डा. राही सोरेन ने तकनीक का उपयोग कर अपने पूर्वजों के ज्ञान, भाषा और पहचान को अमर बनाया

Positive Story : आज का युग तेजी से बदलती डिजिटल तकनीक का युग है और ऐसे समय में पश्चिम बंगाल के कोलकाता स्थित जादवपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध दूरदर्शी आदिवासी शोधकर्ता डॉ. राही सोरेन की जीवन यात्रा तथा उनका शोध कार्य पूरे आदिवासी समाज एवं नई पीढ़ी के लिए एक बेहतरीन प्रेरणा प्रस्तुत करता है. भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता में संताल समुदाय का इतिहास बहुत गौरवशाली रहा है, परंतु किसी भी समाज, जनजाति या समुदाय की वास्तविक पहचान केवल उसके वर्तमान परिदृश्य से तय नहीं होती, बल्कि उसके अतीत के दस्तावेजों, साहित्यिक समृद्धता, भाषा और ऐतिहासिक स्मृतियों पर टिकी होती है. समय के साथ प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोतों और दुर्लभ पांडुलिपियों के नष्ट होने का खतरा हमेशा बना रहता है, जिसे देखते हुए डॉ. राही सोरेन ने आधुनिक डिजिटलाइजेशन और शोध के माध्यम से संताली इतिहास, साहित्य और परंपराओं को सुरक्षित करने का ऐतिहासिक कार्य किया है. उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि डिजिटलाइजेशन का वास्तविक अर्थ केवल नये गैजेट्स अपनाना नहीं, बल्कि उस तकनीक का उपयोग अपने पूर्वजों के ज्ञान, भाषा और पहचान को अमर बनाना है. आज संताल समाज की नई पीढ़ी उच्च शिक्षा प्राप्त कर विश्व स्तरीय संस्थानों तक पहुंच रही है और आधुनिक तकनीकों में निपुण हो रही है. डॉ. राही सोरेन का यह योगदान उन्हें याद दिलाता है कि प्रगति का सच्चा अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना नहीं, बल्कि जड़ों से जुड़े रहकर आधुनिक बनना है. जिन समाजों के दस्तावेज, पांडुलिपियां और ऐतिहासिक स्मृतियां सुरक्षित रहती हैं, उनका अस्तित्व और गौरव हमेशा अमर रहता है तथा आने वाली पीढ़ियां अपना इतिहास गर्व से स्वयं पढ़ सकती हैं.

समाज की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण करने का बीड़ा उठाया 
डॉ. राही सोरेन का जीवन और शोध कार्य मुख्य रूप से संताली समाज की भाषायी और सांस्कृतिक जड़ों को सहेजने के इर्द-गिर्द केंद्रित है. जादवपुर विश्वविद्यालय में अपनी शैक्षणिक और अनुसंधानात्मक भूमिका निभाते हुए, उन्होंने महसूस किया कि औपनिवेशिक काल से लेकर 20वीं सदी के उत्तरार्ध तक लिखा गया संताली साहित्य और इतिहास के दुर्लभ दस्तावेज तेजी से भौतिक रूप से नष्ट हो रहे हैं. यदि किसी समुदाय के प्राथमिक स्रोत खो जाएं, तो उस समुदाय का इतिहास दूसरों द्वारा लिखे गये विवरणों पर निर्भर हो जाता है. इसी विचार को बदलते हुए डॉ. सोरेन ने संताली भाषा में रचित प्रारंभिक साहित्य, पत्र-पत्रिकाओं और ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स को ढूंढने और उनका वैज्ञानिक संरक्षण करने का बीड़ा उठाया. 

दुर्लभ संताली पांडुलिपियों का डिजिटलाइजेशन तैयार किया
संताली साहित्य को डिजिटल दुनिया में स्थापित करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम वर्ष 2021 में उठाया गया. डॉ. राही सोरेन के नेतृत्व में British Library Endangered Archives Programme (EAP1300) परियोजना की शुरुआत हुई, जिसमें उन्होंने 'प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर' (Principal Investigator) के रूप में कार्य किया. इस परियोजना के तहत उसने पूर्वी भारत में वर्ष 1890 से 1975 के दौरान प्रकाशित शुरुआती संताली पत्र-पत्रिकाओं, पत्रिकाओं और दुर्लभ साहित्य को चिन्हित किया, फिर उसे एकत्र कर उन्हें डिजिटल रूप में संरक्षित करने का काम किया. इस तरह मार्च 2022 तक इस परियोजना के तहत 131 दुर्लभ सामग्रियां खोज की गयी. उसके बाद उनकी 1,793 उच्च-गुणवत्ता वाली डिजिटल तस्वीरें तैयार की गयी.

1890 से 1975 के बीच का दौर को डिजिटल रूप में कैद किया 
डॉ. राही सोरेन द्वारा संचालित डिजिटलाइजेशन का यह काम केवल पुरानी पुस्तकों को स्कैन करने या कंप्यूटर में सहेजने तक सीमित नहीं है. इन दस्तावेजों का वास्तविक महत्व यह है कि ये संताली समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना, लोकगीतों, लोककथाओं और उनके ऐतिहासिक संघर्षों के प्राथमिक स्रोत हैं. 1890 से 1975 के बीच का दौर भारत और विशेष रूप से आदिवासी समाज के लिए बड़े बदलावों का दौर था. इन शुरुआती पत्र-पत्रिकाओं में तत्कालीन समाज की सोच, उनकी जीवन शैली, जल-जंगल-जमीन से जुड़ाव और भाषा के विकास की कहानी दर्ज है. डॉ. सोरेन द्वारा इन प्राथमिक स्रोतों को डिजिटल रूप देने से अब दुनिया भर के शोधकर्ताओं को संताली भाषा और लोकगीतों के मूल रूप का अध्ययन करने का अवसर मिलेगा, इससे इतिहास के साथ हुई किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की संभावना समाप्त होती है.

इतिहास के पन्नों में ओझल संताल महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डाला 
संताल इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवशाली अध्याय है 1855 का संताल हूल, जिसमें ब्रिटिश हुकूमत और महाजनी व्यवस्था के खिलाफ महान सिदो-कान्हू, चांद-भैरव के नेतृत्व में उलगुलान हुआ था. डॉ. राही सोरेन ने संताल हूल के इतिहास को सार्वजनिक और अकादमिक विमर्श में एक नया दृष्टिकोण दिया है. वे विशेष रूप से इतिहास के पन्नों में ओझल कर दी गईं संताल महिलाओं की भूमिका पर लगातार प्रकाश डालती रही हैं. उनका मानना है कि संताल हूल केवल पुरुषों का संग्राम नहीं था, बल्कि उसमें संताल महिलाओं का त्याग, रणनीति और नेतृत्व क्षमता भी उतनी ही अनुकरणीय थी. 

जन-जन तक इतिहास को पहुंचाने का कर रहीं प्रयास
अक्सर देखा जाता है कि शोध कार्य बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों की पुस्तकालयों और फाइलों तक ही सीमित रह जाते हैं. लेकिन डॉ. सोरेन का मानना है कि जिस समुदाय का इतिहास है, उस समुदाय के प्रत्येक व्यक्ति को अपने अतीत को देखने और समझने का अधिकार होना चाहिए. इसी सोच के साथ वर्ष 2024 में उन्होंने कोलकाता में दुर्लभ संताली दस्तावेजों और संताल हूल से संबंधित सामग्रियों की एक विशेष प्रदर्शनी आयोजित किया. इस प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक दस्तावेजों को आम जनता और संताल समाज के लोगों के समक्ष प्रस्तुत करना था.इस आयोजन के माध्यम से युवाओं, छात्रों और समुदाय के आम नागरिकों ने अपने पूर्वजों द्वारा लिखी गई पत्र-पत्रिकाओं, ऐतिहासिक पत्रों और चित्रों को प्रत्यक्ष रूप से देखा और अपने इतिहास पर गर्व महसूस किया.