Jamshedpur news : झारखंड का पूर्वी सिंहभूम जिला अपनी प्राकृतिक छटा और समृद्ध जनजातीय विरासत के लिए जाना जाता है। इसी जिले का चाकुलिया प्रखंड एक ऐसी अनोखी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का केंद्र है, जो इसे पूरे राज्य में विशिष्ट पहचान दिलाती है। यहाँ स्थित कान्हाईश्वर पहाड़ पर होने वाली सालाना पूजा को झारखंड की सबसे बड़ी पहाड़ पूजा का गौरव प्राप्त है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि आस्था, परंपरा और प्रकृति संरक्षण का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज है, जो आधुनिक दौर में भी अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है। हर साल यहाँ हजारों-लाखों श्रद्धालु अपने जीवन की खुशहाली, खेतों की हरियाली और समय पर अच्छी मानसूनी बारिश की मन्नत लेकर आते हैं। यहां प्रकृति को ही ईश्वर का रूप मानकर उसकी आराधना की जाती है, जो यह संदेश देती है कि मानव जीवन का अस्तित्व जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा में ही निहित है।




तीन राज्यों की साझी आस्था का महासंगम, जहां सरहदें हो जाती हैं बेअसर

कान्हाईश्वर पहाड़ पूजा की सबसे बड़ी खासियत इसकी भौगोलिक स्थिति और इसका अंतरराज्यीय महत्व है। चाकुलिया प्रखंड के जयनगर गांव में स्थित इस विशाल पहाड़ का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा झारखंड की सीमा में आता है, जबकि शेष 25 प्रतिशत हिस्सा पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल की सीमाओं को छूता है। यही वजह है कि इस लोक उत्सव में प्रांतीय सीमाएं और दूरियां बेमानी हो जाती हैं। हर साल आषाढ़ महीने के तीसरे शनिवार को आयोजित होने वाले इस महापर्व में न केवल झारखंड के कोने-कोने से लोग आते हैं, बल्कि पश्चिम बंगाल और ओडिशा से भी भारी तादाद में श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं। इस तरह यह आयोजन तीन राज्यों की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का एक विशाल मंच बन जाता है, जहाँ विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के लोग एक ही रंग में रंगे नजर आते हैं।

जब मानसूनी बारिश के लिए जागती है जन-आस्था

इस पारंपरिक पूजा के पीछे सदियों पुराना इतिहास और अटूट जन-विश्वास छिपा हुआ है। स्थानीय ग्रामीणों और जानकारों के मुताबिक, यह मान्यता पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है कि कान्हाईश्वर पहाड़ के देवता की सच्चे मन से आराधना करने पर कभी सुखाड़ की स्थिति पैदा नहीं होती। इलाके के किसान और ग्रामीण पूरी तरह से खेती-किसानी पर निर्भर हैं, और खेती के लिए समय पर बारिश होना अनिवार्य है। ऐसी मान्यता है कि जब भी आषाढ़ महीने में यहाँ पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ बलि देकर पहाड़ देवता को प्रसन्न किया जाता है, तो झमाझम बारिश होती है। इससे न केवल खेतों को नया जीवन मिलता है, बल्कि पूरे क्षेत्र में समृद्धि, शांति और खुशहाली का वास होता है। इस अटूट विश्वास के कारण ही आज के वैज्ञानिक युग में भी इस पूजा की प्रासंगिकता रत्ती भर भी कम नहीं हुई है।

लोक संस्कृति का जीवंत उत्सव, ढोल-नगाड़ों की थाप पर थिरकते हैं कदम

पूजा के पावन दिन पूरा चाकुलिया प्रखंड और आसपास का इलाका एक अलौकिक और भक्तिमय माहौल में सराबोर हो जाता है। सुबह से ही पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालुओं का जत्था पहाड़ की ओर बढ़ने लगता है। वातावरण में गूंजती ढोल, मांदर और नगाड़ों की थाप, और उसके साथ गाए जाने वाले पारंपरिक लोक गीत हवाओं में एक अलग ही ऊर्जा भर देते हैं। आदिवासी संस्कृति की अनूठी और मनमोहक झलक इस दौरान साफ देखी जा सकती है। हजारों की संख्या में महिला, पुरुष और बच्चे कतारबद्ध होकर दुर्गम रास्तों को पार करते हुए पहाड़ की चोटी पर पहुँचते हैं और वहाँ स्थित देव-स्थल पर मत्था टेकते हैं। इस दौरान बिखरी लोक कला की छटा हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देती है।

महामेले जीवंत हो उठती है ग्रामीण अर्थव्यवस्था

कान्हाईश्वर पहाड़ की तलहटी में इस अवसर पर एक विशाल और भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि ग्रामीण शिल्प, कला और स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी माना जाता है। मेले में दूर-दराज के क्षेत्रों से आए कारीगर अपने हस्तशिल्प, पारंपरिक औजार, मिट्टी के बर्तन और पकवानों की दुकानें लगाते हैं। यहां आधुनिक चकाचौंध से दूर शुद्ध ग्रामीण संस्कृति की बेहद खूबसूरत और सतरंगी तस्वीर देखने को मिलती है। बच्चों के लिए तरह-तरह के झूले, खिलौनों की दुकानें और पारंपरिक मिठाइयों की खुशबू मेले के आकर्षण को कई गुना बढ़ा देती है। दूर-दराज से आए रिश्तेदारों और पुराने मित्रों के मिलन का भी यह एक बेहतरीन जरिया बनता है।

12 मौजा के ग्रामीणों की दिखती है सामाजिक व सांस्कृतिक एकजुटता

इस महा-आयोजन की सबसे खूबसूरत बात इसकी सामूहिक जिम्मेदारी है। कान्हाईश्वर पहाड़ पूजा किसी एक व्यक्ति या विशेष समिति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के 12 मौजा (गांवों) की सामूहिक सहभागिता का परिणाम है। इनमें मुख्य रूप से: जयनगर, भंडारू, बिहारीपुर, लोहामलिया, दुआरीशोल, जोड़ाम, चालूनिया, दुबराजपुर व बैकुंठपुर समेत अन्य गांवों के ग्रामीण शामिल हैं। इन सभी गांवों के लोग महीनों पहले से मिलकर इस पूजा की रूपरेखा तैयार करते हैं और व्यवस्था संभालते हैं। यह आपसी तालमेल और सहयोग इस बात का प्रमाण है कि सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी समाज को एक सूत्र में पिरोने और आपसी भाईचारे को मजबूत करने का काम कर रही है।

जुटती है आस्था का सैलाब, तब थम जाती हैं सड़कों की रफ्तार

कान्हाईश्वर पहाड़ पूजा के प्रति लोगों की दीवानगी और श्रद्धा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूजा के दिन यहाँ पैर रखने तक की जगह नहीं होती। तीन राज्यों से आने वाले श्रद्धालुओं और वाहनों की भारी तादाद के कारण चाकुलिया की ओर आने वाले मुख्य मार्गों पर गाड़ियों की लंबी कतारें लग जाती हैं। अक्सर स्थिति ऐसी हो जाती है कि मुख्य मार्ग पर करीब 10 किलोमीटर तक लंबा जाम लग जाता है। इस विशाल भीड़ और वाहनों के रेले को नियंत्रित करना स्थानीय प्रशासन और पूजा कमेटी के लिए एक बड़ी परीक्षा होती है। इसके बावजूद, श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं आती और लोग मीलों पैदल चलकर भी भगवान कान्हाईश्वर के दर्शन करने पहाड़ पर पहुंचते हैं।

इस साल 4 जुलाई को 6 पहाड़ों की होगी अनोखी पूजा

इस वर्ष कान्हाईश्वर पहाड़ पूजा आगामी 4 जुलाई को बेहद धूमधाम के साथ आयोजित होने जा रही है। पूजा आयोजन समिति की ओर से इसके सफल संचालन के लिए तैयारियां युद्ध स्तर पर शुरू कर दी गई हैं। आपको बता दें कि चाकुलिया का यह इलाका अपनी बहु-पहाड़ पूजा संस्कृति के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। यहां सिर्फ कान्हाईश्वर ही नहीं, बल्कि कुल छह प्रमुख पहाड़ों की पूजा करने की अनूठी परंपरा है। इनमें कान्हाईश्वर के अलावा जमीरा पहाड़, सातनाला पहाड़, गोटाशिला पहाड़, खोड़ीपहाड़ी पहाड़ और घोटिडूबा पहाड़ शामिल हैं। परंपरा के अनुसार, इन सभी पहाड़ों की श्रृंखला में सबसे पहले 'जमीरा पहाड़' की पूजा अर्चना की जाती है। इन सभी पूजाओं का मुख्य उद्देश्य अच्छी फसल और जल स्रोतों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। स्थानीय लोगों के बीच नियम इतना कड़ा है कि यदि मुख्य पूजा के बाद भी क्षेत्र में समय पर बारिश नहीं होती है, तो ग्रामीण टोटके और अपनी विशेष पद्धति के अनुसार दोबारा पहाड़ों की पूजा का आयोजन करते हैं, ताकि प्रकृति देव की कृपा उनके क्षेत्र पर बनी रहे।