Jamshedpur News : ग्रामीण और सुदूर इलाकों में मानसून के आते ही मलेरिया जैसी खतरनाक बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। इस गंभीर समस्या से निपटने और लोगों को सुरक्षित रखने के लिए पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर) जिले में एक बेहतरीन पहल की शुरुआत हुई है। टाटा स्टील फाउंडेशन अपने विशेष सामाजिक कार्यक्रम 'मानसी' के जरिए जिले के छह प्रमुख प्रखंडों में मलेरिया के खिलाफ एक बड़ा और असरदार अभियान चला रहा है। फाउंडेशन इस अभियान को पूरी तरह सफल बनाने के लिए सरकारी स्वास्थ्य विभाग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहा है। इस संयुक्त अभियान का मुख्य फोकस पूर्वी सिंहभूम जिले के पोटका, डुमरिया, घाटशिला, मुसाबनी, गोलमुरी-सह-जुगसलाई और बहरागोड़ा जैसे प्रखंडों पर है। इन क्षेत्रों में मलेरिया के मामलों पर काबू पाने, बीमारों की समय पर पहचान करने और उन्हें तुरंत इलाज मुहैया कराने के लिए जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर प्रयास किए जा रहे हैं।
सरकारी तंत्र और फाउंडेशन मिलकर चलाया अभियान
मलेरिया जैसी बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए केवल जागरूकता ही काफी नहीं है, बल्कि एक मजबूत प्रशासनिक और चिकित्सीय व्यवस्था का होना भी बेहद जरूरी है। टाटा स्टील फाउंडेशन की 'मानसी' टीम ने इसी व्यवस्था को मजबूत करने का काम किया है। फाउंडेशन के ब्लॉक कॉर्डिनेटर लगातार सरकारी अधिकारियों के संपर्क में हैं। प्रखंड स्तर पर बीडीओ की देखरेख में आयोजित होने वाली 'ब्लॉक स्तरीय टास्क फोर्स' की बैठकों में मानसी की टीम अनिवार्य रूप से हिस्सा लेती है। इसके साथ ही, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारियों के नेतृत्व में होने वाली स्वास्थ्य विभाग की मासिक और साप्ताहिक समीक्षा बैठकों में भी टीम सक्रिय भूमिका निभाती है। इन बैठकों के जरिए यह तय किया जाता है कि किस गांव में कब और कैसे मलेरिया जांच शिविर लगाए जाएंगे। वहीं, जिला स्तर पर सिविल सर्जन और जिला वेक्टर जनित रोग पदाधिकारी के साथ मिलकर योजनाओं को इस तरह तैयार किया जाता है कि स्वास्थ्य सेवाएं बिना किसी रुकावट के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकें।
दुर्गम गांवों में घर-घर जाकर चलाया जागरूकता अभियान
पूर्वी सिंहभूम जिले के कई गांव ऐसे हैं जो जंगलों, पहाड़ों और बेहद दुर्गम इलाकों में बसे हुए हैं। इन जगहों पर रहने वाले लोगों के लिए मुख्य सड़कों या अस्पतालों तक पहुंचना आज भी एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में 'मानसी' कार्यक्रम के मैदानी कार्यकर्ता इन सुदूर क्षेत्रों में खुद पहुंच रहे हैं। ताकि कोई भी परिवार जांच और इलाज से वंचित न रह जाए। इसके लिए मोहल्ला स्तर और घर-घर जाकर व्यापक सामुदायिक संपर्क अभियान चलाया जा रहा है। टीम के सदस्य ग्रामीणों को समझाते हैं कि मलेरिया का बुखार कितना जानलेवा हो सकता है और समय पर जांच कराना क्यों जरूरी है। वे लोगों को अपने-अपने क्षेत्र में लगने वाले मलेरिया जांच शिविरों में आने के लिए प्रेरित करते हैं। इस व्यक्तिगत संपर्क और लगातार दी जा रही समझाइश का ही नतीजा है कि अब ग्रामीण इन शिविरों में भारी संख्या में खुद आगे आकर अपनी जांच करवा रहे हैं।
64 मलेरिया जांच शिविरों का हो चुका है सफल आयोजन
टाटा स्टील फाउंडेशन और स्वास्थ्य विभाग की यह जुगलबंदी कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर बड़े परिणाम दे रही है। इस अभियान के तहत अब तक जिले के विभिन्न प्रभावित इलाकों में कुल 64 विशेष मलेरिया जांच शिविरों का सफल आयोजन किया जा चुका है। इन शिविरों को सुचारू रूप से चलाने में ग्राउंड लेवल पर काम करने वाली 72 स्थानीय सहियाओं (स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं) ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। इन शिविरों के आंकड़ों पर नजर डालें तो अब तक कुल 4,665 ग्रामीणों की मलेरिया से संबंधित खून की जांच की जा चुकी है। इस व्यापक टेस्टिंग के दौरान 239 लोग ऐसे मिले, जो मलेरिया से संक्रमित पाए गए। राहत की बात यह है कि जैसे ही इन मरीजों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई, बिना एक पल गंवाए स्वास्थ्य विभाग की मदद से उनका उचित और मुफ्त इलाज शुरू कर दिया गया। समय पर बीमारी का पता चल जाने से इन सभी 239 लोगों की जान को खतरे से बाहर निकाल लिया गया है।
'मानसी' की टीम हर घर के माता-पिता से कर रही है संवाद
मलेरिया का सबसे घातक असर छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर होता है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में मलेरिया के कारण बहुत जल्दी खून की कमी (एनीमिया) हो जाती है, जो कभी-कभी जानलेवा भी साबित होती है। इस बात की गंभीरता को समझते हुए 'मानसी' की टीम हर घर के माता-पिता से व्यक्तिगत संवाद कर रही है। वे माताओं को विशेष रूप से परामर्श दे रहे हैं कि बच्चों को जरा सा भी बुखार आने पर वे घरेलू नुस्खों के भरोसे न रहें और तुरंत पास के कैंप में जाकर जांच कराएं। इसके साथ ही, ग्रामीण समाज के ताने-बाने को देखते हुए पुरुषों की भागीदारी पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। गांवों में अलग से चौपाल और बैठकें आयोजित की जा रही हैं, जिनमें परिवार के पुरुष सदस्यों को यह समझाया जा रहा है कि मलेरिया से बचाव के लिए वे अपने घरों और आसपास के माहौल को कैसे साफ रखें। जब परिवार के पुरुष सदस्य जागरूक होकर कैंपों के आयोजन में मदद करते हैं, तो पूरा गांव संगठित रूप से इस अभियान का हिस्सा बन जाता है।
गरीब परिवारों के बीच 100 विशेष मच्छरदानियों का मुफ्त वितरण किया
किसी भी स्वास्थ्य शिविर की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वहां दवाइयां और जांच के उपकरण सही समय पर उपलब्ध हों। मानसी की टीम शिविरों के दौरान 'मलेरिया रैपिड डायग्नोस्टिक किट' की उपलब्धता पर पैनी नजर रखती है। इस किट के जरिए महज कुछ ही मिनटों में यह पता चल जाता है कि मरीज को मलेरिया है या नहीं। यदि किसी कैंप में किट खत्म होने वाली होती है, तो टीम तुरंत सरकारी स्टोर और स्वास्थ्य विभाग से संपर्क कर नए किटों की सप्लाई सुनिश्चित कराती है, ताकि जांच का काम न रुके। इलाज के साथ-साथ बीमारी को रोकने के लिए बचाव के साधन भी उतने ही जरूरी हैं। मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों से सुरक्षा के लिए टाटा स्टील फाउंडेशन की 'ट्राइबल आइडेंटिटी टीम' ने सबसे ज्यादा प्रभावित और गरीब परिवारों के बीच 100 विशेष मच्छरदानियों का मुफ्त वितरण किया है। इसके अलावा, फाउंडेशन की 'पब्लिक हेल्थ टीम' जल्द ही 500 और मच्छरदानियां बांटने की तैयारी पूरी कर चुकी है। संस्था का कहना है कि आने वाले समय में जैसे-जैसे जरूरत बढ़ेगी, और भी मच्छरदानियां ग्रामीणों को दी जाएंगी।
स्वास्थ्य कर्मियों के लिए विशेष ट्रेनिंग प्रदान किया
इस अभियान को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने के लिए यह बेहद जरूरी है कि जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को बीमारी के नए लक्षणों और आधुनिक तकनीकों की पूरी जानकारी हो। इसी उद्देश्य के साथ, इसी महीने की 8 जुलाई 2026 को बहरागोड़ा प्रखंड में स्वास्थ्य विभाग और टाटा स्टील फाउंडेशन ने मिलकर आधे दिन के एक विशेष ट्रेनिंग कार्यक्रम का आयोजन किया। इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में बहरागोड़ा प्रखंड के सरकारी स्वास्थ्य कर्मियों के साथ-साथ मानसी ब्लॉक टीम के सभी सदस्यों ने भाग लिया। इस दौरान विशेषज्ञों ने उन्हें बताया कि मलेरिया के फैलाव को रोकने के लिए तुरंत क्या कदम उठाने चाहिए और मरीजों की काउंसलिंग कैसे करनी चाहिए। टाटा स्टील फाउंडेशन ने स्पष्ट किया है कि वे भविष्य में भी स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय समुदायों के साथ अपनी इस मजबूत हिस्सेदारी को जारी रखेंगे। उनका संकल्प है कि पूर्वी सिंहभूम के हर संवेदनशील और पिछड़े इलाके को पूरी तरह मलेरिया मुक्त बनाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ी स्वस्थ और सुरक्षित रह सके।
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