संताली साहित्यिक गोष्ठी: मांझी रामदास टुडू 'रास्का' की 172वीं जयंती पर जुटे चार राज्यों के साहित्यकार

BOKARO NEWS : बोकारो जिले के चंदनकियारी स्थित चंदनकियारी महाविद्यालय सभागार में शुक्रवार को महान संताली साहित्यकार मांझी रामदास टुडू 'रास्का' की 172वीं जयंती के अवसर पर एक भव्य संताली साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया. इस विशेष समारोह का आयोजन अखिल भारतीय संताली लेखक संघ (झारखंड शाखा), सोनोत संताल समाज (चंदनकियारी), बाबा तिलका मांझी सेना समिति, खेरवाल जुमिद गांवता (बालियापुर, धनबाद) और ओलचिकी हूल बैसी (झारखंड) के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बिहार समेत देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में संताली साहित्यकार, बुद्धिजीवी और भाषा-संस्कृति प्रेमी एकजुट हुए. मंच का सफल व कुशल संचालन साहित्यकार मोहन चंद्र बास्के ने किया, जबकि आयोजन समिति के सचिव प्रेम मार्डी ने आगत अतिथियों का स्वागत भाषण से अभिनंदन किया और कार्यक्रम के अंत में सभी के प्रति आभार व्यक्त किया.


श्रद्धांजलि व धर्म ग्रंथ 'हितल' पाठ के साथ हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम का विधिवत एवं गरिमामय शुभारंभ मांझी रामदास टुडू 'रास्का', गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू तथा साधु राम चांद मुर्मू के चित्रों पर पुष्प अर्पित व माल्यार्पण कर किया गया. इसके बाद संताल समाज के पवित्र धर्म ग्रंथ 'हितल' का सस्वर पाठ किया गया, जिससे संपूर्ण सभागार भक्तिमय और सांस्कृतिक ऊर्जा से भर उठा. अतिथियों ने महान विभूतियों के बताए रास्ते पर चलने का संकल्प दोहराया.


शिक्षा के पथ पर निरंतर संघर्ष की आवश्यकता: चुंडा सोरेन

समारोह में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित चुंडा सोरेन 'सिपाही' ने अपने ओजस्वी संबोधन में कहा कि संताल समाज ने वर्तमान समय में शिक्षा और बौद्धिक विकास समेत विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन मंजिल अभी दूर है. हमें शिक्षा के पथ पर निरंतर संघर्ष और प्रयास जारी रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि संताल समाज एक आदि-बुनियादी समाज है, जिसकी नींव हमारे पूर्वजों ने बेहद मजबूत स्वशासन व्यवस्था के साथ रखी थी। इसी व्यवस्था के तहत आज भी हमारा समाज संचालित हो रहा है, और इसकी गरिमा व परंपरा को संजोकर रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है. इस साहित्यिक गोष्ठी में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रख्यात साहित्यकार भुजंग टुडू, सरिता सोरेन, शोभा हांसदा, राधा राम हेम्ब्रम, रवींद्र नाथ हेम्ब्रम, मंडल सोरेन, सिंगराई सोरेन और सुधीर चंद्र मुर्मू समेत कई गणमान्य लोग मंच पर मौजूद थे. 


धर्मांतरण के दौर में समाज की ढाल बने रामदास टुडू: दुर्गाचरण मुर्मू

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और ओलचिकी हूल बैसी के महासचिव दुर्गाचरण मुर्मू ने मांझी रामदास टुडू 'रास्का' के जीवन-संघर्ष और योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि जब संताल समाज में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की आंधी चल रही थी और सांस्कृतिक पहचान संकट में थी, तब रामदास टुडू 'रास्का' ने अपने सशक्त लेखन, प्रचार और सांगठनिक कौशल के दम पर समाज को जागृत और एकजुट करने का ऐतिहासिक काम किया. उनकी रचनाएं आज भी समाज के लिए मार्गदर्शक हैं.