संताली भाषा के साथ सौतेला व्यवहार, केजी से पीजी तक संताली माध्यम में पढ़ाई की उठी मांग

चंदनकियारी में अखिल भारतीय संताली लेखक संघ की संगोष्ठी, भाषा और ओलचिकी लिपि के विकास पर हुआ मंथन


Jamshedpur News : अखिल भारतीय संताली लेखक संघ, झारखंड शाखा के तत्वावधान में शनिवार को बोकारो जिले के चंदनकियारी में एक दिवसीय साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। सुधीर चंद्र मुर्मू की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा समेत विभिन्न राज्यों से साहित्यकार, लेखक और संताली भाषा प्रेमी शामिल हुए। संगोष्ठी में संताली भाषा, साहित्य और ओलचिकी लिपि के संरक्षण, संवर्धन तथा व्यावहारिक इस्तेमाल को लेकर विस्तार से चर्चा की गयी।

आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद भी विकास की रफ्तार धीमी


संगोष्ठी को संबोधित करते हुए साहित्यकारों ने कहा कि संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण पहचान मिली है। इसके बावजूद भाषा के व्यावहारिक विकास के लिए अपेक्षित स्तर पर काम नहीं हो रहा है। वक्ताओं ने कहा कि संताली भाषा को लेकर सरकारी स्तर पर घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन धरातल पर शिक्षा, प्रशासन और रोजगार से जोड़ने की दिशा में ठोस पहल की कमी दिखाई देती है। भाषा के विकास को केवल साहित्यिक आयोजनों तक सीमित रखने के बजाय इसे शिक्षा और सरकारी कामकाज से जोड़ने की जरूरत है।

केजी से पीजी तक संताली माध्यम में पढ़ाई की मांग


साहित्यकारों ने कहा कि संताली भाषा के विकास के लिए बच्चों को शुरुआती शिक्षा से ही अपनी मातृभाषा में पढ़ाई का अवसर मिलना चाहिए। केजी से लेकर पीजी तक संताली माध्यम में शिक्षा की व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है। इसके लिए पर्याप्त संख्या में संताली भाषा के शिक्षक नियुक्त करने, पाठ्य-पुस्तकें उपलब्ध कराने और ओलचिकी लिपि में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री तैयार करने पर जोर दिया गया। वक्ताओं का कहना था कि मातृभाषा में शिक्षा से बच्चों को सीखने में सुविधा होगी और संताली भाषा की अगली पीढ़ी से मजबूत जुड़ाव कायम होगा।

स्कूल-कॉलेजों में संताली शिक्षकों की हो बहाली


संगोष्ठी में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर संताली भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए व्यापक सामाजिक जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया गया। साथ ही झारखंड सरकार से प्राथमिक विद्यालयों से लेकर महाविद्यालयों तक संताली भाषा के शिक्षकों की अविलंब बहाली की मांग की गयी। ओलचिकी लिपि में नियमित पठन-पाठन शुरू करने तथा सरकारी शिक्षण संस्थानों में संताली भाषा की पढ़ाई को मजबूत करने की मांग भी उठायी गयी। साहित्यकारों ने कहा कि भाषा तभी मजबूत होगी, जब उसका इस्तेमाल शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में बढ़ेगा।

साहित्यकारों ने भाषा संरक्षण के लिए एकजुटता पर दिया जोर


कार्यक्रम में भुजंग टुडू, रतन मरांडी, सुधीर चंद्र मुर्मू, बदेन मुर्मू, पूरण हांसदा, सहदेव हेंब्रम, लगन हांसदा, प्रभाकर हेंब्रम, सरदार हांसदा, प्रेम मार्डी, सनातन हेंब्रम, बिदु मुर्मू, मनिलाल हांसदा, ज्योतिलाल हेम्ब्रम, रमेश मुर्मू, सुभाष चंद्र मुर्मू, सुनील मुर्मू, देवानंद हेंब्रम, कमलेश मुर्मू, संतोष मुर्मू, कमल कांत मुर्मू, सुधीर हेंब्रम और अमृत हेंब्रम समेत बड़ी संख्या में साहित्यकार व भाषा प्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन सनातन हेंब्रम के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। संगोष्ठी में संताली भाषा और ओलचिकी लिपि को मजबूत करने के लिए सामाजिक स्तर पर लगातार प्रयास करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।