तालसा फुटबॉल मैदान में हूल दिवस पर पारंपरिक तीरंदाजी प्रतियोगिता का आयोजन
JAMSHEDPUR NEWS: जमशेदपुर के सुंदरनगर क्षेत्र में स्थित तालसा फुटबॉल मैदान में मंगलवार का दिन बहुत ही खास रहा। इस मैदान पर वीर शहीद सिदो-कान्हू की याद में हूल दिवस मनाया गया। इस ऐतिहासिक मौके पर एक भव्य पारंपरिक तीरंदाजी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में हमारी पुरानी संस्कृति और खेल की भावना का एक सुंदर नजारा देखने को मिला। ग्रामीण इलाके के लोगों ने इसमें बहुत ही बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस पूरे आयोजन में आदिवासियत की साफ झलक दिखाई दे रही थी। हवा में ढोल और नगाड़ों की गूंज थी। चारों तरफ खुशी का माहौल बना हुआ था।
संताल हूल के नायकों की याद में किया गया
यह आयोजन हमारे महान संताल हूल के नायकों की याद में किया गया था। वीर सिदो, कान्हू, चांद और भैरव ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अपनी जान दी थी। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी थी। आज भी ग्रामीण इलाकों में उनकी बहादुरी की कहानियां बड़े गर्व से सुनी और सुनाई जाती हैं। हूल दिवस के इस मौके पर सभी ग्रामीणों ने सबसे पहले इन अमर शहीदों को याद किया। उनकी तस्वीरों पर फूल माला चढ़ाकर उन्हें नमन किया गया। इस खेल के जरिए नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों के संघर्ष और उनकी वीरता के बारे में बताने की कोशिश की गई। गांव के बुजुर्गों ने बताया कि तीर-धनुष सिर्फ एक हथियार नहीं है। यह हमारी पहचान है। यह हमारी संस्कृति का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। हमारे पुरखों ने इसी तीर-धनुष के बल पर अपनी धरती की रक्षा की थी। इसलिए आज के दिन इस खेल का आयोजन करना और भी ज्यादा मायने रखता है।
महिला और पुरुष तीरंदाजों का जोरदार मुकाबला
इस तीरंदाजी प्रतियोगिता की सबसे अच्छी बात यह थी कि इसमें हर वर्ग के लिए जगह थी। मैदान में महिला और पुरुष दोनों के लिए अलग-अलग प्रतियोगिताएं रखी गई थीं। इससे गांव की महिलाओं को भी आगे आने का मौका मिला। समाज के हर हिस्से से लोग अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए मैदान में उतरे। पुरुषों के मुकाबले जितने रोमांचक थे, महिलाओं के मुकाबले भी उतने ही शानदार थे। दोनों ही वर्गों में गजब का उत्साह देखने को मिल रहा था। प्रतियोगिता को देखने के लिए मैदान के चारों तरफ दर्शकों की भारी भीड़ जमा थी। जब भी कोई तीरंदाज बिल्कुल सही निशाने पर तीर मारता, पूरा मैदान तालियों और हूल की गूंज से गूंज उठता था। महिलाओं ने बहुत ही सूझबूझ और एकाग्रता के साथ अपना निशाना लगाया। उन्होंने साबित कर दिया कि वे किसी भी मामले में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। खेल के मैदान पर सभी खिलाड़ियों के बीच एक स्वस्थ मुकाबला देखने को मिला।
कई गांवों के लोगों ने दिखाया अपना हुनर
इस तीरंदाजी खेल में हिस्सा लेने के लिए केवल एक गांव के लोग नहीं आए थे। तालसा के साथ-साथ सुंदरनगर, पुडीहासा, केरुवा और बांदुहुडांग जैसे कई आसपास के गांवों से लोग आए थे। महिला और पुरुष तीरंदाज सुबह से ही अपने पारंपरिक धनुष और बाण लेकर मैदान में जुटने लगे थे। ग्रामीण क्षेत्रों से आए इन खिलाड़ियों की संख्या बहुत ज्यादा थी। सभी अपनी पूरी तैयारी के साथ आए थे। हर गांव के लोग अपने खिलाड़ियों का हौसला बढ़ा रहे थे। यह सिर्फ एक खेल प्रतियोगिता नहीं रह गई थी, बल्कि यह कई गांवों का एक बड़ा मिलन समारोह बन गया था। एक ही जगह पर इतने सारे गांवों के लोगों का इकट्ठा होना हमारी सामुदायिक एकजुटता को दिखाता है। लोगों ने आपस में सुख-दुख बांटे और अपनी पुरानी खेल परंपरा को मिलकर आगे बढ़ाया।
अतिथियों ने तीर चलाकर किया शुभारंभ
इस खास कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जिला परिषद अध्यक्ष बारी मुर्मू और स्थानीय मुखिया कान्हू मुर्मू मौजूद थे। उनका स्वागत बिल्कुल पारंपरिक तरीके से किया गया। ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों के साथ उनका स्वागत किया। अतिथियों ने अपने भाषण में कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह के आयोजनों की बहुत जरूरत है। इससे हमारी पुरानी परंपराएं जिंदा रहती हैं और युवाओं को अपनी संस्कृति से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है। इसके बाद मुख्य अतिथियों ने खुद अपने हाथों में पारंपरिक धनुष-बाण थामा। उन्होंने खुद तीर चलाकर इस खेल प्रतियोगिता की शुरुआत की। अतिथियों को तीर चलाते देख वहां मौजूद सभी ग्रामीणों का जोश और ज्यादा बढ़ गया। मुखिया कान्हू मुर्मू ने कहा कि हूल के शहीदों का सपना तभी पूरा होगा जब हमारा समाज अपनी संस्कृति को बचाए रखेगा और हर क्षेत्र में आगे बढ़ेगा।
इस खेल ने गांवों की एकता को और मजबूत कर दिया
हूल दिवस के मौके पर हुए इस खेल ने गांवों की एकता को और मजबूत कर दिया है। यह आयोजन पूरी तरह से कामयाब रहा। खेल खत्म होने के बाद विजेता तीरंदाजों को पुरस्कार भी दिए गए। लेकिन लोगों का कहना था कि इस खेल में हार-जीत से ज्यादा जरूरी अपनी संस्कृति को बचाना था। ग्रामीण क्षेत्र की इस समृद्ध खेल परंपरा ने सबका दिल जीत लिया। इस कार्यक्रम से यह साफ हो गया कि आज की दौड़ती-भागती जिंदगी में भी हमारे गांव के लोग अपनी आदिवासियत और अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं। उन्होंने अपने पूर्वजों की याद को बहुत ही सम्मान के साथ संजोकर रखा है। तालसा मैदान का यह नजारा लंबे समय तक लोगों की यादों में ताजा रहेगा। आने वाले सालों में भी इस परंपरा को इसी तरह से और बड़े पैमाने पर निभाने का संकल्प लिया गया।

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