वन स्टेट वन आर्टिस्ट” समिट में मिला राष्ट्रीय सम्मान
Jamshedpur News: जमशेदपुर के युवा इंजीनियर सह कलाकार अर्नब कुमार कोले ने झारखंड की पारंपरिक सोहराय कला को राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दिलाने का काम किया है। उन्होंने प्रतिष्ठित “वन स्टेट वन आर्टिस्ट (OSOA)” राष्ट्रीय कला समिट में झारखंड का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्य का गौरव बढ़ाया। देशभर की लोक कलाओं और कलाकारों को एक मंच देने के उद्देश्य से आयोजित इस समिट में विभिन्न राज्यों के कलाकारों ने भाग लिया। अर्नब का चयन सोहराय कला के प्रतिनिधि के रूप में होना न केवल उनके लिए, बल्कि पूरे झारखंड के लिए गर्व की बात मानी जा रही है।

बचपन से प्रकृति और चित्रकला से रहा गहरा जुड़ाव
जमशेदपुर की प्राकृतिक सुंदरता, नदियों और हरियाली के बीच पले-बढ़े अर्नब के भीतर कला के प्रति लगाव बचपन से ही था। बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के उन्होंने स्वयं अभ्यास कर चित्रकला की बारीकियां सीखीं। स्कूल और इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों में भी स्केचिंग और पेंटिंग उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रही। समय के साथ कला उनके लिए केवल शौक नहीं रही, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति और मानसिक शांति का माध्यम बन गई। प्रकृति से प्रेरित उनकी कला में झारखंड की संस्कृति और मिट्टी की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।

टाटा स्टील में नौकरी के दौरान बढ़ी सोहराय कला में रुचि
वर्ष 2018 में टाटा स्टील में जूनियर इंजीनियर के रूप में कार्यभार संभालने के बाद अर्नब की रुचि झारखंड की लोक कलाओं और सांस्कृतिक परंपराओं की ओर और अधिक बढ़ी। विशेष रूप से सोहराय कला ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। अध्ययन और अनुभव के दौरान उन्होंने महसूस किया कि सोहराय केवल एक चित्रकला शैली नहीं, बल्कि प्रकृति, आध्यात्म और जीवन के बीच गहरे संबंधों को व्यक्त करने वाली कला है। इस कला की प्रत्येक रेखा, आकृति और प्रतीक अपने भीतर सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अर्थ समेटे हुए हैं। यही कारण है कि उन्होंने इसे सीखने और आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

700 कलाकारों में चयनित होकर पहुंचे राष्ट्रीय रेजिडेंसी तक
फरवरी 2026 में अर्नब को “वन स्टेट वन आर्टिस्ट” समिट की जानकारी मिली, जिसके बाद उन्होंने आवेदन किया। देशभर से 700 से अधिक कलाकारों ने आवेदन किया था, लेकिन अंतिम रूप से केवल 41 कलाकारों का चयन हुआ। इनमें झारखंड से सोहराय कला के प्रतिनिधि के रूप में अर्नब कुमार कोले को चुना गया। यह कला रेजिडेंसी 1 से 9 मई 2026 तक हिमाचल प्रदेश में आयोजित हुई। इस दौरान उन्होंने बिहार की मंजूषा कला और महाराष्ट्र की चित्रकाठी शैली के कलाकारों के साथ संवाद किया और सोहराय कला के प्रतीकों तथा उनके गहरे अर्थों के बारे में जानकारी साझा की। उनकी प्रस्तुति और कला को अन्य कलाकारों ने भी काफी सराहा।

झारखंड की मिट्टी और पहचान को साथ लेकर चले अर्नब
अर्नब इस रेजिडेंसी में अपने साथ झारखंड की मिट्टी भी लेकर गए थे। उनका मानना है कि सिंहभूम पृथ्वी के सबसे प्राचीन भूभागों में से एक है और उस मिट्टी को साथ ले जाना अपनी जड़ों, इतिहास और पहचान को साथ लेकर चलने जैसा है। इसी मिट्टी ने उनकी कला को और अधिक भावनात्मक गहराई दी। रेजिडेंसी के दौरान एक विशेष क्षण तब आया जब पद्मश्री परेश राठवा ने उनकी कलाकृतियों को ध्यान से देखा और सोहराय कला के प्रतीकों के बारे में विस्तार से जानकारी ली। इस अनुभव ने अर्नब को यह एहसास दिलाया कि उनकी कला को राष्ट्रीय स्तर पर सही पहचान मिल रही है। आज भी वे इंजीनियरिंग और कला के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं।