Railway News: सरायकेला-खरसावां जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ट्रेन की अत्यधिक देरी को रेलवे की सेवा में गंभीर कमी मानते हुए दक्षिण पूर्व रेलवे पर 60 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने स्पष्ट कहा कि यात्रियों को निर्धारित समय पर गंतव्य तक पहुंचाना रेलवे की जिम्मेदारी है और बिना उचित कारण घंटों की देरी यात्रियों को मानसिक एवं शारीरिक परेशानी में डालती है। आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह ने उपभोक्ता मामला संख्या 7/2025 की सुनवाई पूरी करने के बाद यह फैसला सुनाया। आयोग ने रेलवे को 45 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता को 60 हजार रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं किया जाता है तो आदेश की तिथि से 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ राशि वसूल की जाएगी।
ई-टिकट से शुरू हुआ मामला, तय समय से पांच घंटे बाद पहुंची ट्रेन
यह मामला आदित्यपुर निवासी संजय कुमार से जुड़ा है। उन्होंने 13 अक्टूबर 2024 को टाटानगर से संबलपुर जाने के लिए कविगुरु एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 22861) का ई-टिकट बुक कराया था। रेलवे की समय सारिणी के अनुसार ट्रेन को सुबह 10:18 बजे टाटानगर से रवाना होकर उसी दिन दोपहर 3:50 बजे संबलपुर पहुंचना था। लेकिन ट्रेन निर्धारित समय पर रवाना नहीं हो सकी। टाटानगर से ही ट्रेन विलंब से चली और संबलपुर करीब 317 मिनट यानी लगभग 5 घंटे 17 मिनट की देरी से पहुंची। इस असामान्य विलंब के कारण शिकायतकर्ता को भारी मानसिक तनाव, शारीरिक परेशानी तथा अपने निर्धारित कार्यों में नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद संजय कुमार ने दक्षिण पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक को कानूनी नोटिस भेजकर न्याय की मांग की। जब संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो उन्होंने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का दरवाजा खटखटाया।
रेलवे की लापरवाही मानते हुए आयोग ने सुनाया बड़ा फैसला
मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने रेलवे से 2.50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलों, ई-टिकट, कानूनी नोटिस तथा अन्य दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया। सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ट्रेन की अत्यधिक देरी के कारण यात्री को मानसिक एवं शारीरिक उत्पीड़न झेलना पड़ा। आयोग ने इसे रेलवे की सेवा में स्पष्ट कमी (Deficiency in Service) माना। आयोग ने कहा कि सार्वजनिक परिवहन सेवा देने वाली संस्था होने के नाते रेलवे यात्रियों के प्रति जवाबदेह है। यात्रियों का समय भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उनकी सुरक्षा। इसलिए अनावश्यक देरी को सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
50 हजार मानसिक क्षति और 10 हजार मुकदमा खर्च देने का आदेश
फैसले में आयोग ने दक्षिण पूर्व रेलवे के वरिष्ठ मंडल परिचालन प्रबंधक (चक्रधरपुर मंडल) तथा महाप्रबंधक (दक्षिण पूर्व रेलवे, मुख्यालय) को संयुक्त रूप से शिकायतकर्ता को 50 हजार रुपये मानसिक एवं शारीरिक उत्पीड़न के मुआवजे के रूप में देने का निर्देश दिया। इसके अलावा आयोग ने मुकदमे के खर्च के रूप में 10 हजार रुपये अलग से देने का भी आदेश दिया है। इस प्रकार शिकायतकर्ता को कुल 60 हजार रुपये का भुगतान करना होगा। विशेष बात यह रही कि शिकायतकर्ता संजय कुमार ने बिना किसी वकील की सहायता लिए स्वयं आयोग में अपना पक्ष रखा। वहीं रेलवे की ओर से अधिवक्ता डी.एल. विश्वकर्मा ने पैरवी की। इसके बावजूद आयोग ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया।
यात्रियों के अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण बना यह फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन लाखों रेल यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है, जिन्हें ट्रेन की अत्यधिक देरी के कारण परेशानी उठानी पड़ती है। यदि किसी यात्री को रेलवे की लापरवाही से आर्थिक, मानसिक या शारीरिक नुकसान होता है तो वह उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कर न्याय प्राप्त कर सकता है। यह निर्णय रेलवे के लिए भी एक चेतावनी माना जा रहा है कि समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण सेवा देना उसकी कानूनी जिम्मेदारी है। यदि सेवा में गंभीर कमी पाई जाती है तो रेलवे को आर्थिक दंड और मुआवजा दोनों का सामना करना पड़ सकता है। उपभोक्ता आयोग का यह आदेश यात्रियों के अधिकारों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। इससे भविष्य में रेलवे को समय पालन और यात्री सुविधाओं को लेकर अधिक जवाबदेह बनने की उम्मीद है।
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