फुटबॉल मैदान से बदलाव की कहानी, शराब छोड़ पकौड़े बेच आत्मनिर्भर बन रहीं ग्रामीण महिलाएं

फुटबॉल के मैदान में उमड़ता जनसैलाब युवाओं के जुनून का प्रतीक

जमशेदपुर: झारखंड के ग्रामीण इलाकों में आयोजित होने वाले फुटबॉल टूर्नामेंट केवल खेल प्रतियोगिता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये गांवों की सामाजिक और सांस्कृतिक तस्वीर भी सामने लाते हैं। मैच देखने के लिए मैदान में उमड़ने वाली भारी भीड़ यहां के युवाओं के खेल के प्रति जुनून और सामुदायिक एकजुटता को दर्शाती है। मैदान में खिलाड़ियों का उत्साह और दर्शकों की तालियां ग्रामीण क्षेत्र में खेल की लोकप्रियता की कहानी कहती हैं। खेल युवाओं की प्रतिभा को निखारने और उन्हें अनुशासन, टीम भावना तथा संघर्ष की सीख देने का बेहतर माध्यम है। यदि खेल के साथ शिक्षा को भी प्राथमिकता दी जाये, तो ग्रामीण क्षेत्र के युवा सफलता की नयी ऊंचाइयां हासिल कर सकते हैं। फुटबॉल मैदानों में दिखने वाली यह एकजुटता समाज की सामूहिक शक्ति का भी परिचय देती है।


खेल के मैदान से दिखी सामाजिक बदलाव की तस्वीर

फुटबॉल प्रतियोगिताओं के दौरान मैदान के आसपास लगने वाली अस्थायी दुकानों में ग्रामीण परिवार छोटे-छोटे व्यवसाय कर अपनी आजीविका चलाते हैं। ऐसे ही एक आयोजन में समाज के सकारात्मक बदलाव की तस्वीर देखने को मिली। जहां पहले कुछ महिलाएं हंड़िया और शराब बेचकर परिवार चलाने को मजबूर होती थीं, वहीं अब कुछ महिलाओं ने इस परंपरागत व्यवसाय को छोड़कर नया रास्ता चुना है। मैदान के एक कोने में दो ग्रामीण महिलाएं शराब की जगह पकौड़े, आलू चॉप और अंडा चॉप बेचती नजर आयीं। उनके स्टॉल पर लोगों की भीड़ भी जुटी। यह छोटा-सा प्रयास आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ-साथ सामाजिक बदलाव का संदेश भी दे रहा है।


शराब छोड़ शुरू किया सम्मानजनक रोजगार

इन महिलाओं का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ग्रामीण समाज में शराब और हंड़िया का कारोबार कई परिवारों की आय का पारंपरिक साधन रहा है। हालांकि इससे होने वाले सामाजिक और पारिवारिक नुकसान को लेकर लंबे समय से चिंता भी जतायी जाती रही है। ऐसे में शराब बेचने का काम छोड़कर खाद्य सामग्री बेचने का निर्णय एक सकारात्मक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है।पकौड़े, आलू चॉप और अंडा चॉप बेचकर महिलाएं न केवल अपनी रोजी-रोटी चला रही हैं, बल्कि अपने परिवार के लिए सम्मानजनक आय का जरिया भी तैयार कर रही हैं। उनका कहना है कि मेहनत से किया गया कोई भी छोटा व्यवसाय परिवार के लिए बेहतर भविष्य का आधार बन सकता है। जरूरत केवल नयी राह चुनने और उस पर दृढ़ता से आगे बढ़ने की है।

इच्छाशक्ति हो तो बदल सकती है जिंदगी की दिशा

इन दोनों महिलाओं की पहल ग्रामीण समाज के लिए एक प्रेरक उदाहरण है। उनका प्रयास बताता है कि परंपरा के नाम पर किसी ऐसे काम को जारी रखना जरूरी नहीं, जिससे परिवार और समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़े। समय के साथ रोजगार के नये विकल्प तलाशना और अपनी मेहनत से आगे बढ़ना ही बेहतर रास्ता है। फुटबॉल मैदान में उमड़ती भीड़ जहां खेल के प्रति ग्रामीण युवाओं के जुनून को दिखाती है, वहीं उसी मैदान के एक कोने में महिलाओं का यह छोटा व्यवसाय सामाजिक परिवर्तन की बड़ी तस्वीर पेश करता है। यदि खेल की ऊर्जा, युवाओं की एकजुटता और महिलाओं की आत्मनिर्भरता की भावना समाज के विकास से जुड़ जाये, तो गांवों की तस्वीर तेजी से बदल सकती है। जरूरत है कि ऐसी सकारात्मक पहल को प्रोत्साहन मिले, ताकि और महिलाएं भी शराब जैसे नुकसानदेह व्यवसाय से बाहर निकलकर सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन की ओर कदम बढ़ा सकें।

यह कहानी और तस्वीरें शेखर टुडू की पेज से ली गई है। कहानी अच्छी लगी तो सोचा क्यों ना कुछ लोगों तक इसको पहुंचाया जाए।