भारत में तेजी से बदल रही है जनसंख्या की तस्वीर, कई राज्यों में जन्मदर लगातार घट रही

POPULATION IN INDIA: भारत लंबे समय तक तेजी से बढ़ती आबादी वाले देशों में शामिल रहा है। बढ़ती जनसंख्या को विकास की सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था। इसी सोच के आधार पर सरकारों ने परिवार नियोजन को बढ़ावा दिया और कई राज्यों में दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोकने जैसे नियम बनाए गए। लेकिन अब देश की जनसंख्या का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। कई राज्यों में जन्मदर लगातार घट रही है और जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार पहले की तुलना में काफी धीमी हो गई है। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि पुराने कानूनों और नीतियों की वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार समीक्षा की जाए। हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस विषय पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं कि क्या बदलते जनसांख्यिकीय हालात में पुराने नियमों को उसी रूप में जारी रखना उचित है।

प्रजनन दर में गिरावट ने बदली नीति की दिशा

भारत के रजिस्ट्रार जनरल की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) सांख्यिकीय रिपोर्ट-2024 के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) घटकर 1.9 रह गई है। यह जनसंख्या के स्थिर बने रहने के लिए आवश्यक 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से भी कम है। इसका अर्थ यह है कि यदि यही स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो भविष्य में देश की आबादी धीरे-धीरे स्थिर होने के बाद घट भी सकती है।
हालांकि पूरे देश की स्थिति एक जैसी नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में प्रजनन दर अभी भी अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि दिल्ली, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह काफी कम दर्ज की गई है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत की जनसंख्या संबंधी चुनौतियां क्षेत्रवार अलग-अलग हैं और उनके समाधान भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार होने चाहिए।

एक जैसी जनसंख्या नीति अब नहीं होगी प्रभावी

विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे देश के लिए एक समान जनसंख्या नीति अब व्यावहारिक नहीं रह गई है। जिन राज्यों में जन्मदर पहले से कम हो चुकी है, वहां आबादी बढ़ाने की चिंता सामने आने लगी है, जबकि कुछ राज्यों में अब भी जनसंख्या वृद्धि को संतुलित करना आवश्यक है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच भी जन्मदर में उल्लेखनीय अंतर देखने को मिलता है। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, महिलाओं की भागीदारी, आर्थिक स्थिति और रोजगार जैसे कारक इस अंतर को प्रभावित करते हैं। इसलिए नीति निर्माण करते समय राज्यों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी होगा। केवल राष्ट्रीय स्तर पर बनाई गई एक नीति सभी क्षेत्रों के लिए समान रूप से प्रभावी नहीं हो सकती।

दो बच्चों के नियम पर फिर शुरू हुई बहस

बदलती परिस्थितियों के बीच दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले नियमों पर भी बहस तेज हो गई है। जब यह नियम बनाए गए थे, तब बढ़ती जनसंख्या सबसे बड़ी चिंता थी। लेकिन आज कई हिस्सों में स्थिति बदल चुकी है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे प्रावधान लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करते हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव गरीब, ग्रामीण और महिलाओं पर पड़ता है, जिनकी राजनीतिक भागीदारी पहले से ही सीमित है। यदि किसी व्यक्ति को केवल परिवार के आकार के आधार पर चुनाव लड़ने से वंचित किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांत पर भी सवाल खड़े करता है। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस विषय पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता जताई है।

भविष्य में बढ़ेगी बुजुर्ग आबादी की चुनौती

जनसंख्या विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में भारत जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) के दौर में है, लेकिन यह स्थिति हमेशा नहीं रहेगी। यदि प्रजनन दर लगातार कम होती रही तो आने वाले वर्षों में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ेगी और कार्यशील आयु वर्ग की आबादी का अनुपात घटने लगेगा। ऐसी स्थिति में सरकार को सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाओं और बुजुर्गों की देखभाल के लिए पहले से तैयारी करनी होगी। वहीं जिन राज्यों में अभी भी युवा आबादी अधिक है, वहां शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य, पोषण और रोजगार के अवसरों पर अधिक निवेश करना होगा ताकि युवाओं को उत्पादक मानव संसाधन में बदला जा सके। इससे आर्थिक विकास को भी गति मिलेगी और भविष्य की चुनौतियों का सामना करना आसान होगा।

बदलती जनसांख्यिकी के अनुसार बनानी होगी नई नीति

भारत अब उस दौर में पहुंच चुका है जहां जनसंख्या नीति का उद्देश्य केवल आबादी को नियंत्रित करना नहीं होना चाहिए। अब आवश्यकता ऐसी नीतियों की है जो बदलती जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं, क्षेत्रीय असमानताओं और सामाजिक जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जाएं। दक्षिण भारत के कई राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की, लेकिन अब वित्तीय संसाधनों के वितरण और परिसीमन जैसे मुद्दों पर उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए जनसंख्या नीति में संतुलन, न्याय और समान अवसरों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। आने वाले समय में भारत को ऐसी जनसंख्या नीति अपनानी होगी जो केवल संख्या पर नहीं, बल्कि मानव संसाधन की गुणवत्ता, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और क्षेत्रीय संतुलन पर भी समान रूप से केंद्रित हो। यही दृष्टिकोण देश को दीर्घकालिक और समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ाने में सबसे अधिक प्रभावी साबित होगा।

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