Dhalbhumgarh Airport : पूर्वी सिंहभूम के बहुप्रतीक्षित धालभूमगढ़ एयरपोर्ट परियोजना को लेकर महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रगति हुई है। जमशेदपुर वन प्रमंडल के प्रभागीय वन पदाधिकारी (डीएफओ) सत्य आलम अंसारी ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा निर्धारित 19 बिंदुओं के अनुपालन संबंधी प्रतिवेदन वन संरक्षक, जमशेदपुर को भेज दिया है। अब यह रिपोर्ट मंत्रालय के ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड होने के बाद आगे की प्रक्रिया में जाएगी। इसके पश्चात वन भूमि हस्तांतरण और अंतिम स्वीकृति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ेगा। इस रिपोर्ट के भेजे जाने से वर्षों से लंबित धालभूमगढ़ एयरपोर्ट परियोजना के साकार होने की उम्मीद एक बार फिर मजबूत हुई है। प्रशासनिक स्तर पर इसे परियोजना की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
तीन चरणों में मिलेगी परियोजना को मंजूरी, वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया जारी
धालभूमगढ़ एयरपोर्ट के निर्माण के लिए वन भूमि का हस्तांतरण आवश्यक है। इसके लिए परियोजना को तीन प्रमुख चरणों से गुजरना होगा। पहले चरण में वन भूमि डायवर्जन के लिए स्टेज-1 यानी एडवाइजरी फॉरेस्ट क्लीयरेंस की प्रक्रिया पूरी होगी। दूसरे चरण में पर्यावरणीय स्वीकृति से जुड़े विभिन्न विभागों की अनुमति ली जाएगी। अंतिम चरण में पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) रिपोर्ट के आधार पर अंतिम पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) प्रदान की जाएगी। इसके अलावा भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) को राज्य के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन) से लिखित सहमति भी प्राप्त करनी होगी। यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। साथ ही राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जनसुनवाई आयोजित कर स्थानीय लोगों की राय भी ली जाएगी। जनसुनवाई की रिपोर्ट परियोजना के अंतिम मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
करीब 99.256 हेक्टेयर वन भूमि होगी हस्तांतरित, दोगुना क्षेत्र में होगा प्रतिपूरक वनीकरण
प्रस्तावित एयरपोर्ट के निर्माण के लिए कुल 99.256 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित किए जाने का प्रस्ताव है। वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार इसके बदले दोगुने क्षेत्र यानी 198.512 हेक्टेयर भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण किया जाएगा। प्रतिपूरक वनीकरण के लिए पूर्वी सिंहभूम जिले के कई क्षेत्रों की पहचान की गई है। इनमें चिंगरापहाड़ी, पुंडा, बरडीहा, चारगोड़ा, पोटका, सांगीझाटा, डिगरिया, डुमरिया, कोड़ाशोली और बाघाटोली जैसे क्षेत्र शामिल हैं। वन विभाग का कहना है कि इन क्षेत्रों में पौधारोपण कर पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया जाएगा। इससे वन क्षेत्र की भरपाई के साथ जैव विविधता संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। परियोजना के तहत पर्यावरणीय शर्तों का पालन सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं।
धालभूमगढ़ एयरपोर्ट क्यों है सबसे उपयुक्त, हाथी कॉरिडोर पर भी दी गई सफाई
धालभूमगढ़ में एयरपोर्ट निर्माण का प्रस्ताव कोई नया नहीं है। यह क्षेत्र वर्षों पहले ब्रिटिश काल में विकसित एयरस्ट्रिप के रूप में उपयोग में रहा है। इसी कारण इसे आधुनिक एयरपोर्ट के लिए उपयुक्त स्थान माना गया। जमशेदपुर के सोनारी हवाई अड्डे के सीमित विस्तार और घनी आबादी के कारण उसके विस्तार की संभावनाएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं। ऐसे में धालभूमगढ़ एयरपोर्ट को क्षेत्रीय हवाई संपर्क के लिए सबसे बेहतर विकल्प माना जा रहा है। परियोजना को लेकर सबसे बड़ा सवाल हाथी कॉरिडोर को लेकर उठाया जाता रहा है। हालांकि डीएफओ की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि प्रस्तावित रनवे का क्षेत्र मुख्य हाथी गलियारों से पर्याप्त दूरी पर स्थित है। रिपोर्ट के अनुसार प्रमुख हाथी माइग्रेशन रूट जैसे चांडिल–दलमा–चकुलिया तथा डुमरिया–गुड़कुला–मुसाबनी क्षेत्र प्रस्तावित डायवर्जन स्थल से लगभग 13 से 17 किलोमीटर दूर हैं। इसलिए परियोजना से हाथियों की आवाजाही पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना कम बताई गई है।
1438.95 करोड़ रुपये के संभावित सामाजिक-आर्थिक लाभ का अनुमान
परियोजना से जुड़े लागत-लाभ विश्लेषण में बताया गया है कि वन एवं पर्यावरण को होने वाली अनुमानित क्षति लगभग 29.56 करोड़ रुपये आंकी गई है। वहीं अगले 50 वर्षों में इस एयरपोर्ट परियोजना से समाज, व्यापार, उद्योग, पर्यटन और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को लगभग 1438.95 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ मिलने का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार संशोधित लागत-लाभ अनुपात 1:48.6 आंका गया है, जो परियोजना को आर्थिक दृष्टि से अत्यंत लाभकारी दर्शाता है। धालभूमगढ़ एयरपोर्ट बनने से कोल्हान प्रमंडल को राष्ट्रीय स्तर की बेहतर हवाई कनेक्टिविटी मिलेगी। इससे जमशेदपुर, घाटशिला, मुसाबनी, चाकुलिया, बहरागोड़ा और आसपास के औद्योगिक तथा पर्यटन क्षेत्रों को सीधा लाभ मिलेगा। निवेश बढ़ने, नए उद्योग स्थापित होने, पर्यटन को गति मिलने और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित होने की संभावना भी बढ़ेगी।अब वन विभाग की रिपोर्ट आगे भेजे जाने के बाद सभी की नजरें केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अंतिम स्वीकृति पर टिकी हैं। यदि शेष औपचारिकताएं समय पर पूरी हो जाती हैं, तो धालभूमगढ़ एयरपोर्ट परियोजना लंबे इंतजार के बाद धरातल पर उतरने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा सकती है।
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