Jamshedpur News: करनडीह स्थित दिशोम जाहेर परिसर में विभिन्न आदिवासी संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में एक भव्य सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम पूर्वी सिंहभूम (झारखंड) के प्रतिभाशाली युवा फिल्मकार रविराज मुर्मू को समर्पित था, जिन्हें उनकी संताली लघु फिल्म "आंगेन" (Invisible) के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ प्रथम फिल्म निर्देशक (Best Debut Director Award) से नवाजा गया है। "मिट्टी की खुशबू, पर्दे की रोशनी" विषय पर आधारित इस समारोह में 300 से अधिक गणमान्य लोग, समाज के बुजुर्ग और युवा शामिल हुए।
करनडीह में आदिवासी संगठनों ने किया भव्य नागरिक अभिनंदन
जाहेर थान कमिटी, गुरु गोमके पं. रघुनाथ मुर्मू अकादमी, रास्का, बाहा फाउंडेशन, आदिबासी एसोसिएशन जमशेदपुर और संताल गांवता सिदगोड़ा के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन डॉ. रबिन्द्र नाथ मुर्मू ने किया। समारोह में मुख्य रूप से कुशाल हांसदा, छुटाई सोरेन, गणेश टुडू, शंकर हेम्ब्रोम, मानसिंह माझी, रतन बेसरा, राजकुमार बानरा, बापी मुर्मू, दुखूराम हांसदा, स्वर्णलता मुर्मू, डोमन टुडू और कुशा सोरेन उपस्थित रहे। सभी वक्ताओं ने रविराज की इस ऐतिहासिक सफलता को आदिवासी समाज और संताली भाषा-संस्कृति के लिए एक मील का पत्थर बताया।
गाँव की गलियों से FTII पुणे और राष्ट्रीय मंच तक का सफर
जादूगोड़ा के पास स्थित कुमिरमुड़ी गाँव के रहने वाले रविराज मुर्मू की सफलता की नींव उनकी कड़ी मेहनत और लगन है। उन्होंने जमशेदपुर के करीम सिटी कॉलेज से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की और इसके बाद देश के प्रतिष्ठित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (FTII), पुणे से फिल्म संपादन का कोर्स पूरा किया। उनकी फिल्म 'आंगेन' ने न केवल राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई, बल्कि संताली सिनेमा को एक नया आयाम दिया है।
ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर संपादन का हुनर और 'सावंता स्टूडियोज' की शुरुआत
रविराज मुर्मू केवल निर्देशन तक सीमित नहीं हैं; उन्होंने नेटफ्लिक्स की लोकप्रिय वेब सीरीज 'ट्रायल बाय फायर' और हॉटस्टार की 'ह्यूमन' में संपादक (Editor) के रूप में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। इसके अतिरिक्त, वे 'सावंता स्टूडियोज एलएलपी' के संस्थापक हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य आदिवासी लोककथाओं, वास्तविक जीवन की घटनाओं और संस्कृति पर आधारित कहानियों को पर्दे पर उकेरना है।
शोध कार्य और आगामी महत्वाकांक्षी संताली फिल्में
सिनेमा के साथ-साथ रविराज शोध के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। उन्होंने आदिवासी संस्कृति और पार पारंपरिक लोकनृत्यों (जैसे पाइका नृत्य) के दस्तावेजीकरण पर शोध किया है। वर्तमान में वे एक बहुप्रतीक्षित संताली फीचर फिल्म 'सुंडी: द रॉबिनहुड ऑफ संताल' जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय सिनेमा को नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है।
सम्मान के लिए आभार और जड़ों से जुड़े रहने का संकल्प
समारोह के अंत में जाहेर थान कमिटी व अन्य संगठनों की ओर से रविराज मुर्मू को स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर आभार व्यक्त करते हुए रविराज ने कहा कि यह राष्ट्रीय पुरस्कार केवल उनका नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज, संताली भाषा और उनकी समृद्ध कथा परंपरा का सम्मान है। उन्होंने भविष्य में भी अपनी जड़ों से जुड़कर संताली सिनेमा के विकास के लिए समर्पित रहने का संकल्प जताया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ यह ऐतिहासिक समारोह संपन्न हुआ।
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