Jamshedpur News: पूर्वी सिंहभूम के सरजामदा पंचायत में जनजातीय कला और संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए अबीरा आर्ट्स (Abiraa Arts) द्वारा आयोजित एक माह का निःशुल्क सौरा ट्राइबल आर्ट प्रशिक्षण कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम में 50 से अधिक महिलाओं और युवाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस दौरान प्रतिभागियों को सौरा जनजातीय कला की पारंपरिक शैली, उसके इतिहास, सांस्कृतिक महत्व और आधुनिक समय में उसके उपयोग की जानकारी दी गई। समापन समारोह में सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान कर उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की गई।
एक माह तक चला प्रशिक्षण, महिलाओं और युवाओं ने सीखी पारंपरिक कला
अबीरा आर्ट्स की ओर से आयोजित इस प्रशिक्षण शिविर का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं और युवाओं को पारंपरिक जनजातीय कला से जोड़ना तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था। एक माह तक चले इस प्रशिक्षण में प्रतिभागियों ने सौरा ट्राइबल आर्ट की बारीकियों को सीखा। प्रशिक्षकों ने चित्रांकन की पारंपरिक शैली, प्राकृतिक प्रतीकों के महत्व, रंगों के उपयोग और कलात्मक अभिव्यक्ति के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों ने कई आकर्षक कलाकृतियां तैयार कीं, जिन्हें समापन समारोह में प्रदर्शित भी किया गया।
जैस्मिन अडेसेरा और कुसुम पूर्ति ने बांटे प्रमाण-पत्र
प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन समारोह में प्रसिद्ध कलाकार एवं समाजसेवी जैस्मिन अडेसेरा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं, जबकि जिला परिषद सदस्य कुसुम पूर्ति विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। दोनों अतिथियों ने 50 से अधिक प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए और उनके प्रयासों की सराहना की। जैस्मिन अडेसेरा ने कहा कि जनजातीय कला केवल सांस्कृतिक पहचान ही नहीं, बल्कि रोजगार और आत्मनिर्भरता का भी सशक्त माध्यम बन सकती है। उन्होंने प्रतिभागियों से अपनी कला को व्यवसायिक रूप देने और उसे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का प्रयास करने का आह्वान किया।
स्वेता सिंह ने कला संरक्षण और निरंतर अभ्यास पर दिया जोर
अबीरा आर्ट्स की संस्थापक स्वेता सिंह ने प्रतिभागियों द्वारा तैयार की गई कलाकृतियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि सभी ने पूरे समर्पण और लगन के साथ प्रशिक्षण पूरा किया है। उन्होंने कहा कि सौरा ट्राइबल आर्ट भारत की समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे संरक्षित और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी नई पीढ़ी की भी है। उन्होंने प्रतिभागियों को नियमित अभ्यास करने, अपनी रचनात्मकता को विकसित करने और नई तकनीकों के साथ पारंपरिक कला को जोड़ने की सलाह दी। साथ ही उन्होंने कहा कि संस्था भविष्य में भी ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करती रहेगी, ताकि अधिक से अधिक लोग भारतीय लोक एवं जनजातीय कला से जुड़ सकें।
महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता से जोड़ने की पहल
जिला परिषद सदस्य कुसुम पूर्ति ने अपने संबोधन में कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को कौशल विकास से जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराते हैं और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनने का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने सभी प्रतिभागियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि अपने कार्य के प्रति ईमानदारी, अनुशासन और मेहनत ही सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। यदि महिलाएं अपनी कला को व्यवसाय के रूप में विकसित करें तो वे न केवल अपने परिवार की आय बढ़ा सकती हैं, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन सकती हैं। उन्होंने अबीरा आर्ट्स की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में कला संरक्षण के साथ-साथ रोजगार सृजन का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन रहे हैं।
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