सरना धर्म को लेकर डॉ. आशा लकड़ा के बयान पर माझी परगना महाल ने कड़ा विरोध जताया

Jamshedpur News : करनडीह स्थित दिसोम जाहेरथान में धाड़ दिशोम माझी परगना महाल पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था की बैठक देश परगना बाबा बैजू मुर्मू की अध्यक्षता में हुई। बैठक में राष्ट्रीय जनजाति आयोग की सदस्य डॉ. आशा लकड़ा के उस बयान पर कड़ी आपत्ति जतायी गयी, जिसमें उन्होंने सरना को धर्म के बजाय पूजा स्थल बताया था। महाल के सदस्यों ने कहा कि सरना आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय है। ऐसे में संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की ओर से इस तरह का बयान समाज में भ्रम पैदा कर सकता है।

डॉ. आशा लकड़ा के बयान पर जतायी नाराजगी

देश परगना बैजू मुर्मू ने कहा कि राष्ट्रीय जनजाति आयोग जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर रहने वाले व्यक्ति से आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की सही जानकारी की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने कहा कि डॉ. आशा लकड़ा के बयान से सरना समाज में नाराजगी है। उन्होंने सवाल उठाया कि उन्हें सरना धर्म की जानकारी का अभाव है या फिर किसी के इशारे पर सरना समाज विरोधी बयान दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरना आदिवासी समाज की पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था है, जिसे पीढ़ियों से समुदाय के लोग मानते और उसका पालन करते आ रहे हैं।

2027 की जनगणना से पहले सरना धर्म कोड की मांग

बैजू मुर्मू ने केंद्र सरकार से मांग की कि वर्ष 2027 की प्रस्तावित जनगणना से पहले सरना धर्म कोड को आधिकारिक मान्यता दी जाये। उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय अपनी पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवस्था के साथ जीवन जी रहे हैं। उनके अनुसार सरना धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या करोड़ों में है। उन्होंने कहा कि 2011 की जनगणना में 50 लाख से अधिक लोगों ने सरना धर्म का उल्लेख किया था। आगामी जनगणना में इसकी संख्या और बढ़ने की संभावना है। इसलिए अलग धार्मिक पहचान के लिए सरना धर्म कोड की मांग को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

आदिवासी पहचान को लेकर महाल ने रखा पक्ष

बैजू मुर्मू ने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं हैं। उन्होंने कहा, "आदिवासी ना कभी हिंदू थे, ना हैं और ना कभी होंगे।" उन्होंने आदिवासी समाज को वनवासी, जंगली या सनातनी कहकर संबोधित करने पर भी आपत्ति जतायी। महाल की बैठक में कहा गया कि इस तरह के शब्दों के इस्तेमाल से आदिवासी समाज की अलग पहचान और पारंपरिक व्यवस्था को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा होती है। नेताओं से ऐसे बयानों से बचने की अपील की गयी।

बयानबाजी जारी रही तो सामाजिक कार्रवाई की चेतावनी

बैठक में कहा गया कि सरना धर्म और आदिवासी धार्मिक पहचान के खिलाफ बयानबाजी बंद होनी चाहिए। महाल ने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की बयानबाजी आगे भी जारी रही, तो पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के तहत कठोर कार्रवाई की जायेगी। बैठक में हरिपोदो मुर्मू, दसमत हांसदा, पुन्ता मुर्मू, लखन मार्डी, देश पारानिक बाबा दुर्गाचरण मुर्मू, नवीन मुर्मू, गोपाल हांसदा, सुखराम किस्कू, रेंटा मुर्मू, लेदेम मुर्मू, कारु मुर्मू, शंकर हेंब्रम, विश्वनाथ मार्डी, सलखू सोरेन, जितु मुर्मू, बिपिन चंद्र मुर्मू, सुशील मुर्मू, वीर सिंह बास्के और सुनील मुर्मू समेत काफी संख्या में समाज के लोग मौजूद थे।