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Dalma sendra : पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों की हुई पूजा, कल होगा सेंदरा

 Dalma sendra : दलमा बुरु सेंदरा समिति के आह्वान पर कल आदिवासी समाज द्वारा दलमा पहाड़ी पर सेंदरा पर्व मनाया जायेगा. रविवार को दलमा के तराई गांव फदलोगोड़ा के समीप पहाड़ी पर दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने वन देवी-देवताओं की विशेष पूजा अर्चना की. उन्होंने देवी-देवताओं का पारंपरिक रीति-रिवाज से आह्वान कर दिसुआ सेंदरा के साथ पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र तीर-धनुष व भाला-बरछी आदि की पूजा की. उन्होंने वन देवी-देवताओं से विनती किया कि सोमवार को दिसुआ सेंदरा वीर शिकार खेलने के लिए पहाड़ी पर चढ़ाई करेंगे. वे दिनभर शिकार खेलने के बाद सकुशल घने जंगल से वापस आये. वे सभी सेंदरा वीरों पर विशेष कृपा बनाये रखे. इस दौरान दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने वन देवी-देवताओं के चरणों मे नतमस्तक होकर अच्छी बारिश व फसल के लिए भी प्रार्थना किया. सेंदरा पूजा में आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख परगना, पारानिक, गोडेत, नायके, मानकी, मुंडा, डोकलो-सोहोर आदि भी शामिल हुए.



सुबह से ही पहुंचने लगे थे सेंदरा वीर
तपती धूप से बचने के लिए कोल्हान समेत ओडिशा व बंगाल के भी सेंदरा वीर छोटे-बड़े वाहनों से सुबह से ही पहुंचने लगे हैं. सेंदरा वीरों ने दलमा के तराई गांव हलुदबनी, फदलोगोड़ा, आसनबनी, जामडीह, मिर्जाडीह, बोंटा समेत अन्य गांव में पेड़ के नीचे डेरा जमा लिया है. कल तड़के सुबह सूर्योदय से पहले शिकार खेलने के लिए घने जंगलों में कूच करेंगे. दिनभर शिकार खेलने के बाद दोपहर में उतर आयेंगे.


देर शाम तक सैकड़ों सेंदरा वीर पहुंचेंगे: राकेश हेंब्रम
दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने कहा कि आदिवासी समाज के लोग हर साल सेंदरा परंपरा को निर्वाह करने के लिए सैकड़ों की संख्या में आते हैं. इसबार गर्मी बहुत ज्यादा है. इसलिए सुबह में कई सेंदरा वीर पहुंचे हैं. लेकिन सेंदरा वीरों का आना देर रात तक जारी रहेगा. हाल के दिनों में चूंकि अधिकांश सेंदरा वीर मोटरसाइकिल व चार पहिया वाहनों से आते हैं. इसलिए वे शाम को सूर्यास्त के बाद आना ही ज्यादा पसंद करते हैं.

राकेश हेंब्रम शनिवार से ही दलमा में हैं मुस्तैद
दलमा राजा राकेश हेंब्रम शनिवार की शाम से ही फदलोगोड़ा के समीप दलमा पहाड़ी पर पहुंचे गये हैं. शनिवार की शाम को उन्होंने पारंपरिक रीति-रिवाज से देवी-देवताओं का आह्वान किया. उसके बाद देवी-देवताओं की पूजा अर्चना कर उनसे सेंदरा की अनुमति मांगी. उन्होंने देवी-देवताओं से प्रार्थना किया कि वे साल में एक दिन सेंदरा परंपरा को निर्वाह करने के लिए आते हैं. जिसमें में आदि काल से चले आ रहे सेंदरा परंपरा का निर्वाह करते हैं. समाज की यह परंपरा सदैव बची रहे, इसलिए एक दिन आपकी अनुमति से ही सेंदरा पर्व मनाते हैं. इसलिए हे वन देवी-देवता हमारे सेंदरा वीर सेंदरा करने के लिए घने के लिए जंगलों में जायेंगे. उनको सकुशल वापस भेजना भी आपकी ही जिम्मेदारी है. वन में जो भी जंगली पशु है तुम उसे कुछ समय के लिए छिपा दो. जो जंगल पशु वन को नुकसान पहुंचा रहे हैं उसे सेंदरा वीरों के सामने ले आओ. इस तरह शनिवार की शाम को सारा पूजन प्रक्रिया संपन्न हो गया.


गभर्वती जंगली पशु का नहीं होता है शिकार
आदिवासी-मूलवासी समाज में प्राचीन काल से सेंदरा की परंपरा चलता आ रहा है. प्राचीन काल में जब चारों ओर घना जंगल था तब खुद को बचाये रखने के लिए उनका सेंदरा करना जरूरी था. हालांकि आज के परिपेक्ष्य में यह बिलकुल उल्टा है. आज जंगली जानवरों को बचाये रखने की जरूरत है. आदिवासी-मूलवासी समाज जब कभी भी शिकार पर्व खेलते हैं तो उनका मकसद गर्भवती व बीमार जंगली पशु को शिकार करना बिलकुल नहीं होता है. सेंदरा परंपरा को निर्वाह करने के दौरान शिकार नहीं भी मिले तो सेंदरा वीरों का उत्साह कम नहीं होता है. वे जिस उत्साह के साथ सेंदरा पर्व में गये थे. उसी उत्साह के साथ वापस आते हैं.

कुते को भी दिया जाता है बराबरी का हिस्सा
आदिवासी-मूलवासी समाज जब सेंदरा के लिए जाते हैं तो वे अपने साथ अपने पालतु कुत्ते को भी ले जाते हैं. यदि उनके समूह में 10 लोग हैं और दो पालतु कुत्ते भी साथ में हैं तो शिकार में मिला मीट 12 हिस्सों में बंटता है. इस तरह कुते को शिकार खेलने गये लोगों के समूह में गिन लिया जाता है. यदि किसी का जाल भी प्रयुक्त हुआ है तो उसे भी हिस्सा मिलता है. आदिवासी-मूलवासी समाज में हिस्सेदारी को मारने की प्रथा नहीं है. हर किसी के प्रति एक ही नजरिया होता है.


शिकार में जाना कोई बच्चों का खेल नहीं
सेंदरा अर्थात शिकार पर जाना कोई खेल नहीं है. सबसे पहले तो यह कि शिकार पर्व में वही शामिल हो सकता है जो शारीरिक रूप से स्वस्थ हो. क्योंकि पहाड़ के अंदर घने जंगलों में शिकार को तलाशना इतना आसान नहीं है. उबड़-खाबड, पत्थर-चट्टान, झाड़ीनुमा जगहों से होकर गुजरना पड़ता है. जो शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं होगा वह 100 कदम आगे चलने के बाद ही रूक जायेगा. क्योंकि पहाड़ों की ऊंचाई पर चढ़ना में अच्छे-अच्छे लोगों की बस की बात नहीं है. थोड़ी ही दूर चलने के हांफने लग जाते हैं. ऐसे में जंगल के अंदर में जंगली जानवर का शिकार करना किसी बच्चों का काम नहीं है.



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