Majhi Pargana Mahal : हिंदूवादी संगठन जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा 24 मई को नई दिल्ली के लाल किला मैदान में आयोजित होने वाले 'जनजाति संस्कृति समागम' के खिलाफ आदिवासी समाज ने पूरी तरह से मोर्चा खोल दिया है. इस आयोजन को आदिवासी और जनजाति विरोधी बताते हुए 'माझी परगना महाल धाड़ दिशोम' का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार को पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त (डीसी) से मिला. प्रतिनिधिमंडल ने देश परगना बैजू मुर्मू के नेतृत्व में महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम एक मांग पत्र सह विरोध ज्ञापन सौंपा. सौंपे गए ज्ञापन में नई दिल्ली में आयोजित होने वाले समागम का पूर्ण बहिष्कार करने की घोषणा की गई है. साथ ही आदिवासियों के अस्तित्व और उनकी विशिष्ट पहचान की रक्षा के लिए देश में अविलंब सरना धर्म कोड लागू करने की जोरदार वकालत की गई है.



माझी परगना महाल की अगुवाई में डीसी से मिला प्रतिनिधिमंडल
शुक्रवार को जमशेदपुर के समाहर्ता कार्यालय पहुंचे पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के प्रतिनिधियों ने देश परगना बैजू मुर्मू की अगुवाई में अपनी आवाज बुलंद की. प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त के माध्यम से देश की प्रथम नागरिक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को यह संदेश भेजा कि दिल्ली का आयोजन आम आदिवासियों की भावना के खिलाफ है. इस मौके पर पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था से जुड़े कई प्रबुद्ध पदाधिकारी उपस्थित थे, जिनमें मुख्य रूप से देश पारगना बाबा बैजू मुर्मू, देश पारानिक बाबा दुर्गा चरण मुर्मू, शास्त्री हेंब्रम, रमेश मुर्मू, जगदीश बास्के, सुशांत हेंब्रम, कारु मुर्मू, मर्शाल मुर्मू और शत्रुधन मुर्मू सहित समाज के सैकड़ों प्रतिनिधि शामिल थे.

आदिवासियों की मूल पहचान मिटाने की सोची-समझी रणनीति
ज्ञापन सौंपने के बाद धाड़ दिशोम माझी परगना महाल के देश परगना बैजू मुर्मू ने कार्यक्रम के उद्देश्यों पर कड़ा प्रहार किया. उन्होंने कहा कि जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित किया जा रहा यह कार्यक्रम वास्तव में आदिवासियों को जबरन हिंदू धर्म में शामिल करने की एक सोची-समझी रणनीति और गहरी साजिश है. "सरना और सनातन एक है" का कृत्रिम राग अलाप कर आदिवासियों की मूल व प्राचीन धार्मिक व्यवस्था को जड़ से खत्म करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है जिसे आदिवासी समाज कभी बर्दाश्त नहीं करेगा.

आदिकाल से प्रकृति पूजक रहा है संपूर्ण आदिवासी समाज
बैजू मुर्मू ने समाज की विशिष्टता को रेखांकित करते हुए कहा कि आदिवासी समाज अनादि काल से प्रकृति का उपासक रहा है. हमारी अपनी रूढ़िवादी प्रथा, पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था (जैसे माझी-परगना व्यवस्था) और विशिष्ट पूजा पद्धति है, जो दुनिया के अन्य सभी धार्मिक समुदायों से बिल्कुल भिन्न है. आदिवासी न कभी हिंदू थे, न हैं और न कभी होंगे. उन्होंने आगाह किया कि आज कुछ बाहरी तत्वों (दिकुओं) की 'गिद्ध दृष्टि' आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन, प्रचुर खनिज संपदा और उनके संवैधानिक आरक्षण पर टिकी हुई है, जिसे हड़पने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण का सहारा लिया जा रहा है.

फूट डालो और राज करो की नीति के खिलाफ चलेगा महाअभियान
प्रतिनिधिमंडल ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि 'फूट डालो और राज करो' की दमनकारी नीति के तहत आदिवासी समाज के ही कुछ भोले-भाले लोगों को मोहरा बनाया जा रहा है. समाज को आंतरिक रूप से तोड़ने और दिग्भ्रमित करने के लिए ऐसे प्रायोजित आयोजन किए जा रहे हैं. देश परगना ने स्पष्ट चेतावनी दी कि आदिवासी समाज अब जाग चुका है और ऐसे भ्रम फैलाने वाले तत्वों व समाज विरोधी प्रतिनिधियों को चिन्हित किया जा रहा है. आने वाले समय में समाज को तोड़ने वालों के खिलाफ पूरे झारखंड और देश स्तर पर बड़ा सामाजिक जन-अभियान चलाया जाएगा.

50 लाख की आबादी के बावजूद सरना कोड नहीं मिलना केंद्र की बेरुखी
धाड़ दिशोम माझी परगना महाल के देश पारानिक दुर्गाचरण मुर्मू ने केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा सवाल उठाया. उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि देश में महज 40 लाख की आबादी वाले जैन समुदाय को अलग धार्मिक मान्यता और कोड प्राप्त है. इसके विपरीत, वर्ष 2011 की जनगणना में देश के 50 लाख से अधिक आदिवासियों ने अपनी धार्मिक पहचान के कॉलम में 'सरना धर्म' दर्ज कराया था. इसके बावजूद केंद्र सरकार द्वारा अब तक सरना धर्म कोड को मंजूरी नहीं देना आदिवासियों के प्रति उनकी घोर बेरुखी और सौतेले व्यवहार को स्पष्ट रूप से उजागर करता है.

करोड़ों की आबादी वाली जनजाति धार्मिक पहचान के लिए भटकने को मजबूर
दुर्गाचरण मुर्मू ने कहा कि अगर समग्रता में बात की जाए तो देश में आदिवासियों की कुल आबादी करोड़ों में है, लेकिन एक आधिकारिक धार्मिक पहचान पत्र (धर्म कोड) नहीं मिलने के कारण देश का यह मूलनिवासी समाज अपनी पहचान के लिए इधर-उधर भटकने को मजबूर है. जनगणना के फॉर्म में अलग कॉलम न होने से आदिवासियों की गिनती अन्य धर्मों में हो जाती है, जो कि हमारी जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) को प्रभावित कर रहा है. उन्होंने मांग की कि केंद्र सरकार बिना किसी राजनीतिक नफे-नुकसान के आदिवासियों को अविलंब सरना धर्म कोड देना सुनिश्चित करे.

आदिवासी समाज की मुख्य मांगें:
  • सरना धर्म कोड की मान्यता: आदिवासियों की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक ताने-बाने और अस्तित्व को अक्षुण्ण रखने के लिए जनगणना में अविलंब पृथक 'सरना धर्म कोड' को वैधानिक मान्यता दी जाए.
  • संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा: आदिवासियों के पैतृक जल, जंगल, जमीन और खनिज संसाधनों के साथ-साथ उनके वर्तमान शैक्षणिक और राजनीतिक आरक्षण से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ या कटौती न की जाए.
  • स्वशासन व्यवस्था का संरक्षण: आदिवासियों की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था (माझी-परगना महाल), उनकी समृद्ध मातृभाषाओं और प्राचीन संस्कृति के संवर्धन के लिए सरकार ठोस नीतिगत कार्रवाई सुनिश्चित करे.