FOREST DEPARTMENT NEWS : झारखंड के कोल्हान प्रमंडल में हाथी और मानव के बीच बढ़ता संघर्ष लंबे समय से वन विभाग और स्थानीय प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। हाथियों के झुंड द्वारा फसलों को नष्ट करने, घरों को तोड़ने और कई बार इंसानी जान माल को नुकसान पहुँचाने की खबरें आए दिन सामने आती रहती हैं। इस गंभीर और संवेदनशील समस्या का स्थायी और आधुनिक समाधान खोजने के लिए वन विभाग ने अब अत्याधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। विभाग द्वारा क्षेत्र में हाथी-मानव संघर्ष को न्यूनतम स्तर पर लाने और ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत की गई है। इस नई पहल के तहत पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जिले के सबसे ज्यादा हाथी प्रभावित और संवेदनशील क्षेत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से लैस कैमरों को लगाने की प्रक्रिया तेजी से शुरू कर दी गई है। वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि पारंपरिक तरीकों की तुलना में यह आधुनिक तकनीक हाथियों की सटीक निगरानी करने और जान-माल के नुकसान को रोकने में मील का पत्थर साबित होगी।
पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां में शुरू हुआ महा-अभियान
वन विभाग की इस विशेष योजना के अंतर्गत पहले चरण में कुल 26 अत्याधुनिक एआई (AI) कैमरे लगाए जा रहे हैं। इन कैमरों को उन चुनिंदा हॉटस्पॉट और रास्तों पर स्थापित किया जा रहा है, जहाँ से हाथियों का आवागमन सबसे अधिक होता है। भौगोलिक दृष्टि से इन कैमरों को पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया वन क्षेत्र, सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल और विश्व प्रसिद्ध दलमा वन्यजीव अभयारण्य (Dalma Wildlife Sanctuary) के संवेदनशील इलाकों में विभाजित किया गया है। इन क्षेत्रों में कैमरा लगाने का जमीनी काम युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया गया है। वन विभाग के तकनीकी विशेषज्ञों की देखरेख में कैमरों की टेस्टिंग और इंस्टॉलेशन की जा रही है। इस तकनीक के आने से अब वन विभाग के मैदानी कर्मचारियों को हाथियों के पीछे-पीछे जंगलों में भटकने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि एक केंद्रीकृत नियंत्रण कक्ष (Central Control Room) से हाथियों की पल-पल की लोकेशन को ट्रैक किया जा सकेगा।
24 घंटे निगरानी और ऑटोमैटिक सायरन से मिलेगी सुरक्षा
इन एआई कैमरों की कार्यप्रणाली बेहद अनूठी और पूरी तरह से स्वचालित (Automated) है। वन विभाग के अनुसार, ये कैमरे चौबीसों घंटे यानी 24 घंटे सक्रिय रहकर हाथियों की गतिविधियों पर पैनी नजर रखेंगे। इन कैमरों में एडवांस मोशन सेंसर्स और डीप लर्निंग एल्गोरिदम का उपयोग किया गया है, जो इंसानों, मवेशियों और हाथियों के बीच आसानी से अंतर पहचान सकते हैं। जैसे ही कोई हाथी या हाथियों का पूरा झुंड इन कैमरों की रेंज (दायरे) में आएगा, सिस्टम बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के स्वतः सक्रिय हो जाएगा। सक्रिय होते ही मैदानी स्तर पर लगे हाई-डेसिबल सायरन बजने लगेंगे। सायरन की आवाज सुनते ही आसपास के गाँवों के लोग तुरंत सतर्क हो जाएंगे और सुरक्षित स्थानों पर चले जाएंगे। इसके साथ ही, एआई सिस्टम तुरंत वन विभाग की क्विक रिस्पांस टीम और संबंधित ग्रामीणों के मोबाइल पर अलर्ट और लोकेशन मैसेज भेज देगा, जिससे वन कर्मी तुरंत मौके पर पहुँचकर हाथियों को आबादी वाले क्षेत्रों में घुसने से पहले ही रोक सकेंगे।
रात के अंधेरे में भी काम करेगी तकनीक, बन रहे हैं ऊंचे टावर
हाथियों के उपद्रव और हमलों की अधिकांश घटनाएं शाम ढलने के बाद या देर रात को होती हैं, जब ग्रामीण सो रहे होते हैं और अंधेरे के कारण हाथियों की उपस्थिति का पता लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए इन एआई कैमरों में थर्मल इमेजिंग और अत्याधुनिक नाइट विजन (Night Vision) तकनीक दी गई है। यह तकनीक रात के घने अंधेरे या घने कोहरे में भी हाथियों की सटीक पहचान करने और अलर्ट जारी करने में पूरी तरह सक्षम है। इन कैमरों की सुरक्षा और उनकी रेंज को अधिकतम करने के लिए वन विभाग द्वारा विशेष रूप से डिजाइन किए गए 40 फीट ऊंचे लोहे के टावरों का निर्माण किया जा रहा है। इतनी ऊंचाई पर कैमरा लगाने के दो मुख्य फायदे हैं; पहला यह कि हाथियों का झुंड चाहकर भी इन कैमरों और टावरों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकेगा, और दूसरा यह कि ऊंचाई से कैमरे को एक बड़ा विहंगम दृश्य (Wide Angle View) मिलेगा, जिससे दूर से ही हाथियों की आमद को रिकॉर्ड किया जा सकेगा।
चाकुलिया, चांडिल और दलमा के इन गाँवों में लग रहे हैं कैमरे
वन विभाग ने पिछले कुछ वर्षों में हुए हाथी हमलों के डेटा का गहन विश्लेषण करने के बाद उन गाँवों और रास्तों को चिह्नित किया है, जहाँ ये 26 कैमरे लगाए जा रहे हैं। जिलावार और क्षेत्रवार सूची निम्नलिखित है:
- पूर्वी सिंहभूम (चाकुलिया वन क्षेत्र): चाकुलिया के सबसे ज्यादा प्रभावित ग्रामीण इलाकों जैसे राजाबासा, जमुआ, माचाडीहा, कलसीमूंग, मोरबेडा और पूर्णापानी में कैमरों की स्थापना की जा रही है। ये वे इलाके हैं जहाँ अक्सर ओडिशा या पश्चिम बंगाल की सीमा से आकर हाथी महीनों तक डेरा डाले रहते हैं।
- सरायकेला-खरसावां (चांडिल वन क्षेत्र): चांडिल के कुकड़ू, नीमडीह, कुसपुतुल और अंडा जैसे घने जंगलों से सटे गाँवों में टावर खड़े किए जा रहे हैं।
- दलमा वाइल्डलाइफ सेंचुरी: दलमा की तलहटी और हाथियों के पारंपरिक 'माइग्रेशन कॉरिडोर' (आवागमन के रास्तों) पर ये कैमरे लगाए जा रहे हैं ताकि जैसे ही हाथी दलमा से नीचे उतरकर गाँवों की तरफ रुख करें, समय रहते इनपुट मिल जाए।
जान-माल और फसलों की सुरक्षा के लिए वन विभाग की बड़ी उम्मीद
चाकुलिया और चांडिल के वन क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए हाथियों का डर उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। हाथियों का झुंड अचानक खेतों में खड़ी धान, सब्जी और अन्य फसलों को मिनटों में रौंदकर बर्बाद कर देता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसके अलावा, कई बार हाथियों द्वारा कच्चे मकानों को ध्वस्त करने और अनाज खाने के चक्कर में इंसानों पर हमला करने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। वन विभाग ने इससे पहले भी हाथियों को भगाने के लिए पटाखे, मशाल, सोलर फेंसिंग (सौर बाड़) और ड्रम बजाने जैसे कई पारंपरिक और कृत्रिम प्रयास किए थे, लेकिन उनके परिणाम आंशिक ही रहे। अब वन विभाग को पूरा भरोसा है कि इस अत्याधुनिक एआई सर्विलांस तकनीक के स्थापित होने से हाथियों की रियल-टाइम (सटीक) लोकेशन मिलेगी। इससे न केवल इंसानी जान बचाई जा सकेगी, बल्कि किसानों की फसलों और ग्रामीणों के घरों की सुरक्षा भी शत-प्रतिशत सुनिश्चित की जा सकेगी।
सटीक निगरानी से थमेगा संघर्ष, अधिकारी ने जताई उम्मीद
इस महा-अभियान और तकनीकी बदलाव को लेकर वन विभाग बेहद गंभीर और आशान्वित है। पूरे प्रोजेक्ट की रूपरेखा और इसके उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए सरायकेला के वन प्रमंडल पदाधिकारी सबा आलम अंसारी ने बताया कि आधुनिक तकनीक का समावेश आज के समय की मांग है। हाथी-मानव द्वंद्व को कम करने की दिशा में हम वर्तमान में पायलट प्रोजेक्ट के तहत 26 एआई कैमरे लगा रहे हैं। ये कैमरे मुख्य रूप से दलमा वन्यजीव अभयारण्य के अलावा चाकुलिया और चांडिल के सबसे संवेदनशील पॉकेट्स में स्थापित किए जा रहे हैं। इन कैमरों के पूरी तरह से चालू हो जाने के बाद, हमारे पास हाथियों की गतिविधियों की एकदम सटीक और लाइव निगरानी करने की क्षमता होगी। जब हमें और ग्रामीणों को समय रहते हाथियों की मौजूदगी का पता चल जाएगा, तो टकराव की स्थिति अपने आप पैदा नहीं होगी। हमें विश्वास है कि यह तकनीक हाथी और मानव के बीच के संघर्ष को रोकने में मील का पत्थर साबित होगी और भविष्य में इसके सफल परिणामों को देखते हुए कैमरों की संख्या और बढ़ाई जाएगी।
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