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संताल हूल दिवस 2026: मतलाडीह में आदिवासी सेंगेल अभियान की ‘हूल सेंगेल संकल्प सभा’, सरना धर्म कोड समेत कई मांगें उठीं

Jamshedpur News: आदिवासी सेंगेल अभियान की ओर से मतलाडीह में 171वां संताल हूल दिवस “हूल सेंगेल संकल्प सभा” के रूप में मनाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत संताल हूल के महानायक वीर शहीद सिदो मुर्मू के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलित कर की गई। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने संताल हूल के शहीदों को याद करते हुए उनके संघर्ष और बलिदान को नमन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता और संचालन श्री कुनूराम बास्के ने किया, जबकि अतिथियों का स्वागत श्री जूनियर मुर्मू ने किया। सभा में बड़ी संख्या में सेंगेल कर्मी और समाज के लोग उपस्थित रहे।

संताल हूल को बताया आजादी के संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय


कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सेंगेल दिशोम परगना श्री सोना राम सोरेन ने उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि संताल हूल भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। उन्होंने कहा कि जब ब्रिटिश शासन को दुनिया की सबसे शक्तिशाली सत्ता माना जाता था, तब भोगनाडीह के वीर सिदो मुर्मू ने संताल समाज को संगठित कर अंग्रेजों के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा किया। उन्होंने कहा कि सिदो मुर्मू ने लगभग 40 हजार संतालों का नेतृत्व किया और उनके संघर्ष ने अंग्रेजी शासन को चुनौती दी। इस आंदोलन को भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में देखा जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि महान इतिहासकार और दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने भी संताल विद्रोह का उल्लेख किया था।

संताल आंदोलन के बाद मिले ऐतिहासिक अधिकार


सभा में बताया गया कि संताल समाज के संघर्ष और बलिदान का प्रभाव इतना बड़ा था कि वर्ष 1855 के बाद अंग्रेजों को संतालों के लिए अलग संताल परगना क्षेत्र बनाना पड़ा। आगे चलकर इसी संघर्ष की भावना से संताल परगना काश्तकारी अधिनियम जैसे कानून बने। वक्ताओं ने कहा कि यह आंदोलन केवल विरोध नहीं था, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, भूमि, संस्कृति और अधिकारों की रक्षा का भी संघर्ष था। आज भी संताल हूल समाज को अपने अधिकारों और एकता का संदेश देता है।

हूल सेंगेल संकल्प सभा से राष्ट्रपति के समक्ष रखी गई प्रमुख मांगें


सभा के दौरान आदिवासी सेंगेल अभियान ने आदिवासी समाज से जुड़े कई मुद्दों को उठाते हुए भारत की राष्ट्रपति के समक्ष अपनी मांगें रखने की बात कही। मुख्य मांगों में प्रकृति पूजक आदिवासियों के लिए स्वतंत्र “सरना धर्म” कोड लागू करने की मांग शामिल रही। इसके अलावा झारखंड के गिरिडीह स्थित मरांग बुरु (पारसनाथ पहाड़), बोकारो के लालपनिया स्थित लुगू बुरु और पश्चिम बंगाल के पुरुलिया स्थित अयोध्या गुरु जैसे धार्मिक स्थलों को अतिक्रमण मुक्त करने की मांग की गई। इसके साथ ही संताली भाषा को झारखंड में प्रथम राजभाषा का दर्जा देने, आदिवासी स्वशासन व्यवस्था में लोकतांत्रिक सुधार लागू करने और सामाजिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों में नशा की जगह निर्मल जल के उपयोग का प्रस्ताव भी रखा गया।

असम-अंडमान के आदिवासियों और महापुरुषों के सम्मान की मांग


सभा में असम और अंडमान में रहने वाले झारखंडी आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग की गई। इसके अलावा समाज के महान नायकों वीर सिदो मुर्मू और बिरसा मुंडा के नाम पर दो ट्रस्ट बनाने तथा प्रत्येक को 100-100 करोड़ रुपये की जमा पूंजी उपलब्ध कराने की मांग भी रखी गई। वक्ताओं ने कहा कि इससे आदिवासी समाज के इतिहास, शिक्षा और सामाजिक विकास को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए 


कार्यक्रम में डॉ. सोमाय सोरेन, मंगल टुडू, डॉ. पी. आर. मार्डी, सीताराम माझी, आम्पा हेम्ब्रोम, मंगल पाड़ेया, बासुदेव मुर्मू, सांखो टुडू, सेखार मुर्मू, रामेश मुर्मू, लक्ष्मण मुर्मू, जयललिता टुडू, ममता टुडू, नानी मुर्मू, दुलारी बास्के, सुखी सोरेन, श्रीमती हेम्ब्रोम, छोटा दाखिन हेम्ब्रोम सहित कई लोग मौजूद रहे। सभा के अंत में संताल हूल के संदेश को समाज तक पहुंचाने और आदिवासी हितों से जुड़े मुद्दों पर आगे भी आवाज उठाने का संकल्प लिया गया।


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