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HUL DIVAS: झारखंड के गांवों में खुलीं लाइब्रेरी, बच्चों ने लिया शिक्षा व नशामुक्ति का संकल्प

Jharkhand news: झारखंड की धरती वीरों की धरती रही है। 30 जून को पूरा प्रदेश संताल हुल क्रांति के महानायकों को याद कर रहा था। लेकिन इस बार का हुल क्रांति दिवस कुछ खास और अलग था। इस ऐतिहासिक मौके पर झारखंड के गांवों में एक नई क्रांति की शुरुआत देखने को मिली। 'डिजिटल लाइब्रेरी ग्रुप झारखंड' के आह्वान पर कोल्हान और संताल परगना समेत कई इलाकों के सामुदायिक पुस्तकालयों में बच्चों, युवाओं और ग्रामीणों ने मिलकर शिक्षा, नशामुक्ति और सामाजिक जागरूकता का एक बड़ा संकल्प लिया। यह आयोजन दिखाता है कि कैसे झारखंड के ग्रामीण इलाकों में किताबों के जरिए बदलाव की नई बयार बह रही है।

महानायकों को नमन कर बदलाव लिया शपथ
कार्यक्रम की शुरुआत संताल हुल के अमर नायकों- सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और वीरांगना फूलो-झानो की तस्वीरों पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि अर्पित करके हुई। इसके बाद वहां मौजूद बच्चों, महिलाओं और युवाओं ने देश के लिए उनके बलिदान को याद किया। इस मौके पर सिर्फ भाषण नहीं हुए, बल्कि सबने मिलकर अपने जीवन को बेहतर बनाने की शपथ ली। सबने संकल्प लिया कि वे अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे, हर तरह के नशे से दूर रहेंगे और दूसरों को भी पढ़ने-लिखने में मदद करेंगे। युवाओं ने कसम खाई कि वे स्कूल-कॉलेज के बाद हर दिन पुस्तकालय जाएंगे और किताबों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएंगे।

गांव-गांव में गूंजा किताबों का संदेश
इस खास दिन पर झारखंड के कई प्रमुख पुस्तकालयों में कार्यक्रमों की धूम रही। दुमका के जामा में स्थित पंडित रघुनाथ मुर्मू पुस्तकालय में बच्चों ने पारंपरिक रूप से एक बेहद खूबसूरत रैली निकाली। इस रैली में छोटे-छोटे बच्चे सिदो-कान्हू और फूलो-झानो की वेशभूषा में सजे नजर आए, जिन्हें देखकर पूरा गांव गर्व से भर उठा। वहीं चाईबासा के पिल्लई हॉल में उरांव समाज संघ द्वारा एक शानदार पुस्तक प्रदर्शनी लगाई गई, जहां बड़ी संख्या में लोग किताबें देखने और पढ़ने पहुंचे। इसके अलावा साहेबगंज के ढाटापाड़ा और विनोदपुर, चक्रधरपुर के कोलचाकड़ा और टोंकाटोला, चाईबासा के पुलहातु, रांची के मांडर और खरसावां के शहरबेड़ा स्थित सामुदायिक पुस्तकालयों में भी ऐसे ही जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए।

लाइब्रेरी के 9 साल पूरे होने पर मना जश्न
चक्रधरपुर के सेताहाका गांव में स्थित 'सिदो-कान्हू मुर्मू आदिवासी पुस्तकालय' के लिए यह दोहरा जश्न था। इस पुस्तकालय ने अपने सफल संचालन के 9 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस खुशी के मौके पर बच्चों और छात्र-छात्राओं के बीच कई तरह की शैक्षणिक गतिविधियां और प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। वहां मौजूद अतिथियों ने बच्चों के साथ प्रेरक संवाद किया और उनका हौसला बढ़ाया। आखिर में बच्चों ने मिलकर केक काटा और लाइब्रेरी की इस खूबसूरत यात्रा का जश्न मनाया। यह इस बात का सबूत है कि गांवों में खुली ये लाइब्रेरी सालों से बच्चों का भविष्य संवार रही हैं।

पढ़ाई के साथ-साथ सड़क सुरक्षा का पाठ भी सीखा
इस आयोजन की सबसे अच्छी बात यह रही कि इसमें सिर्फ किताबों की बात नहीं हुई, बल्कि रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी जरूरी बातें भी सिखाई गईं। पुस्तकालयों में आए लोगों को सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूक किया गया। सभी प्रतिभागियों ने संकल्प लिया कि वे हमेशा यातायात नियमों का पालन करेंगे, गाड़ी चलाते समय गति सीमा का ध्यान रखेंगे, बाइक चलाते वक्त हेलमेट और कार में सीट बेल्ट जरूर लगाएंगे। साथ ही, सबने यह सबसे जरूरी कसम भी खाई कि वे कभी भी नशे की हालत में वाहन नहीं चलाएंगे और अपने परिवार के लोगों को भी इसके लिए रोकेंगे।

सामाजिक बदलाव का जरिया बन रहीं लाइब्रेरी
इस पूरे आंदोलन के पीछे 'लाइब्रेरी मैन' के नाम से मशहूर संजय कच्छप, कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला समूह और अनिल उरांव जैसे समाजसेवियों की टीम का बड़ा योगदान है। कार्यक्रम में स्थानीय शिक्षक, स्वयंसेवक और बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। 'डिजिटल लाइब्रेरी ग्रुप झारखंड' का मानना है कि सामुदायिक पुस्तकालय सिर्फ किताबें पढ़ने की जगह नहीं हैं। ये गांव के बच्चों को नशामुक्ति, अच्छी आदतें, लीडरशिप और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए तैयार करने वाले केंद्र हैं। झारखंड में पढ़ने की संस्कृति को मजबूत करने और एक जागरूक समाज बनाने की दिशा में एक बेहतरीन और उम्मीदों से भरी पहल है।

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