सीतारामडेरा में केंद्रीय सरहूल पूजा समिति की बैठक, समाज को जागरूक करने का लिया निर्णय


Sarhul Puja Committee: जमशेदपुर के सीतारामडेरा स्थित सरना भवन में रविवार को केंद्रीय सरहूल पूजा समिति की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता समिति के अध्यक्ष शालू लकड़ा ने की। इस दौरान आदिवासी समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और राजनीतिक स्थिति पर गंभीर चर्चा हुई। बैठक में उपस्थित सदस्यों ने एक स्वर में आगामी जनगणना के दौरान धर्म के कॉलम में “सरना” और जाति के कॉलम में “अनुसूचित जनजाति (अजजा)” लिखने का संकल्प लिया। बैठक में वक्ताओं ने कहा कि जनगणना केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह किसी भी समाज की पहचान, अस्तित्व और अधिकारों से जुड़ा विषय है। यदि आदिवासी समाज अपनी सही धार्मिक और सामाजिक पहचान दर्ज नहीं कराएगा, तो आने वाले समय में उसकी परंपराएं और अधिकार दोनों प्रभावित हो सकते हैं। समिति के सदस्यों ने कहा कि गांव-गांव और क्षेत्रीय समितियों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जाएगा ताकि हर व्यक्ति जनगणना के महत्व को समझ सके और सही जानकारी दर्ज कराए।

सरना धर्म कोड की मांग क्यों है महत्वपूर्ण

बैठक में वक्ताओं ने विशेष रूप से सरना धर्म कोड की मांग को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति पूजक है और उसकी अपनी अलग धार्मिक परंपरा, संस्कृति और जीवन पद्धति है। इसके बावजूद आज तक जनगणना में अलग “सरना धर्म कोड” नहीं दिया गया है।
वर्तमान में आदिवासी समाज के कई लोगों को मजबूरी में अन्य धर्मों की श्रेणी में दर्ज किया जाता है। इससे वास्तविक आंकड़े सामने नहीं आ पाते और आदिवासी धर्म की अलग पहचान कमजोर होती जाती है। समिति के सदस्यों का मानना है कि यदि सरना धर्म कोड को मान्यता मिलती है, तो आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट होगी। इससे सरकार के पास सही आंकड़े उपलब्ध होंगे और आदिवासी संस्कृति एवं परंपराओं के संरक्षण के लिए अलग नीतियां बनाने में मदद मिलेगी। वक्ताओं ने कहा कि वर्षों से सरना धर्म कोड की मांग उठती रही है, लेकिन अब समाज को और अधिक संगठित होकर अपनी आवाज बुलंद करनी होगी।


धर्म कोड नहीं मिलने से आदिवासी समाज को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है

बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि अलग धर्म कोड नहीं होने के कारण आदिवासी समाज कई तरह की परिस्थितियों का सामना कर रहा है। सबसे बड़ी समस्या पहचान की है। जब जनगणना में आदिवासियों की धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं होती, तो सरकार और समाज दोनों के सामने उनकी वास्तविक संख्या सामने नहीं आ पाती। इससे नीति निर्माण में भी आदिवासी समाज की धार्मिक जरूरतों को पर्याप्त महत्व नहीं मिल पाता। इसके अलावा धार्मिक पहचान के अभाव में कई बार आदिवासी त्योहारों, पूजा-पद्धतियों और सांस्कृतिक स्थलों को उचित संरक्षण नहीं मिल पाता। सरना स्थल, जाहेरथान और अन्य पारंपरिक पूजा स्थलों के संरक्षण की मांग लंबे समय से उठती रही है। शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में भी इसका असर देखने को मिलता है। नई पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी परंपराओं और मूल संस्कृति से दूर होती जा रही है। कई लोग अपनी पहचान छुपाने या बदलने को मजबूर हो जाते हैं। वक्ताओं ने कहा कि यदि धर्म कोड नहीं मिलेगा, तो आने वाले समय में आदिवासी संस्कृति के अस्तित्व पर खतरा और बढ़ सकता है। इसलिए यह केवल धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व और अस्मिता का सवाल है।

आदिवासी समाज को दिग्भ्रमित करने वालों से सावधान रहने की अपील

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में कुछ लोग आदिवासी समाज को दिग्भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों और कार्यक्रमों के माध्यम से समाज को बांटने की कोशिश की जा रही है। वक्ताओं ने कहा कि दिल्ली में आयोजित कुछ सांस्कृतिक समागम केवल दिखावा हैं और इनके माध्यम से आदिवासी एकता को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। समाज को ऐसे प्रयासों से सतर्क रहने की जरूरत है। बैठक में यह भी कहा गया कि जो लोग आदिवासी समाज के हितों के खिलाफ काम करेंगे या समाज को विभाजित करने का प्रयास करेंगे, उन्हें सामाजिक कार्यक्रमों में आमंत्रित नहीं किया जाएगा। समिति के सदस्यों ने कहा कि आदिवासी समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी एकता, परंपरा और सामुदायिक व्यवस्था है। यदि समाज संगठित रहेगा, तो कोई भी ताकत उसकी पहचान को कमजोर नहीं कर सकती।


वर्तमान समय में आदिवासी समाज की स्थिति

बैठक में आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने कहा कि आधुनिकता और बदलते समय के साथ आदिवासी समाज कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक ओर शिक्षा, रोजगार और विकास के नए अवसर सामने आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक भाषा, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था कमजोर होती जा रही है। गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ने के कारण युवा अपनी जड़ों से दूर हो रहे हैं। भूमि, जल और जंगल से जुड़े अधिकारों को लेकर भी आदिवासी समाज लगातार संघर्ष कर रहा है। कई क्षेत्रों में विस्थापन, बेरोजगारी और आर्थिक समस्याएं बढ़ी हैं। हालांकि इसके बावजूद आदिवासी समाज अपनी संस्कृति और परंपराओं को बचाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। सरहूल, करमा, सोहराय और अन्य पारंपरिक पर्व आज भी समाज को जोड़ने का काम कर रहे हैं। समिति के सदस्यों ने कहा कि यदि समाज शिक्षा के साथ अपनी संस्कृति को भी मजबूत करेगा, तभी आने वाली पीढ़ियां अपनी असली पहचान को बचा पाएंगी।

समाज को जागरूक करने का लिया गया संकल्प

बैठक के अंत में उपस्थित सभी सदस्यों ने समाज को जागरूक करने का सामूहिक संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि जनगणना के दौरान हर आदिवासी परिवार तक पहुंचकर लोगों को सही जानकारी दी जाएगी। समिति ने स्पष्ट किया कि धर्म के कॉलम में “सरना” और जाति में “अनुसूचित जनजाति” दर्ज कराना समाज की एकता और अस्तित्व के लिए जरूरी है। इसके लिए गांवों, मोहल्लों और क्षेत्रीय समितियों के स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। बैठक में शालू लकड़ा, उपेंद्र बानरा, राकेश उरांव, नंदलाल पातर, डिबर पूर्ति, सोमेश्वर मुर्मू, संतोष लकड़ा, डेमका सोय, शिवचरण बारी, सूरजा बास्के, दुर्गामणि गौयपाई, प्रेम आनंद सामद, डोमेन पूर्ति, प्रकाश कोया, लखींद्र लकड़ा, सुखराम लकड़ा, राजन कुजुर और सोमा कोया समेत कई लोग उपस्थित थे।