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खेती पर मंडराता संकट, किसानों के लिए सरकार की आपात योजना और बचाव की रणनीति

Jharkhand News: दुनिया भर में मौसम को प्रभावित करने वाली जलवायु घटना अल नीनो (El Niño) एक बार फिर भारत की कृषि व्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन गई है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अल नीनो का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ रहा है और इसके कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ सकता है। सामान्यतः भारत की कृषि व्यवस्था मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहती है, लेकिन अल नीनो के सक्रिय होने पर वर्षा में कमी देखने को मिलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस वर्ष अगस्त और सितंबर के महीनों में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है। इसका सीधा असर खेती-किसानी पर पड़ेगा। भारत में अधिकांश किसान खरीफ फसलों की बुआई मानसून के भरोसे करते हैं। यदि समय पर पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो धान, मक्का, दलहन और तिलहन जैसी फसलें प्रभावित हो सकती हैं। अल नीनो का प्रभाव केवल वर्षा की मात्रा पर ही नहीं पड़ता, बल्कि वर्षा के वितरण को भी असंतुलित कर देता है। कहीं अत्यधिक बारिश होती है तो कहीं सूखे जैसी स्थिति बन जाती है। यही कारण है कि कृषि वैज्ञानिक और नीति निर्माता इस स्थिति को गंभीरता से ले रहे हैं।

कृषि मंत्रालय अलर्ट मोड में, राज्यों को दिए गए निर्देश

खेती पर संभावित संकट को देखते हुए केंद्र सरकार और कृषि मंत्रालय पूरी तरह सतर्क हो गए हैं। मंत्रालय ने सभी राज्यों को स्थिति पर नजर रखने और आवश्यक तैयारी करने के निर्देश जारी किए हैं। कृषि विशेषज्ञों, मौसम वैज्ञानिकों और राज्य सरकारों के साथ लगातार बैठकें की जा रही हैं।
सरकार ने देशभर के उन जिलों की पहचान की है, जहां अल नीनो का प्रभाव सबसे अधिक पड़ सकता है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार लगभग 197 जिले ऐसे हैं, जहां वर्षा की कमी और सूखे जैसी परिस्थितियां उत्पन्न होने की आशंका है। इन जिलों के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार की गई है। कृषि मंत्रालय ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार वैकल्पिक खेती की रणनीति तैयार रखें। साथ ही किसानों को समय-समय पर मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने और कृषि सलाह देने की व्यवस्था भी मजबूत की जा रही है। सरकार का उद्देश्य है कि संभावित नुकसान को न्यूनतम स्तर पर रखा जा सके और किसानों को किसी भी संकट का सामना अकेले न करना पड़े।

किन राज्यों और फसलों पर सबसे अधिक असर पड़ सकता है

अल नीनो का प्रभाव पूरे देश में समान नहीं होता। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार उत्तर भारत, पश्चिम भारत और मध्य भारत के कई राज्यों में इसका असर अधिक दिखाई दे सकता है। विशेष रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कुछ उत्तरी राज्यों में वर्षा की कमी का खतरा अधिक है। भारत में लगभग 60 प्रतिशत खेती आज भी मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। खरीफ सीजन की सबसे महत्वपूर्ण फसल धान है, जिसकी बुआई और वृद्धि के लिए पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। यदि वर्षा सामान्य से कम होती है तो धान उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा मक्का, सोयाबीन, अरहर, उड़द और मूंग जैसी फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं। कम बारिश केवल उत्पादन घटाने का कारण नहीं बनती, बल्कि बीज अंकुरण, पौधों की वृद्धि और मिट्टी की नमी पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। इससे किसानों की लागत बढ़ जाती है और उत्पादन कम होने से आय पर भी असर पड़ता है। यदि स्थिति अधिक गंभीर हुई तो खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट आने की आशंका भी जताई जा रही है।

किसानों को राहत देने के लिए तैयार की गई आपात योजना

संभावित संकट से निपटने के लिए कृषि मंत्रालय ने व्यापक आपात योजना (Contingency Plan) तैयार की है। इसके तहत प्रभावित क्षेत्रों में वैकल्पिक फसलों के बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है। जहां धान की खेती मुश्किल होगी, वहां कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को बढ़ावा दिया जाएगा। किसानों तक राहत पहुंचाने के लिए “खेत बचाओ अभियान” जैसी पहल भी शुरू की गई है। इसके तहत कृषि विभाग किसानों को समय पर सलाह, तकनीकी सहायता और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराएगा। जिन क्षेत्रों में बारिश कम होगी, वहां सिंचाई के वैकल्पिक साधनों को सक्रिय करने की योजना है। मंत्रालय ने बीज भंडारण, उर्वरकों की उपलब्धता और कृषि उपकरणों की व्यवस्था को भी मजबूत करने का निर्णय लिया है। साथ ही राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से गांव-गांव जाकर किसानों को जागरूक करें। जरूरत पड़ने पर फसल बीमा और राहत पैकेज जैसी योजनाओं का भी उपयोग किया जाएगा।

चुनौतियों से निपटने के लिए दीर्घकालिक तैयारी जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो जैसी जलवायु घटनाएं भविष्य में और अधिक बार देखने को मिल सकती हैं। इसलिए केवल तात्कालिक उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। कृषि क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने के लिए दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई तकनीक, वर्षा जल संचयन और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना समय की मांग है। किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ना और मौसम आधारित खेती को प्रोत्साहित करना भी आवश्यक है। इसके अलावा कृषि अनुसंधान संस्थानों को ऐसी फसल किस्में विकसित करनी होंगी जो कम पानी में भी बेहतर उत्पादन दे सकें।
सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और किसान यदि मिलकर काम करें तो अल नीनो जैसी चुनौतियों का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है। वर्तमान स्थिति चेतावनी जरूर है, लेकिन समय रहते की गई तैयारी किसानों को बड़े नुकसान से बचा सकती है। भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि जलवायु संबंधी जोखिमों को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ा जाए।


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