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करनडीह ग्रामसभा का हुड़का जाम: आखिर क्यों ग्रामीणों को उठाना पड़ा यह कड़ा कदम

Jamshedpur News: जमशेदपुर के करनडीह क्षेत्र में मंगलवार को ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। करनडीह ग्रामसभा के अंतर्गत आने वाले 10 गांवों के लोगों ने मिलकर एक बड़ा फैसला लिया और 'हुड़का जाम' अभियान चलाया। इस अभियान के तहत ग्रामीणों ने करनडीह फाटक के पास जाकर बहने वाली नालियों को सीमेंट, ईंट और गिट्टी डालकर पूरी तरह से बंद कर दिया। ग्रामीण पिछले काफी समय से अपने इलाके की बदहाली और गंदगी से परेशान थे। बार-बार गुहार लगाने के बाद भी जब प्रशासन ने उनकी सुध नहीं ली, तो थक-हारकर ग्रामीणों को खुद यह कड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

बहुमंजिली इमारतों का गंदा पानी बन गया बड़ी मुसीबत
इस पूरे विवाद और ग्रामीणों की परेशानी की सबसे बड़ी वजह परसुडीह शीतला चौक से लेकर करनडीह फाटक के बीच बनी ऊंची-ऊंची बहुमंजिली इमारतें हैं। इन बड़ी इमारतों से निकलने वाला गंदा, बदबूदार और दूषित पानी सीधे तौर पर बिना किसी ट्रीटमेंट के आम नालियों में छोड़ दिया जाता है। यह गंदा पानी बहते हुए सीधे ग्रामीणों के रिहाइशी इलाकों और उनके खेतों की तरफ आ जाता है। रोज-रोज बहने वाले इस दूषित पानी के कारण पूरे इलाके में बदबू फैली रहती है और लोगों का अपने घरों में रहना भी दूश्किल हो गया है। इसी गंदगी और पानी के बहाव को रोकने के लिए ग्रामीणों ने नालियों को ब्लॉक करने का फैसला किया।

किसानों की 40-50 एकड़ उपजाऊ खेती की जमीन हुई बर्बाद
इस गंदे पानी की वजह से सबसे बड़ा नुकसान करनडीह और आसपास के गांवों के गरीब किसानों को उठाना पड़ रहा है। इमारतों का केमिकल और गंदगी वाला दूषित पानी सीधे खेतों में घुस जाता है। करनडीह ग्रामसभा के माझी बाबा सलखु सोरेन ने अत्यंत दुख के साथ बताया कि इस समस्या के कारण लाइन टोला, दुखूटोला और धरमटोला के किसानों की लगभग 40 से 50 एकड़ उपजाऊ खेती की जमीन पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी है। जिस जमीन पर कभी फसलें लहलहाती थीं, आज वह गंदगी के दलदल में बदल चुकी है। रोजी-रोटी का साधन छिन जाने के कारण ग्रामीणों में प्रशासन और बड़ी इमारतों के मालिकों के खिलाफ भारी आक्रोश है।

बीडीओ को मांगपत्र सौंपकर दी गई थी 15 दिनों की चेतावनी
ऐसा नहीं है कि ग्रामीणों ने सीधे ही नालियों को जाम करने जैसा सख्त कदम उठा लिया। इससे पहले उन्होंने नियम और कानून के दायरे में रहकर अपनी बात सरकार तक पहुंचाने की पूरी कोशिश की थी। करनडीह ग्रामसभा के प्रतिनिधियों ने पिछले दिनों जमशेदपुर प्रखंड के बीडीओ (खंड विकास पदाधिकारी) सुमित प्रकाश से मुलाकात की थी। ग्रामीणों ने उन्हें अपनी समस्याओं से जुड़ा एक लिखित मांगपत्र सौंपा था और साफ शब्दों में चेतावनी दी थी कि अगर 15 दिनों के भीतर इस गंदे और दूषित पानी की समस्या का कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया, तो वे आंदोलन करने पर मजबूर हो जाएंगे।

जिला प्रशासन की लापरवाही से टूटा ग्रामीणों के सब्र का बांध
ग्रामीणों द्वारा दिए गए 15 दिनों के अल्टीमेटम के बावजूद जिला प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। समय सीमा बीत जाने के बाद भी प्रशासन की ओर से इस गंभीर समस्या को सुलझाने के लिए कोई ठोस पहल या जमीनी कार्रवाई नहीं की गई। अधिकारियों की इस अनदेखी और लापरवाही ने ग्रामीणों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया। जब ग्रामीणों ने देखा कि उनकी जायज मांग को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है और उनके खेतों को लगातार बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया गया है, तब उनका धैर्य पूरी तरह टूट गया। प्रशासन के इसी अड़ियल रवैये के कारण ग्रामीणों को कानून अपने हाथ में लेने और हुड़का जाम करने पर बाध्य होना पड़ा।

माझी बाबा के नेतृत्व में लाइनटोला और धरमटोला की नालियां जाम
प्रशासन से कहीं से भी सहयोग और मदद नहीं मिलने पर मंगलवार को ग्रामसभा ने एकजुट होकर कड़ा फैसला लागू कर दिया। ग्रामसभा के माझी बाबा सलखु सोरेन की अगुवाई में सैकड़ों ग्रामीण करनडीह फाटक के पास इकट्ठा हुए। पुरुषों के साथ-साथ भारी संख्या में महिलाएं भी हाथ में तगाड़ी और बेलचा लेकर पहुंचीं। ग्रामीणों ने मिलकर लाइनटोला और धरमटोला की ओर आने वाली मुख्य नालियों के मुंह को सीमेंट, ईंट और गिट्टी के पक्के मिश्रण से हमेशा के लिए जाम कर दिया। माझी बाबा ने साफ तौर पर कहा कि परसुडीह, प्रथमनगर और शीतला चौक जैसे बाहरी क्षेत्रों का गंदा पानी अब किसी भी कीमत पर उनके गांवों और खेतों की तरफ नहीं आने दिया जाएगा।

अपनी जमीन और हक की रक्षा के लिए एकजुट हुए ग्रामीण
इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत ग्रामीणों की आपसी एकजुटता रही। अपनी पारंपरिक शासन व्यवस्था और ग्रामसभा के बैनर तले लोग अपने हक और जमीन को बचाने के लिए सड़कों पर उतरे। इस हुड़का जाम अभियान के मौके पर शंकर हेंब्रम, बिजोमनी माझी, रायमनी मार्डी, सीता हेंब्रम, सुमीरा मुर्मू, मायनो मुर्मू, माधवी मुर्मू, बाले हांसदा, सुकलाल हांसदा समेत 10 गांवों के काफी संख्या में महिला और पुरुष मौजूद थे। ग्रामीणों का कहना है कि यह उनकी अस्मिता और रोजी-रोटी की लड़ाई है। जब तक प्रशासन इस गंदे पानी की निकासी की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं करता, तब तक वे नालियों को खुलने नहीं देंगे। इस घटना ने साफ कर दिया है कि जब जनता की बुनियादी समस्याओं को दबाया जाता है, तो वे अपनी रक्षा के लिए खुद खड़े होने को मजबूर हो जाते हैं।

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