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किताबों से निकलकर धरातल पर इतिहास को जीने की एक अनूठी कोशिश, छात्राओं ने जाना झारखंड का गौरवशाली इतिहास

 Jamshedpur News:छात्राओं ने जमशेदपुर के सोनारी स्थित ट्राइबल कल्चर सेंटर का शैक्षणिक भ्रमण किया. आदिवासी समाज के साजो-समान को नजदीक से देखा. साथ ही उनके महत्व को समझने का प्रयास किया


Jamshedpur News: जमशेदपुर में युवाओं को अपनी माटी और समृद्ध विरासत से जोड़ने की एक बेहद सकारात्मक और सराहनीय पहल सामने आई है। 'नेचर' संस्था द्वारा संचालित इंटर्नशिप कार्यक्रम के तहत इतिहास विषय की छात्राओं के लिए सोनारी स्थित ट्राइबल कल्चर सेंटर (TCC) का एक विशेष शैक्षणिक भ्रमण आयोजित किया गया। इस अनूठे फील्ड विजिट का मुख्य उद्देश्य छात्राओं को केवल पाठ्यपुस्तकों के पन्नों तक सीमित न रखकर, उन्हें झारखंड की गौरवशाली आदिवासी संस्कृति, अनूठे इतिहास, जीवंत कला और पारंपरिक जीवन शैली से आमने-सामने रूबरू कराना था। इतिहास को केवल रटने के बजाय उसे करीब से महसूस करने का यह अनुभव छात्राओं के लिए बेहद ज्ञानवर्धक और उनके दृष्टिकोण को बदलने वाला साबित हुआ।



आदिवासी समाज की परंपराओं और सामाजिक ताने-बाने को करीब से जाना

भ्रमण के दौरान ट्राइबल कल्चर सेंटर के विशेषज्ञ राकेश सिंह ने गाइड की भूमिका निभाते हुए छात्राओं का मार्गदर्शन किया। उन्होंने बेहद सरल और संजीदा तरीके से झारखंड की विभिन्न जनजातियों के गौरवशाली इतिहास और उनकी सामाजिक संरचना के बारे में विस्तार से चर्चा की। राकेश सिंह ने छात्राओं को बताया कि आदिवासी समुदायों का ताना-बाना आपसी सहयोग, लोकनृत्य, लोकसंगीत और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव पर आधारित है। उन्होंने संताल, हो, मुंडा, उरांव और अन्य जनजातियों के पारंपरिक रीति-रिवाजों और उनके दैनिक जीवन के मनोरंजन के विविध स्वरूपों पर भी प्रकाश डाला, जिससे छात्राओं को स्थानीय समाज को एक नए और सकारात्मक नजरिए से देखने का मौका मिला।

संग्रहालय की दुर्लभ धरोहरें बनीं छात्राओं के आकर्षण का केंद्र

इस शैक्षणिक भ्रमण का सबसे मुख्य और आकर्षक हिस्सा ट्राइबल कल्चर सेंटर का संग्रहालय (म्यूजियम) रहा। संग्रहालय में प्रदर्शित दशकों और सदियों पुराने दुर्लभ ऐतिहासिक साक्ष्यों को देखकर छात्राएं मंत्रमुग्ध हो गईं। वहां रखी गई पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, कृषि कार्य में इस्तेमाल होने वाले प्राचीन उपकरण, शिकार के औजार और मांदर, नगाड़ा जैसे पारंपरिक संगीत वाद्यों ने छात्राओं को खूब आकर्षित किया। इन सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से छात्राओं ने यह समझा कि कैसे आधुनिक संसाधनों के बिना भी आदिवासी समाज ने एक आत्मनिर्भर और उन्नत जीवन शैली का विकास किया था।



अतीत की धरोहर ही नहीं, प्रकृति के साथ जीने का जीवंत मार्गदर्शिका है संस्कृति

संवाद के क्रम को आगे बढ़ाते हुए राकेश सिंह ने एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक बात साझा की। उन्होंने कहा कि झारखंड की आदिवासी संस्कृति केवल अतीत की कोई बंद पड़ी धरोहर या इतिहास की किताब का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह वर्तमान समय में भी प्रकृति के संरक्षण, सामुदायिक समरसता और पारंपरिक ज्ञान के अद्भुत समन्वय के साथ जीवित है। आज के इस दौर में जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब आदिवासी समाज का जल-जंगल-जमीन के प्रति सम्मान और पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली पूरी मानवता के लिए एक मार्गदर्शिका की तरह है। इसके साथ ही उन्होंने राज्य के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए आदिवासियों द्वारा किए गए ऐतिहासिक संघर्षों और क्रांतियों से भी छात्राओं को अवगत कराया।

Experiential Learning से निखरेगा छात्राओं का शोध कौशल

इस पूरे दौरे के दौरान छात्राओं में गजब का उत्साह देखने को मिला। उन्होंने न केवल प्रदर्शनों को ध्यान से देखा, बल्कि एक जिज्ञासु शोधकर्ता की तरह आदिवासी समाज के इतिहास और कला से जुड़े कई विचारणीय प्रश्न भी पूछे, जिनका मौके पर ही विस्तार से समाधान किया गया। नेचर संस्था की मेंटर्स डॉ. कविता परमार और डॉ. विनीता परमार ने इस सकारात्मक पहल की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि इस इंटर्नशिप कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य 'अनुभवात्मक अधिगम' (प्रैक्टिकल लर्निंग) को बढ़ावा देना है। जब विद्यार्थी अपनी आंखों से इतिहास के साक्ष्यों को देखते हैं, तो उनके भीतर स्थानीय समाज के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है। इस प्रकार के फील्ड विजिट न केवल विद्यार्थियों के ज्ञान के दायरे को बढ़ाते हैं, बल्कि भविष्य के लिए उनके शोध (Research) और लेखन कौशल (Writing Skills) को भी एक नई धार देते हैं। भ्रमण के अंत में छात्राओं ने भी माना कि यह दौरा उनके अकादमिक करियर के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

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