Jamshedpur News: असम के गुवाहाटी स्थित साहित्य सभा भवन में रविवार को मरांगबुरु बचाओ संघर्ष मोर्चा की ओर से एक दिवसीय राज्य स्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया गया. ऑल असम माझी मंडल के अध्यक्ष दिपेन मुर्मू की अध्यक्षता में संपन्न इस सम्मेलन में देशभर से आए प्रतिनिधियों ने आदिवासियों के अस्तित्व, पहचान और धार्मिक धरोहरों की रक्षा के लिए हुंकार भरी. मरांगबुरु आदिकाल से आदिवासियों का पवित्र धार्मिक स्थल
सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद मरांगबुरु बचाओ संघर्ष मोर्चा के महासचिव हीरालाल माझी ने कहा कि मरांगबुरु आदिकाल से ही आदिवासी संताल समाज का परम पवित्र धार्मिक स्थल रहा है. प्रकृतिपूजक आदिवासी समाज गिरिडीह स्थित मरांगबुरु (पारसनाथ) को अपना आराध्य देव मानता है. यहां आज भी संताल समाज का ऐतिहासिक जुग जाहेरथान मौजूद है, जहां फाल्गुन माह में बाहा पूजा और बैशाख पूर्णिमा पर पारंपरिक विशु शिकार पर्व का आयोजन होता है.
सरकार और अदालत को दिग्भ्रमित कर किया जा रहा अतिक्रमण
हीरालाल माझी ने आरोप लगाया कि हाल के दिनों में एक साजिश के तहत सरकार और अदालत को दिग्भ्रमित कर मरांगबुरु पारसनाथ को शिखरजी घोषित कराया गया है. उन्होंने कहा कि जो बाहरी लोग अतिक्रमणकारी हैं, वे आज इस भूमि पर मालिकाना हक का झूठा दावा कर रहे हैं. पारसनाथ मौजा के सभी गांवों में पारंपरिक आदिवासी स्वशासन व्यवस्था लागू है और हर गांव में जाहेरथान व माझीथान स्थापित हैं.
आदिवासी अस्तित्व मिटाने की साजिश हुई तो होगा बड़ा विद्रोह
महासचिव ने चेतावनी देते हुए कहा कि आदिवासियों ने कभी किसी की गुलामी या अन्याय को स्वीकार नहीं किया है. इतिहास गवाह है कि जब भी आदिवासियों के हक-अधिकार और आस्था पर चोट की गई है, तब-तब बड़ा विद्रोह हुआ है. यदि मरांगबुरु से आदिवासियों को बेदखल करने का प्रयास किया गया, तो समाज चुप नहीं बैठेगा और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए उलगुलान करने को बाध्य होगा.
4-5 नवंबर को मधुबन में जुटेगा देशभर का आदिवासी समाज
सम्मेलन के माध्यम से आगामी आंदोलन की रूपरेखा तय की गई. आगामी 4 और 5 नवंबर को गिरिडीह के मधुबन में 'मरांगबुरु धोरोमगाढ़ महासम्मेलन व आमसभा' का विशाल आयोजन किया जाएगा. नेताओं ने असम समेत पूरे देश के आदिवासियों से हजारों की संख्या में पहुंचने का आह्वान किया. कार्यक्रम में सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक व संवैधानिक अधिकारों पर भी गहन विचार-विमर्श हुआ.
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