भेजा कड़ा संदेश!

 Sendra news : दलमा की पहाड़ियों और उससे सटे गांवों में इन दिनों एक अलग ही हलचल है। यह हलचल शिकार के लिए नहीं, बल्कि बेजुबान वन्यजीवों की जान बचाने के लिए है। आगामी 'शिकार परब' (विशु पर्व) को देखते हुए वन विभाग ने इस बार पारंपरिक सख्ती के साथ-साथ भावनात्मक और कलात्मक रुख अपनाया है। डीएफओ सबा आलम अंसारी के नेतृत्व में गीता थिएटर के कलाकारों के साथ मिलकर चलाया जा रहा "माटी की पुकार" अभियान अब एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है।




जंगल है तो हम हैं नाटक का मंचन किया
अभियान का आगाज 20 अप्रैल को मानगो वन विभाग के सभागार में हुआ। यहां इको विकास समितियों की बैठक में गीता थिएटर के मंझे हुए कलाकारों ने माटी की पुकार (जंगल है तो हम हैं) नाटक का मंचन किया। नाटक की शुरुआत में जब कलाकार 'वन देवी' के रूप में मंच पर आईं, तो सभागार में मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो गया। नाटक ने यह संदेश दिया कि यदि जंगल सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो मानव अस्तित्व पर भी संकट मंडराएगा।


गांव-गांव गूंज रहा है संरक्षण का ढोल
22 अप्रैल से इस अभियान ने जमीनी स्तर पर रफ्तार पकड़ी। नाट्य दल दलमा वन क्षेत्र के गांवों में जाकर सबसे पहले पारंपरिक वाद्य यंत्रों और गीतों के जरिए भीड़ इकट्ठा करता है। जब ग्रामीण भारी संख्या में जुट जाते हैं, तब शुरू होता है प्रभावशाली नुक्कड़ नाटक। कलाकारों के जीवंत अभिनय को देखकर ग्रामीण न केवल तालियां बजा रहे हैं, बल्कि वन्यजीवों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझ रहे हैं।

पटमदा के बेलटांड़ चौक पर उमड़ा जनसैलाब
इसी क्रम में जागरूकता का यह कारवां पटमदा के बेलटांड़ चौक पहुंचा। यहां का नजारा किसी उत्सव जैसा था, लेकिन मकसद बहुत गंभीर था। इस कार्यक्रम में प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस बल की मौजूदगी ने ग्रामीणों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि विभाग इस बार वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं है।


प्रकृति के बिना मानव जीवन है अधूरा
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पटमदा अंचलाधिकारी डॉ. राजेंद्र कुमार दास ने ग्रामीणों से सीधा संवाद किया। उन्होंने कहा, प्रकृति और जीव-जंतु हमारे पूर्वजों की अमानत हैं। इनके बिना पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाएगा, जिसका सीधा असर हमारी खेती और स्वास्थ्य पर पड़ेगा।" डॉ. दास ने गीता थिएटर के कलाकारों की सराहना करते हुए कहा कि जटिल कानूनों को नाटक के जरिए इतनी सादगी से समझाना काबिले तारीफ है।

पुलिस ने दी कड़ी चेतावनी-कानून से ऊपर कोई नहीं
थाना प्रभारी विष्णुचरण भोगता ने सुरक्षा के पहलू पर जोर देते हुए साफ लफ्जों में कहा कि 'शिकार परब' के नाम पर बेगुनाह जानवरों की हत्या अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने ग्रामीणों को आगाह किया कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत अवैध शिकार एक गैर-जमानती अपराध है। यदि कोई भी व्यक्ति धनुष-बाण या हथियारों के साथ जंगल में प्रवेश करता पाया गया, तो उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई होगी।


बदलते समय के साथ पुरानी प्रथाओं को त्यागना जरूरी
समाजसेवी विश्वनाथ महतो ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु उठाया। उन्होंने कहा कि हम अपनी संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करते हैं, लेकिन बदलते समय के साथ ऐसी प्रथाओं को त्यागना जरूरी है जो प्रकृति को नुकसान पहुँचाती हैं। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे शिकार की जगह 'प्रतीकात्मक पर्व' मनाएं और जंगलों को बचाने में वन विभाग का सहयोग करें।

एक-एक वन्यजीव जंगल की सेहत के लिए जरूरी
इस पूरे अभियान का खाका और नेतृत्व वन विभाग के वन्यजीव जीवविज्ञानी प्रसेनजीत सरकार और व्यक्तित्व विकास संस्था के आकाश कुमार जायसवाल कर रहे हैं। प्रसेनजीत सरकार ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ग्रामीणों को समझाया कि कैसे एक-एक वन्यजीव जंगल की सेहत के लिए जरूरी है। वहीं आकाश कुमार जयसवाल ने युवाओं को इस अभियान से जोड़कर इसे एक सामाजिक चेतना का रूप दिया।


कलाकारों ने नाटक में 'वन्यजीव' बनकर अपना दर्द बयां किया
नाटक में कलाकारों का प्रदर्शन इतना सजीव था कि दर्शक दंग रह गए। गीता कुमारी ने 'वन देवी' के रूप में ममता और चेतावनी का अद्भुत मिश्रण पेश किया। प्रेम दीक्षित (वन्यजीव सुरक्षा मित्र), अभिषेक राजू (शिकारी दल प्रमुख), आकाश साव (युवा शिकारी), और मनोज कुमार (ग्राम प्रधान) ने अपनी भूमिकाओं से शिकार के दुष्परिणामों को पर्दे पर उतारा। करण साव ने 'वन्यजीव' बनकर जब अपना दर्द बयां किया, तो कई लोगों की आंखें नम हो गईं।

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