ओलचिकी लिपि को घर-घर पहुंचाने के लिए संघ चलाएगा महाअभियान
बैठक में उपस्थित सभी पदाधिकारियों व प्रतिनिधियों ने संताली भाषा के सर्वांगीण विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि संताली साहित्य के संवर्धन और ओलचिकी को हर घर में स्थापित करने के लिए राज्यव्यापी व क्षेत्रीय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि किसी भी समाज की अस्मिता उसकी भाषा और लिपि में निहित होती है। ओलचिकी लिपि का ज्ञान जन-जन तक पहुंचाकर ही संताली साहित्य की समृद्ध परंपरा को अक्षुण्ण रखा जा सकता है।
2 अक्टूबर को धूमधाम से मनेगी धर्म गुरु रामदास टुडू 'रास्का' की जयंती
बैठक के दौरान सर्वसम्मति से प्रथम संताली लिखित साहित्यकार एवं धर्म गुरु रामदास टुडू 'रास्का' की जयंती आगामी 2 अक्टूबर को भव्य रूप से मनाने का निर्णय लिया गया। यह जयंती समारोह चंदनकियारी महाविद्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित होगा। इस आयोजन को सुचारू एवं सफल बनाने के लिए एक समर्पित संचालन समिति का गठन किया गया है:
* अध्यक्ष: सनातन हेंब्रम
* उपाध्यक्ष: शिवलाल मुर्मू
* सचिव: प्रेम मरांडी
* उप-सचिव: भरत टुडू
* कोषाध्यक्ष: सतलोचन हांसदा
* सक्रिय सदस्य: पौलेन बेसरा, वीरेन्द्र सोरेन, राधाप्रसाद बारके, सपन हांसदा एवं नकुल बिस्कु।
संताली समाज के उत्कृष्ट समाजसेवियों एवं सेवानिवृत्त शिक्षकों का सम्मान
संताली समाज और शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान देने वाले वरिष्ठ व्यक्तित्वों के प्रति आभार प्रकट करते हुए संघ ने उन्हें सम्मानित भी किया। कार्यक्रम के दौरान सेवानिवृत्त शिक्षक मंगल टुडू तथा दुर्गा चरण मुर्मू को सम्मानित किया गया। इसके साथ ही सोनोत संताल समाज के अध्यक्ष शंकर प्रसाद मुर्मू और सचिव नारायण चंद्र मुर्मू को सामाजिक विकास में सराहनीय योगदान के लिए ओलचिकी साहित्य की पुस्तकें भेंट कर विशेष सम्मान दिया गया। इस अवसर पर सोमरा मुर्मू ने औपचारिक रूप से अखिल भारतीय संताली लेखक संघ की सदस्यता भी ग्रहण की।
सांस्कृतिक चेतना और भाषाई उत्थान के लिए एकजुट हुआ संताली समुदाय
कार्यक्रम का सफल संचालन सुधीर चंद्र मुर्मू द्वारा किया गया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. फुदान चंद्र सोरेन और सनातन हेंब्रम ने संयुक्त रूप से प्रस्तुत किया। इस ऐतिहासिक बैठक में बिरेन मांडी, सरिता सोरेन, सावित्री मुर्मू, प्रेम मार्डी समेत सैकड़ों की संख्या में बुद्धिजीवी, साहित्यप्रेमी और ग्रामीण उपस्थित रहे। सभी सदस्यों ने एक स्वर में संकल्प लिया कि वे संताली भाषा, साहित्य और ओलचिकी लिपि की रक्षा एवं इसके प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर सक्रिय योगदान देंगे।
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