Sarna Dharma Code 2027 Census: जनगणना 2027 में सरना धर्म कोड की मांग तेज, पूर्वी सिंहभूम माझी परगाना महाल ने राष्ट्रपति को सौंपा ज्ञापन

जनगणना 2027 में सरना धर्म कोड की मांग ने पकड़ी रफ्तार

EAST SINGHBHUM: देश में प्रस्तावित वर्ष 2027 की जनगणना से पहले आदिवासी समाज द्वारा सरना धर्म के लिए पृथक धर्म कोड की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। इसी कड़ी में पूर्वी सिंहभूम माझी परगाना महाल, घाटशिला ने महामहिम राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन सौंपते हुए जनगणना में सरना धर्म को अलग पहचान देने की मांग की है। ज्ञापन अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ), घाटशिला के माध्यम से भेजा गया है। संगठन का कहना है कि भारतीय संविधान अनुसूचित जनजातियों को उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक, धार्मिक एवं सामाजिक पहचान प्रदान करता है, इसलिए जनगणना में भी उनकी धार्मिक पहचान को अलग स्थान मिलना चाहिए। ज्ञापन में कहा गया है कि आदिवासी समाज की अपनी पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था, प्रकृति पूजा, सांस्कृतिक परंपराएं तथा सामाजिक संरचना है, जिसे किसी अन्य धर्म की श्रेणी में रखना उचित नहीं है। संगठन ने इसे संवैधानिक न्याय और आदिवासी अस्मिता का विषय बताया है।

सरना धर्म कोड का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?


ज्ञापन के साथ प्रस्तुत दस्तावेज में सरना धर्म कोड के इतिहास का भी उल्लेख किया गया है। इसमें बताया गया है कि वर्ष 1872 की पहली जनगणना में हिंदू, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, ईसाई, पारसी और यहूदी धर्मों की गणना की गई थी, लेकिन मूलनिवासी आदिवासियों के सरना धर्म के लिए कोई अलग कोड निर्धारित नहीं किया गया। इसके बाद वर्ष 1881 और 1911 की जनगणनाओं में जनजातीय समुदायों को प्रकृतिवादी (Animist) अथवा जनजातीय धर्म के रूप में दर्ज किया गया। 1921, 1931 और 1941 की जनगणनाओं में भी जनजातीय समुदायों की धार्मिक पहचान को अलग तरीके से दर्ज किया गया। स्वतंत्रता के बाद 1951 की जनगणना में "अन्य धर्म" की श्रेणी बनाई गई, जिसमें आदिवासी धर्मों को शामिल किया गया। बाद की जनगणनाओं में भी अलग धर्म कोड की मांग लगातार उठती रही, लेकिन आज तक सरना धर्म को पृथक कोड नहीं मिल सका।

संविधान में आदिवासियों की अलग पहचान का हवाला


पूर्वी सिंहभूम माझी परगाना महाल ने अपने ज्ञापन में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 और अन्य संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा है कि अनुसूचित जनजातियों की पहचान उनके विशिष्ट सांस्कृतिक और सामाजिक स्वरूप के आधार पर की गई है। ज्ञापन में कहा गया है कि आदिवासी समुदाय की प्रमुख विशेषताएं उनकी अलग सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक जीवनशैली, प्रकृति आधारित धार्मिक आस्था, विशिष्ट भाषा-बोली तथा सामाजिक व्यवस्था हैं। संविधान में अनुसूचित जनजातियों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरक्षण की व्यवस्था भी की गई है। ऐसे में जनगणना के दौरान उनके धर्म की अलग पहचान सुनिश्चित करना संविधान की भावना के अनुरूप होगा।

आदिवासी समाज ने रखे ये प्रमुख तर्क


ज्ञापन में कहा गया है कि देश की जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आदिवासी समुदाय से जुड़ा हुआ है और वे सदियों से प्रकृति आधारित सरना धर्म का पालन करते आ रहे हैं। उनका धार्मिक जीवन जंगल, जल, जमीन और प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। संगठन का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में सरना धर्म मानने वालों को "अन्य धर्म" की श्रेणी में शामिल कर दिया जाता है, जिससे उनकी वास्तविक संख्या और धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ पाती। यदि जनगणना में अलग सरना धर्म कोड उपलब्ध कराया जाता है तो देश में सरना धर्मावलंबियों की वास्तविक संख्या का वैज्ञानिक और आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध होगा, जिससे नीति निर्माण में भी सहायता मिलेगी।

2027 की जनगणना में अलग कोड देने की मांग


पूर्वी सिंहभूम माझी परगाना महाल ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वर्ष 2027 की जनगणना में सरना धर्म के लिए पृथक धर्म कोड की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। संगठन का मानना है कि इससे आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान को संवैधानिक और प्रशासनिक स्तर पर उचित सम्मान मिलेगा। ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि अलग धर्म कोड मिलने से आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और धार्मिक विरासत का सही दस्तावेजीकरण संभव होगा। इससे भविष्य की सरकारी योजनाओं, शोध कार्यों और जनसंख्या संबंधी आंकड़ों में भी स्पष्टता आएगी।

आदिवासी संगठनों की लंबे समय से चली आ रही मांग


सरना धर्म कोड की मांग कोई नई नहीं है। झारखंड सहित कई आदिवासी बहुल राज्यों में विभिन्न सामाजिक और पारंपरिक संगठन वर्षों से इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। समय-समय पर राज्य सरकारों ने भी इस संबंध में केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजे हैं। पूर्वी सिंहभूम माझी परगाना महाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजा गया यह ज्ञापन इसी लंबे आंदोलन का हिस्सा माना जा रहा है। अब सभी की नजर केंद्र सरकार और आगामी जनगणना की प्रक्रिया पर है कि क्या वर्ष 2027 की जनगणना में सरना धर्म को अलग धर्म कोड की मान्यता मिलती है या नहीं। यदि ऐसा होता है तो इसे आदिवासी समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाएगा।

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