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जाटाझोपड़ी में 10 साल बाद गूंजेंगे छऊ के घुंघरू, 17 जून को भव्य आयोजन; जानें सरायकेला और मानभूम शैली की खासियत

जमशेदपुर: बागबेड़ा के जाटाझोपड़ी में सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और उसे पुनर्जीवित करने की एक अनूठी पहल शुरू हुई है। स्थानीय स्तर पर कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आगामी 17 जून को जाटाझोपड़ी में भव्य छऊ नृत्य कार्यक्रम का आयोजन करने का निर्णय लिया गया है। यह निर्णय बुधवार को श्रीश्री जटेश्वर सेवा समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक में लिया गया, जिसकी अध्यक्षता बिष्टु लोहार ने की। बैठक में न केवल कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई, बल्कि आयोजन को सफल बनाने के लिए समिति का विस्तार भी किया गया।




10 वर्षों का सूखा खत्म, बस्तीवासियों में भारी उत्साह

जाटाझोपड़ी और आसपास के क्षेत्रों के लिए यह आयोजन बेहद खास और भावनात्मक है। इस क्षेत्र में लगभग 10 साल बाद छऊ नृत्य का आयोजन होने जा रहा है। एक दशक के लंबे अंतराल के बाद होने वाले इस आयोजन को लेकर पूरी बस्ती में उत्साह और खुशी का माहौल है। बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक, हर कोई अपनी पारंपरिक कला को अपने आंगन में जीवंत होते देखने के लिए उत्सुक है। ग्रामीणों का कहना है कि यह आयोजन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने का एक महापर्व है।

आयोजन के सफल संचालन के लिए नई समिति का गठन

बैठक के दौरान सर्वसम्मति से कार्यक्रम के सुचारू संचालन के लिए श्रीश्री जटेश्वर सेवा समिति की नई कार्यकारिणी की घोषणा की गई। समिति में अनुभवी और ऊर्जावान चेहरों को शामिल किया गया है:

  • मुख्य संयोजक: बहादुर किस्कू, फतेह हेंब्रम और फातु हांसदा।
  • अध्यक्ष: बिष्टु लोहार।
  • उपाध्यक्ष: सुरेश करवा।
  • सचिव: मोहन लोहार।
  • सह सचिव: लखींद्र लोहार।
  • कोषाध्यक्ष: गणेश लोहार।

इसके अलावा कार्यकारिणी समिति में फतेह लोहार, लेबा सुंडी, गोमहा लोहार समेत 45 सदस्यों को शामिल किया गया है। बैठक और कार्यक्रम का कुशल संचालन संटू लोहार द्वारा किया गया। समिति ने संकल्प लिया है कि इस बार का छऊ महोत्सव ऐतिहासिक होगा।

सरायकेला शैली की प्रमुख विशेषताएं

झारखंड की पहचान बन चुका छऊ नृत्य मुख्य रूप से तीन शैलियों में बंटा है, जिनमें सरायकेला शैली को सबसे परिष्कृत और शास्त्रीय माना जाता है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • मुखौटों का अनिवार्य प्रयोग: सरायकेला छऊ की सबसे बड़ी विशेषता इसके आकर्षक और कलात्मक मुखौटे (Masks) हैं। ये मुखौटे मिटटी, कागज की लुगदी और कपड़े से बनते हैं। पात्र की भावनाएं, जैसे- क्रोध, करुणा या प्रेम, चेहरे के भावों से नहीं बल्कि मुखौटों के आकार और रंगों से झलकती हैं।
  • लास्य और सौम्यता: इस शैली में गति बेहद काव्यात्मक, धीमी और लयबद्ध होती है। इसमें 'लास्य' (सौम्यता) का पुट अधिक होता है। नर्तक अपने शरीर के अंगों, विशेषकर गर्दन, छाती और पैरों के संचालन (चाल और उलीखाई) से पूरी कहानी बयां करता है।
  • राजसी संरक्षण और पौराणिक विषय: इस शैली को सरायकेला के राजघराने का संरक्षण मिला, जिससे इसमें एक शास्त्रीय अनुशासन आया। इसके कथानक मुख्य रूप से रामायण, महाभारत, पुराणों और प्रकृति (जैसे- मयूर नृत्य, सागर नृत्य) पर आधारित होते हैं। इसमें वाद्य यंत्र के रूप में नगाड़ा, शहनाई और ढाक का प्रयोग होता है, जो संगीत को गंभीर और सुरीला बनाते हैं।

मानभूम शैली की प्रमुख विशेषताएं

छऊ नृत्य की मानभूम शैली (जो मुख्य रूप से पुरुलिया और कतरास के इलाकों से जुड़ी है) अपनी अद्वितीय ऊर्जा और लोक तत्वों के लिए जानी जाती है। इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • उर्जावान और तांडव प्रधान: मानभूम शैली पूरी तरह से शक्ति, पराक्रम और 'तांडव' रस से भरपूर होती है। इसमें नर्तक हवा में ऊंचे उछाल लेते हैं, कलाबाजियां खाते हैं और घुटनों के बल बैठकर युद्ध के दृश्यों को जीवंत करते हैं। इसकी गति अत्यंत तीव्र होती है जो दर्शकों में रोमांच भर देती है।
  • विशाल और भारी मुखौटे: इस शैली में इस्तेमाल होने वाले मुखौटे सरायकेला की तुलना में काफी बड़े और सजे-धजे होते हैं। विशेषकर असुरों और भगवान शिव या दुर्गा के मुखौटों के ऊपर कृत्रिम आभूषणों, चमकीले पंखों और मोतियों का भारी मुकुट होता है।
  • लोक जीवन और सीधे संवाद का प्रभाव: मानभूम शैली में पौराणिक कथाओं (जैसे- महिषासुर वध, अभिमन्यु वध) के साथ-साथ स्थानीय लोक जीवन और समसामयिक विषयों को भी पिरोया जाता है। इसमें वाद्य यंत्रों में ढाक, ढोल और कड़खा की आवाज इतनी तीव्र होती है कि वह नर्तकों और दर्शकों के भीतर एक अद्भुत जोश पैदा कर देती है। यह शैली सीधे तौर पर आम जनता के कौतूहल और मनोरंजन से जुड़ी है।

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