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पूर्वी सिंहभूम में राज्यव्यापी नशामुक्ति अभियान का समापन, उपायुक्त बोले- “नशे को ना कहें, जीवन को हां कहें

Jamshedpur News: पूर्वी सिंहभूम जिला प्रशासन द्वारा राज्य सरकार के निर्देशानुसार 10 जून से 26 जून तक चलाए गए राज्यव्यापी नशामुक्ति जागरूकता अभियान के समापन अवसर पर समाहरणालय सभागार में एक विशेष सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में नशे के प्रति जागरूकता बढ़ाना, इसके दुष्प्रभावों को समझाना तथा नशामुक्त समाज के निर्माण के लिए सामूहिक जिम्मेदारी को मजबूत करना था। कार्यक्रम में उपायुक्त, उप विकास आयुक्त, विभिन्न विभागों के पदाधिकारी, विशेषज्ञ एवं सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

नशामुक्त समाज के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत


कार्यक्रम की शुरुआत उप विकास आयुक्त के स्वागत संबोधन और विषय प्रवेश से हुई। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि “जिंदगी से मोहब्बत करना है, नशे से नफरत करना है।” उन्होंने कहा कि नशा केवल व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे परिवार और सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करता है। ऐसे में समाज के हर वर्ग को आगे आकर लोगों को नशे की लत से बाहर निकालने के लिए सहयोग करना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जागरूकता, संवाद और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही नशामुक्त समाज की कल्पना को साकार किया जा सकता है।

लघु फिल्म के माध्यम से दिखाए गए नशे के दुष्परिणाम


कार्यक्रम के दौरान नशे के दुष्प्रभावों पर आधारित एक लघु फिल्म का प्रदर्शन किया गया। फिल्म में यह दर्शाया गया कि किस प्रकार नशे की आदत व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति, आर्थिक स्थिति और पारिवारिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। फिल्म के माध्यम से उपस्थित लोगों को यह संदेश दिया गया कि नशे से दूरी बनाना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

विशेषज्ञों ने बताए नशे की लत के मनोवैज्ञानिक कारण


सेमिनार में मनोवैज्ञानिक पुष्पा वाला महतो ने नशे की लत के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि एडिक्शन मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाली सुखद अनुभूति से जुड़ी प्रक्रिया है, जो धीरे-धीरे व्यक्ति के व्यवहार और निर्णय क्षमता को प्रभावित करने लगती है। उन्होंने युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति के पीछे कई कारण बताए, जिनमें जिज्ञासा, प्रयोग करने की प्रवृत्ति, साथियों का दबाव, सामाजिक स्वीकार्यता की चाह, पारिवारिक तनाव और अभिभावकीय निगरानी की कमी प्रमुख हैं। उन्होंने परिवार और शिक्षकों को युवाओं के साथ संवाद बढ़ाने की सलाह दी।

कानूनी जानकारी और पुनर्वास पर भी हुआ विशेष जोर


कार्यक्रम में डालसा की अधिवक्ता प्रीति मुर्मू ने मादक पदार्थों से जुड़े कानूनी प्रावधानों की जानकारी दी। उन्होंने एनडीपीएस अधिनियम 1985 के तहत नशीले पदार्थों के उपयोग, तस्करी, दंड और कानूनी प्रक्रिया को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि नशे से प्रभावित व्यक्तियों को केवल कानूनी दृष्टि से नहीं बल्कि पुनर्वास और सहायता के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। इसी दिशा में कानूनी सहायता और जागरूकता कार्यक्रमों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

युवाओं को ‘ना’ कहना सीखना होगा: सामाजिक संस्थाओं का संदेश


‘युवा’ संस्था की प्रतिनिधि बरनाली चक्रवर्ती ने युवाओं को नशे से बचाने के लिए सामाजिक जागरूकता और नेतृत्व निर्माण पर बल दिया। उन्होंने कहा कि युवाओं को जीवन में गलत आदतों के प्रति स्पष्ट रूप से “ना” कहना सीखना होगा। उन्होंने बताया कि संस्था युवाओं को “यंग चेंज मेकर लीडर” के रूप में तैयार कर रही है ताकि वे समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें। बच्चों और युवाओं के लिए सुरक्षित संवाद का वातावरण तैयार करना समय की जरूरत है।

नशा केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक समस्या 


समापन संबोधन में उपायुक्त श्री राजीव रंजन ने कहा कि नशा केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि सामाजिक और पारिवारिक चुनौती भी है। उन्होंने कहा कि बच्चे और युवा जीवन के ऐसे चरण में होते हैं जहां उन्हें मार्गदर्शन और सहयोग की आवश्यकता होती है। उन्होंने चिंता जताई कि आज कई स्थानों पर नशा सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बनता जा रहा है, जो गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि जो लोग इस समस्या से प्रभावित हैं उन्हें दंडित करने के बजाय सही उपचार, पुनर्वास और सहयोग देना अधिक आवश्यक है।अंत में उन्होंने सभी उपस्थित लोगों से संकल्प लेने का आह्वान करते हुए कहा “नशे को ना कहें, जीवन को हां कहें” और समाज को नशामुक्त बनाने के अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाने की अपील की।


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