5 दिवसीय प्रशिक्षण में 50 महिलाएं सीख रहीं पारंपरिक वाद्ययंत्र
Jamshedpur News: आधुनिकता और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच आदिवासी समाज की पारंपरिक संस्कृति और लोककला को संरक्षित करने की दिशा में बागबेड़ा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू हुई है। मतलाडीह तिलका मैदान स्थित धुमकुड़िया भवन में टाटा स्टील फाउंडेशन के सहयोग से पांच दिवसीय पारंपरिक वाद्ययंत्र प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इसमें क्षेत्र की 50 स्थानीय आदिवासी महिलाओं को मांदर, नगाड़ा समेत पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कार्यक्रम का उद्देश्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों की कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और विलुप्त होती इस सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखना है। प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को वाद्ययंत्रों की बारीकियों के साथ-साथ उनकी धुन, ताल और सामाजिक महत्व की जानकारी भी दी जा रही है। कार्यक्रम का संचालन टाटा स्टील फाउंडेशन के प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर बाबूलाल गोइपाई कर रहे हैं।
अनुभवी प्रशिक्षक दे रहे वाद्ययंत्र बजाने की जानकारी
प्रशिक्षण कार्यक्रम में महिलाओं को निपुण बनाने के लिए अनुभवी प्रशिक्षकों की टीम जुटी हुई है। डुमनी मुर्मू, अनीता हांसदा, बबली मुर्मू, शीतल हेंब्रम, काशीनाथ सोरेन, सावना टुडू और नुनाराम मुर्मू प्रशिक्षण दे रहे हैं। प्रशिक्षक महिलाओं को पारंपरिक वाद्ययंत्रों को बजाने की तकनीक, ताल और लय का अभ्यास करा रहे हैं। रविवार को झामुमो जमशेदपुर प्रखंड के पूर्व अध्यक्ष बहादुर किस्कू भी धुमकुड़िया भवन पहुंचे। उन्होंने प्रशिक्षण ले रही महिलाओं से मुलाकात कर उनका उत्साह बढ़ाया और इस पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति, परंपरा, नृत्य और संगीत से जुड़ी है। इसलिए पारंपरिक कलाओं को बचाने के लिए इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम जरूरी हैं।
मांदर-नगाड़ा सिर्फ वाद्ययंत्र नहीं, सामाजिक पहचान के प्रतीक
आदिवासी समाज में मांदर और नगाड़े का महत्व केवल संगीत तक सीमित नहीं है। प्राचीन समय में इन वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल संवाद, सुरक्षा और सामुदायिक गतिविधियों के लिए भी किया जाता था। जंगल और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के बीच किसी खतरे की सूचना देने, सामुदायिक बैठक की जानकारी पहुंचाने या अन्य जरूरी संदेश देने के लिए विशेष धुनों का इस्तेमाल किया जाता था। समय के साथ मांदर और नगाड़ा आदिवासी समाज की सामूहिक पहचान और एकजुटता के प्रतीक बन गए। बाहा, करम और सरहुल जैसे पर्व-त्योहारों में इनकी थाप पर पूरा समाज एक साथ नृत्य करता है। इनकी धुनें केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक परंपराओं और सांस्कृतिक स्मृतियों को जीवित रखने का माध्यम भी हैं।
महिलाओं में बढ़ रहा आत्मविश्वास, नई पीढ़ी को जोड़ने का संकल्प
प्रशिक्षण में शामिल महिलाएं इस पहल को अपनी संस्कृति से जुड़ने का महत्वपूर्ण अवसर मान रही हैं। जमुना सोरेन ने कहा कि पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाने की कला उनके समाज की संस्कृति का अहम हिस्सा है। आधुनिक संगीत के बढ़ते प्रभाव के बीच इस कला को बचाने की जरूरत है। पांच दिवसीय प्रशिक्षण से उन्हें मांदर और नगाड़ा बजाने की बारीकियां सीखने का अवसर मिल रहा है। वह इस कला को सीखकर गांव और समाज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इसे प्रस्तुत करना चाहती हैं।
सानिया टुडू ने कहा कि पहले पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से पुरुषों तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन अब महिलाएं भी इस कला को सीख रही हैं। प्रशिक्षण से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। मांदर और नगाड़े की थाप पर अपनी संस्कृति की धुन बजाने से उन्हें अपनी जड़ों से गहरा जुड़ाव महसूस होता है। वह इस कला को आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाना चाहती हैं।
सीमा मार्डी ने कहा कि युवा पीढ़ी तेजी से पारंपरिक कलाओं से दूर हो रही है। ऐसे समय में यह प्रशिक्षण उन्हें अपनी संस्कृति को समझने और उससे जुड़ने का अवसर दे रहा है। वह इस कला में पूरी तरह निपुण होकर पर्व-त्योहारों में हिस्सा लेने के साथ क्षेत्र की दूसरी युवतियों को भी पारंपरिक वाद्ययंत्र सीखने के लिए प्रेरित करेंगी।
युवाओं को संस्कृति की जड़ों से जोड़ना है प्रशिक्षण का उद्देश्य
टाटा स्टील फाउंडेशन के प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर बाबूलाल गोईपाई ने कहा कि मांदर और नगाड़ा जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रशिक्षण देने का मूल उद्देश्य युवाओं को अपनी संस्कृति, परंपरा और समाज की जड़ों से जोड़े रखना है। बदलते समय के साथ इन वाद्ययंत्रों का उपयोग लगातार कम होता जा रहा है, जिसका असर लोक-संस्कृति और पारंपरिक संगीत पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को मांदर, नगाड़ा सहित अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रशिक्षण देना समय की जरूरत है। इससे युवाओं में अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति जुड़ाव बढ़ेगा और वे पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगे। पारंपरिक वाद्ययंत्रों का संरक्षण केवल संगीत की एक विधा को बचाना नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत, सामूहिक स्मृति और पहचान को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
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