करनडीह दिशोम जाहेरथान में कोल्हान प्रमंडल स्तरीय आदिवासी संताल समाज का धार्मिक सम्मेलन आयोजित
Jamshedpur News : करनडीह स्थित दिशोम जाहेरथान में ''धाड़ दिशोम माझी परगना महाल'' के तत्वावधान में कोल्हान स्तरीय आदिवासी संताल समाज का भव्य धार्मिक सम्मेलन आयोजित किया गया. इस महासम्मेलन में धाड़ दिशोम, कुचूंग दिशोम, बारहा दिशोम, पातकोम दिशोम और सिञ दिशोम की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के शीर्ष प्रतिनिधियों-देश परगना, तोरोप परगना, पीड़ परगना, घाट परगना, पारानिक, माझी बाबा और नायके बाबा समेत करीब 5 हजार से अधिक समाज के लोग शामिल हुए. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में धाड़ दिशोम के देश परगना बैजू मुर्मू एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में बारहा दिशोम देश परगना कमलाकांत मुर्मू, पातकोम दिशोम देश परगना रामेश्वर बेसरा, देश परगना पिथो मार्डी, जुगसलाई तोरोप परगना दशमत हांसदा एवं धाड़ दिशोम देश पारानिक दशमत हांसदा मौजूद थे. मौके पर मुख्य अतिथि बैजू मुर्मू ने कहा कि कोल्हान स्तर पर स्वशासन व्यवस्था द्वारा इतने व्यापक पैमाने पर धार्मिक सम्मेलन आयोजित करने का मूल उद्देश्य समाज को एकसूत्र में पिरोना और सामाजिक एकजुटता को मजबूती प्रदान करना है. उन्होंने कहा कि आज के दौर में आदिवासी समाज को सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक-हर मोर्चे पर जागरूक होने की सख्त जरूरत है, ताकि वर्तमान में सामने आ रही चुनौतियों का सामूहिक और प्रभावी रूप से मुकाबला किया जा सके. आज आदिवासी समाज पर चौतरफा हमले हो रहे हैं. एक ओर जहां कल-कारखानों और खनिज खदानों के नाम पर आदिवासियों को उनकी पैतृक भूमि व गांवों से पलायन के लिए बाध्य किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इससे उनकी सामाजिक व सांस्कृतिक एकता छिन्न-भिन्न हो रही है. नतीजतन, समाज का अस्तित्व गहरे संकट में है.
उन्होंने कहा कि करोड़ों की आबादी के बावजूद आदिवासियों को अब तक अलग धार्मिक पहचान न देना एक बड़ी साजिश का हिस्सा है. दूसरे धर्मों के लोग आदिवासियों को प्रलोभन देकर धर्मांतरण करा रहे हैं, जिस पर एकजुट होकर रोक लगानी होगी. उन्होंने आह्वान किया कि अपने हक, अधिकार और अस्तित्व की रक्षा के लिए पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को हर हाल में सशक्त बनाना होगा. जब समाज खुद सशक्त होगा, तो कोई भी विरोधी ताकत अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो सकेगी. इसके लिए सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, पूर्वजों के बताए रास्ते व रीति-रिवाजों का अनुसरण करना होगा और नई पीढ़ी को भी अपनी इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से अवगत कराना होगा. मौके पर मौके पर देश परगना बाबा बैजू मुर्मू, देश परगना पिथो मार्डी, देश परगना कमलाकांत मुर्मू, देश पारगना फाकिर मोहन टुडू, तोरोप परगना दशमत हांसदा, मानिक चंद्र मुर्मू, सुशील हांसदा, सनातन हांसदा, कुंवर मुर्मू, सुशील मुर्मू, बैजू टुडू, चंद्राय हांसदा, पुंता मुर्मू, पद्मावती हेंब्रम, राजाराम हांसदा, सुंदर मोहन हेंब्रम, देश पारानिक बाबा दुर्गाचरन मुर्मू, देश पारानिक नवीन मुर्मू, माझी बाबा बिंदे सोरेन, सुनील सोरेन, भुगलू सोरेन, नाथो टुडू, पोरेश हांसदा, बुद्धेश्वर किस्कू, शंकर हेंब्रम, गोपाल हांसदा आदि शामिल थे.
पारंपरिक रीति-रिवाज और स्वशासन व्यवस्था को जानने की जरूरत: दुर्गाप्रसाद मुर्मू
सम्मेलन के दौरान संताल समाज के पारंपरिक रीति-रिवाज के जानकार दुर्गाप्रसाद मुर्मू ने कहा कि आदिवासी संताल समुदाय की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है, जिसे बनाए रखना बहुत आवश्यक है. उन्होंने बताया कि आदिवासियों की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को रूढ़ी प्रथा के रूप में कानूनी मान्यता प्राप्त है. इसलिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी न्याय प्रणाली, पूजा पद्धति और परंपराओं की पूरी जानकारी होनी चाहिए. उन्होंने युवा पीढ़ी से आह्वान किया कि वे अपने पूर्वजों की अमूल्य धरोहर, जन्म से लेकर मरण तक के सामाजिक रीति-रिवाजों और संस्कारों से जुड़ाव रखें. साथ ही, उन्होंने संताल समाज के उद्गम स्थल, पौराणिक कथाओं, रीति-रिवाजों और पर्व-त्योहारों के ऐतिहासिक महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला.
धर्मांतरण और समाज में फूट डालने वाली शक्तियों से सतर्क रहने की अपील
जुगसलाई तोरोप परगना दशमत हांसदा ने कहा कि आदिवासी समाज विश्व के सभी धर्मों का सम्मान करता है, लेकिन बीते कुछ समय से साजिश के तहत आदिवासियों को धार्मिक रूप से बांटने और धर्मांतरित करने का प्रयास किया जा रहा है, जो कि गैर-कानूनी है. ऐसे असामाजिक और विघटनकारी तत्वों से पूरे समाज को सतर्क रहने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि आदिवासी संताल समाज का धार्मिक स्थल मरांगबुरू, लुगु बुरु, आजोदिया़ बुरु और राजरप्पा आदि धार्मिक स्थलों को सुरक्षित व संरक्षित रखना है. इसके लिए तमाम आदिवासी समाज के लोगों को सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीति हर तरह से एकजुट होना होगा और आवाज को बुलंद करना होगा.
सरना धर्म को मानने वालों की संख्या अधिक, इसलिए सरना धर्म को मान्यता मिले
धाड़ दिशोम देश पारानिक दुर्गाचरण मुर्मू ने कहा कि आदिवासी संताल समाज को धार्मिक पद्धतियों, विधि-विधानों को गहराई से समझने और अपनी सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण बनाये की जरूरत है. उन्होंने कहा कि आदिवासी संताल समाज कई दशकों से सरना धर्म को धार्मिक मान्यता देने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहा है. बावजूद इसके लंबे समय से आदिवासी संताल समाज को हाशिये पर रखने का काम किया जा रहा है. वहीं दूसरी ओर कुछ लोग साजिश के तहत सरना धर्म मांग पर पानी फेरना चाहते हैं. इसलिए आदिवासी धर्म के नाम पर लोगों को एकजुूट करने का प्रयास कर रहे हैं. पूरे देश में सरना धर्म को मानने वाले आदिवासियों की आबादी सबसे ज्यादा है. इस लिहाज से सरना धर्म पर ही मुहर लगाना चाहिए.
सम्मेलन में संताल समाज ने ये फैसला लिया
-आदिवासी संताल समाज किसी के प्रलोभन में आकर धर्मांतरण बिलकुल नहीं करेंगे
-सामाजिक गतिविधियों में अपनी उपस्थिति हरहाल में दर्ज करायेंगे
-पूर्वजों के बताये राह पर चलेंगे, अंर्तजातीय विवाह नहीं करेंगे
-नशा से परहेज करेंगे और शिक्षा को अपना शिक्षित बनेंगे
- अपने-अपने घरों में पारंपरिक औजार तीर धनुष अनिवार्य रूप से रखेंगे
-ओलचिकी लिपि को हर संताल समाज के घर-घर पहुंचायेंगे
-आम जनगणना में आदिवासी धर्म की जगह सरना धर्म ही लिखेंगे
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