44 वर्षों से जंगल बचाने की अनूठी पहल, अब दूसरे गांवों को भी किया जाएगा प्रेरित

Jamshedpur News: जमशेदपुर प्रखंड अंतर्गत डालापानी गांव एक बार फिर अपने पर्यावरण संरक्षण अभियान को लेकर चर्चा में है। गांव के ग्रामीण वर्षों से जिस समर्पण के साथ जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते आ रहे हैं, वह आज पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन चुका है। सोमवार को डालापानी गांव में वन अधिकार समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बड़े जनजागरण कार्यक्रम के आयोजन का निर्णय लिया गया। बैठक की अध्यक्षता पर्यावरणविद् किंकर महतो ने की। बैठक में ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वन संरक्षण से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए व्यापक स्तर पर तैयारी शुरू करने का निर्णय लिया गया। ग्रामीणों ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज के हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। यदि आज जंगल और प्राकृतिक संसाधनों को नहीं बचाया गया तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।

विश्व पर्यावरण दिवस पर होगा जनसभा और जागरूकता कार्यक्रम

बैठक में निर्णय लिया गया कि पांच जून को डालापानी फुटबॉल मैदान में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित होगा। इस दौरान पर्यावरण संरक्षण और वन बचाने को लेकर जनसभा आयोजित की जाएगी। कार्यक्रम में विभिन्न ग्राम सभाओं, वन सुरक्षा समितियों, वन अधिकार समितियों, सामाजिक संगठनों तथा जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए सक्रिय कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया जाएगा। ग्रामीणों का मानना है कि जब तक समाज के सभी लोग मिलकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कार्य नहीं करेंगे, तब तक जंगलों को बचाना संभव नहीं है। इसलिए इस कार्यक्रम के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया जाएगा। कार्यक्रम में जंगलों के महत्व, जल संरक्षण, जैव विविधता तथा ग्रामीण जीवन में पर्यावरण की भूमिका पर चर्चा की जाएगी।


550 एकड़ जंगल की 44 वर्षों से कर रहे हैं रक्षा

बैठक में सामाजिक कार्यकर्ता एवं ग्रीन मैन के नाम से प्रसिद्ध मदन मोहन सोरेन ने कहा कि डालापानी गांव के ग्रामीण पिछले 44 वर्षों से लगभग 550 एकड़ में फैले जंगल का संरक्षण कर रहे हैं। यह कार्य बिना किसी बड़े सरकारी सहयोग के केवल ग्रामीणों की सामूहिक इच्छाशक्ति और जागरूकता के कारण संभव हो पाया है। उन्होंने बताया कि पहले इस क्षेत्र के जंगल तेजी से कट रहे थे। पेड़ों की अवैध कटाई और जंगलों के नष्ट होने से पर्यावरण संतुलन बिगड़ने लगा था। इसके बाद गांव के लोगों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया कि वे अपने जंगल को बचाएंगे। ग्रामीणों ने जंगल की सुरक्षा के लिए नियम बनाए, पहरा देना शुरू किया और अवैध कटाई पर रोक लगाई। धीरे-धीरे इसका सकारात्मक परिणाम सामने आने लगा और जंगल फिर से हरा-भरा होने लगा। आज डालापानी का जंगल क्षेत्र पर्यावरण संरक्षण का एक सफल मॉडल बन चुका है। यहां कई प्रकार के पेड़-पौधे, जंगली जीव और पक्षियों की संख्या बढ़ी है। जंगल के कारण क्षेत्र में जलस्रोत भी सुरक्षित हैं और ग्रामीणों को प्राकृतिक संसाधनों का लाभ मिल रहा है।

दूसरे गांव भी ले रहे हैं प्रेरणा

मदन मोहन सोरेन ने कहा कि डालापानी गांव की पहल से आसपास के दर्जनों गांव प्रेरित हुए हैं। अब अन्य गांवों के लोग भी अपने-अपने क्षेत्रों में जंगल बचाने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम कर रहे हैं। ग्रामीणों का यह प्रयास यह साबित करता है कि यदि समाज एकजुट होकर कार्य करे तो पर्यावरण संरक्षण का बड़ा अभियान खड़ा किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आज जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और पर्यावरण प्रदूषण जैसी समस्याएं पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़ी हैं। ऐसे समय में गांव स्तर पर चल रहे वन संरक्षण अभियान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि प्रत्येक गांव अपने जंगलों और जलस्रोतों की रक्षा करने का संकल्प ले, तो पर्यावरण संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।


जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी और ग्रामीण समाज का जीवन जंगलों से जुड़ा हुआ है। जंगल केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं बल्कि जीवन का आधार हैं। जंगलों से लोगों को जल, ईंधन, औषधि, फल-फूल और शुद्ध वातावरण मिलता है। जंगलों के नष्ट होने से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है और इसका असर खेती, जलस्रोत तथा मानव जीवन पर पड़ता है। ग्रामीणों ने लोगों से अपील की कि वे पेड़ लगाने के साथ-साथ पुराने जंगलों को बचाने की दिशा में भी सक्रिय भूमिका निभाएं। केवल पौधारोपण करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि लगाए गए पौधों की देखभाल और प्राकृतिक जंगलों की सुरक्षा भी जरूरी है। बैठक में यह भी कहा गया कि आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन का रूप देना होगा। इसके लिए गांव-गांव में जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है ताकि लोग जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को समझ सकें।


ग्रामीणों ने कार्यक्रम को सफल बनाने का लिया संकल्प

बैठक में उपस्थित ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पांच जून को होने वाले कार्यक्रम को सफल बनाने का संकल्प लिया। सभी ने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस केवल औपचारिकता नहीं बल्कि प्रकृति संरक्षण का संदेश देने का अवसर है। कार्यक्रम के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को वन संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। बैठक में किंकर महतो, जगरनाथ सोरेन, सुनील रजक, मोहन हेम्ब्रम, सुखराम हांसदा, चेकर मार्डी समेत कई ग्रामीण और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे। सभी ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर सामूहिक रूप से कार्य करने पर जोर दिया।