पटमदा और बोड़ाम में पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया रोहिन परब
Jamshedpur News : छोटानागपुर की समृद्ध कुड़मी जनजाति आदिवासी संस्कृति से जुड़ा आदि पुरखानी पर्व ‘रोहिन परब’ गुरुवार को पटमदा एवं बोड़ाम प्रखंड क्षेत्र में पारंपरिक रीति-रिवाजों, धार्मिक आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर किसानों ने खेतों में धान बीज रोपण कर नए कृषि सत्र की शुरुआत की। गांवों में सुबह से ही पूजा-अर्चना, प्रकृति वंदना और पारंपरिक अनुष्ठानों का माहौल देखने को मिला। खेत-खलिहानों में ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी ने पूरे क्षेत्र को सांस्कृतिक रंग में रंग दिया।
रोहिन परब को छोटानागपुर क्षेत्र में कृषि जीवन का शुभारंभ माना जाता है। यह पर्व केवल खेती की शुरुआत भर नहीं, बल्कि प्रकृति, धरती माता और पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का भी अवसर होता है। ग्रामीण इलाकों में लोगों ने पारंपरिक वेशभूषा पहनकर सामूहिक पूजा की और समृद्ध फसल की कामना की।

कृषि सभ्यता और प्रकृति संरक्षण से जुड़ी है रोहिन परंपरा
सामाजिक कार्यकर्ता सुधांशु बानूआर ने जानकारी देते हुए बताया कि रोहिन पर्व सदियों पुरानी कृषि सभ्यता और प्रकृति संरक्षण की परंपरा से जुड़ा हुआ है। छोटानागपुर क्षेत्र के किसान इस दिन खेतों में पहली बार धान बीज डालकर खेती कार्य का शुभारंभ करते हैं। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी ग्रामीण समाज में पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। उन्होंने कहा कि इस पर्व के माध्यम से लोग जल, जंगल, जमीन और प्रकृति महाशक्ति के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं। मान्यता है कि रोहिन परब के दिन प्रकृति की पूजा करने से अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और परिवार में खुशहाली आती है। यही कारण है कि ग्रामीण समाज इस दिन को विशेष महत्व देता है।

तीन मुट्ठी धान बीज डालने की अनोखी परंपरा
रोहिन परब के दौरान किसानों द्वारा खेत में तीन मुट्ठी धान बीज डालने की विशेष परंपरा निभाई जाती है। यह केवल कृषि कार्य की शुरुआत नहीं, बल्कि पूर्वजों और प्रकृति देवता को स्मरण करने का प्रतीक माना जाता है। ग्रामीणों का विश्वास है कि इस विधि से खेती कार्य शुभ और सफल होता है। गांवों में सुबह किसान परिवार के सदस्य सामूहिक रूप से खेतों में पहुंचते हैं। पूजा-अर्चना के बाद पारंपरिक मंत्रों और लोक मान्यताओं के अनुसार धान बीज डाला जाता है। इसके बाद ग्रामीण एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और अच्छी फसल की कामना करते हैं। यह परंपरा सामाजिक एकता और सामूहिक संस्कृति को भी मजबूत करती है।

रोहिन माटी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
रोहिन परब में “रोहिन माटी” लाने की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। शाम के समय किसान खेत से पवित्र मिट्टी घर लेकर आते हैं। ग्रामीण समाज में इस मिट्टी को अत्यंत शुभ और पवित्र माना जाता है। वर्षभर घरों में होने वाले धार्मिक, पारिवारिक और पारंपरिक अनुष्ठानों में इसका उपयोग किया जाता है। Nग्रामीण मान्यता के अनुसार रोहिन माटी घर में सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक होती है। कई परिवार इसे पूजा स्थल में सुरक्षित रखते हैं। यह परंपरा धरती और कृषि संस्कृति के प्रति लोगों की गहरी आस्था को दर्शाती है।

लोकगीत, सामूहिक पूजा और पारंपरिक संस्कृति की झलक
रोहिन परब के अवसर पर पटमदा और बोड़ाम के विभिन्न गांवों में पारंपरिक लोकगीत, नृत्य और सामूहिक पूजा का आयोजन किया गया। महिलाओं और बुजुर्गों ने पारंपरिक गीत गाकर प्रकृति और पूर्वजों का स्मरण किया। बच्चों और युवाओं ने भी इस आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
गांवों में सामूहिक रूप से पूजा करने की परंपरा सामाजिक एकता का संदेश देती है। बुजुर्गों ने नई पीढ़ी को कृषि संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक मूल्यों के बारे में जानकारी दी। इससे युवाओं में अपनी परंपरा और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ रही है।

“रोहिन फल” को माना जाता है स्वास्थ्य का वरदान
समाजसेवी विश्वनाथ महतो ने बताया कि रोहिन परब में “रोहिन फल” खाने की भी विशेष परंपरा है। ग्रामीण समाज में इस फल को औषधीय और एंटीबायोटिक गुणों से भरपूर माना जाता है। मान्यता है कि इसका सेवन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इसे प्रकृति का वरदान मानते हैं। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में भी इस फल का महत्व बताया जाता है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध भले ही सीमित हों, लेकिन लोक मान्यताओं और अनुभवों में इसका विशेष स्थान है। यही कारण है कि रोहिन परब के दौरान लोग इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ ग्रहण करते हैं।

आधुनिकता के दौर में भी जीवित है आदिवासी कृषि संस्कृति
तेजी से बदलती जीवनशैली और आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद छोटानागपुर क्षेत्र में रोहिन परब जैसी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत आज भी जीवित है। ग्रामीण समाज अपनी पुरानी परंपराओं और कृषि संस्कृति को बचाए रखने के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं होते, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सामूहिकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का माध्यम भी हैं। रोहिन परब लोगों को प्रकृति से जोड़ता है और उन्हें यह संदेश देता है कि जीवन और खेती का आधार प्रकृति ही है।

नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ रहा है रोहिन परब
रोहिन परब आज की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का कार्य कर रहा है। गांवों में बुजुर्ग युवाओं को खेती-किसानी, प्रकृति संरक्षण और पारंपरिक जीवन मूल्यों की जानकारी देते हैं। इससे नई पीढ़ी में अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की भावना विकसित हो रही है। यह पर्व यह संदेश देता है that खेती केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि धरती माता, प्रकृति और पूर्वजों के प्रति आस्था और सम्मान का प्रतीक है। छोटानागपुर की आदिवासी कुड़मी जनजाति संस्कृति में रोहिन परब सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और कृषि परंपरा का जीवंत उदाहरण बनकर आज भी लोगों के जीवन में विशेष महत्व रखता है।