Jamshedpur News : करनडीह स्थित आइसेक प्रांगण में आदिवासी सेंगेल अभियान की ओर से संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद सालखन मुर्मू का 74वां जन्मदिन उत्साहपूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में सेंगेल कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आदिवासी समाज के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम में सालखन मुर्मू के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक योगदानों को याद करते हुए उनके लंबे संघर्षों पर प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति, धर्म और अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित किया है।

1980 से आदिवासी हितों के लिए संघर्षरत हैं सालखन मुर्मू

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सालखन मुर्मू वर्ष 1980 से लगातार आदिवासी समाज के हितों के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं। उन्होंने आदिवासियों के हासा-भाषा, जातीय पहचान, सरना धर्म, सम्मान, आबादी, चास-वास (जल, जंगल, जमीन) और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए विभिन्न स्तरों पर आंदोलन चलाए हैं। सेंगेल नेताओं ने कहा कि आदिवासी समाज की अस्मिता और पहचान को सुरक्षित रखने के लिए सालखन मुर्मू ने न केवल सामाजिक आंदोलन किए, बल्कि संसद और राष्ट्रीय मंचों पर भी आदिवासियों की आवाज को मजबूती से उठाया। उनके नेतृत्व में कई महत्वपूर्ण मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बने।


संताली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने में निभाई अहम भूमिका

कार्यक्रम में वक्ताओं ने सालखन मुर्मू के उस ऐतिहासिक योगदान को विशेष रूप से याद किया, जिसके परिणामस्वरूप संताली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिला। बताया गया कि वर्ष 1992 में उन्होंने “संताली भाषा मोर्चा” का गठन किया था और संताली भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए व्यापक आंदोलन शुरू किया। इस दौरान रेल और सड़क चक्का जाम जैसे आंदोलन आयोजित किए गए तथा 12वीं और 13वीं लोकसभा में कई बार यह मुद्दा उठाया गया। लंबे संघर्ष और विभिन्न राजनीतिक स्तरों पर प्रयासों के बाद 22 दिसंबर 2003 को संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। वक्ताओं ने कहा कि इस उपलब्धि ने संताली भाषा को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का कार्य किया और यह आदिवासी समाज के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

चार प्रमुख मांगों को लेकर जारी है सेंगेल का आंदोलन

सेंगेल अभियान की ओर से वर्तमान समय में चार प्रमुख मांगों को लेकर संघर्ष जारी रखने की बात दोहराई गई। पहली मांग है कि संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत संताली भाषा को झारखंड की प्रथम राजभाषा का दर्जा दिया जाए। दूसरी मांग जनगणना में सरना धर्म के लिए अलग धर्म कोड की है, ताकि आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से दर्ज हो सके। तीसरी मांग मरांग बुरू से जुड़े धार्मिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों को आदिवासी समाज को वापस सौंपने की है। वहीं चौथी मांग वंशपरंपरागत माझी-परगना स्वशासन व्यवस्था में जनतंत्रीकरण और संवैधानिक सुधार लागू करने की है। नेताओं ने कहा कि इन मांगों के समाधान से आदिवासी समाज की सांस्कृतिक और प्रशासनिक पहचान को मजबूती मिलेगी।


सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने का लिया संकल्प

जन्मदिन समारोह केवल सम्मान और उत्सव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे सामाजिक जागरूकता के मंच के रूप में भी उपयोग किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने समाज में व्याप्त विभिन्न कुरीतियों को समाप्त करने का संकल्प लिया। विशेष रूप से नशापान, अंधविश्वास, डायन प्रथा, जबरन जुर्माना, सामाजिक बहिष्कार और महिला विरोधी मानसिकता जैसी बुराइयों को समाज से समाप्त करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज की प्रगति और सशक्तिकरण के लिए सामाजिक सुधार उतना ही आवश्यक है जितना कि राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा।

बड़ी संख्या में सेंगेल कार्यकर्ता रहे मौजूद

सालखन मुर्मू के 74वें जन्मदिन समारोह में सेंगेल संगठन के कई पदाधिकारी और कार्यकर्ता शामिल हुए। कार्यक्रम में केंद्रीय सेंगेल संयोजक बिमो मुर्मू, बिरसा मुर्मू, मंगल पाड़ेया, भगीरथ मुर्मू, छिता मुर्मू, जूनियर सालखन मुर्मू, ईश्वर सोरेन, बहादुर हांसदा, सुबोध मारडी, किसून हांसदा, सनत बास्के, गांधी किस्कू, सुखलाल मुर्मू सहित अनेक लोग उपस्थित रहे। सभी ने सालखन मुर्मू के स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना करते हुए उनके नेतृत्व में आदिवासी समाज के अधिकारों और पहचान की लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया। कार्यक्रम का समापन सामूहिक शुभकामनाओं और समाजहित में कार्य करने के संकल्प के साथ हुआ।